५१. परतन्त्रता में एक और सहस्रक

ज्यूधर्म में निर्माण हुए सदूकी, फरिसी, एस्सेनी, झीलॉट् आदि गुटों में से सदूकी, एस्सेन, झीलॉट ये गुट इस पहले ज्युइश-रोमन युद्ध के बाद लगभग नामशेष ही हुए और उनमें से केवल फरिसीज् यह मध्यममार्गीय माना जानेवाला गुट ही अपना अस्तित्व बरक़रार रख सका| इन फरिसीज् से ही आगे चलकर ‘रब्बीनिक ज्युडाइझम’ (लिखित एवं मौखिक रूप के टोराह को माननेवाले) का जन्म हुआ, जिसके पास इसवीसन ६ठीं सदी से आजतक ज्यूधर्म के सूत्र रहे हैं|

इस पहले ज्युइश-रोमन युद्ध के पश्‍चात् पूरे रोमन साम्राज्यस्थित सभी ज्यूधर्मियों पर बेतहाशा कर थोंपा गया; फिर चाहे वे ज्युडिया प्रांत के रहनेवाले हों या न हों| इस करसंपादन के लिए ‘फिस्कस ज्युडाइकस’ नामक एक स्वतंत्र संस्था की स्थापना की गयी थी| इसके लिए वजह यह दी गयी थी कि टेंपल की देखभाल के लिए ज्यूधर्मीय अपनी आय का निर्धारित हिस्सा टेंपल प्रशासन को दिया ही करते थे| फिर अब टेंपल बचा न होने के कारण वे इस कर का रोमस्थित ‘ज्युपिटर टेंपल’ के लिए भुगतान करें|

इस दूसरे होली टेंपल के कालखंड की आख़िर में एक और महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी| ज्यूधर्मियों में ‘जीझस ख्राईस्ट को ईश्‍वरी अवतार माननेवाला’ एक गुट तैयार होने लगा था और यह ज्यूधर्मियों का गुट धीरे धीरे ज्यूधर्मतत्त्वों से, ज्यूधर्म से दूर जाता दिखायी दे रहा था| ईसाई धर्म का उदय होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी|

साथ ही, रोमन साम्राज्य द्वारा ज्यूधर्मियों पर बेतहाशा कर थोंपा जाने के बाद तो, जीझस ख्राईस्ट को माननेवाले इस नये गुट ने ‘हम ज्यूधर्मतत्त्वों का पालन नहीं करते, हम ज्यूधर्मीय नहीं हैं| अतः हमें इस कर में से छूट दी जायें’ ऐसी याचिकाएँ राजदरबार में दाखिल की गयीं|

लेकिन इन ज्युइश-ख्रिश्‍चनों को बतौर अलग धर्म स्वीकृति मिलने तक इसवीसन ३१३ साल का उदय होना पड़ा|

लेकिन अब होली टेंपल ध्वस्त हुआ होने के कारण सर्वोच्च स्तर पर की सामूहिक प्रार्थना को, ईश्‍वर को बलि आदि अर्पण करने के लिए केंद्रबिंदू (‘फोकल पॉईंट’) नहीं बची थी| इस कारण धीरे धीरे ‘सिनगॉग’ (स्थानीय स्तर पर जगहजगह निर्माण किये गये ज्यूधर्मीय प्रार्थनास्थल) का और साथ ही, बलि आदि अर्पण करने की अपेक्षा घर में ही व्यक्तिगत रूप में की जानेवाली प्रार्थना का महत्त्व बढ़ गया|

घर में प्रार्थना ज्यूधर्मीय पहले भी करते थे, लेकिन उसे निश्‍चित रूप में प्रमाणबद्धता नहीं थी, जिसकी शुरुआत इस दौर से हुई| इसे मुख्य रूप में कारणीभूत हुए, ‘जोहानन बेन झक्काई’ इस धर्मोपदेशक ने किये प्रयास| टायटस ने की जेरुसलेम की घेराबंदी के दौरान जोहानन एक शव-पेटिका में छिपकर बाहर भागा और ठेंठ, तब तक सम्राट न बने व्हेस्पॅशियन से जा मिला और ‘व्हेस्पॅशियन जल्द ही रोमन सम्राट बननेवाला होने की’ भविष्यवाणी की| आगे चलकर अल्प-अवधि में ही व्हेस्पॅशियन रोमन सम्राट बन जाने पर उसने जोहानन को बुलाकर, उसे जो चाहे वह मॉंगने की आज्ञा की| तब जोहानन ने, ‘यावने’ (जाबने) इस स्थान पर ज्यूधर्मतत्त्वों का प्रशिक्षण देनेवाला स्कूल शुरू करने की और वहॉं ज्यू क़ानून का एवं ज्यूधर्मतत्त्वों का पालन करने की सहूलियत देने की मॉंग की, जो व्हेस्पॅशियन ने स्वीकृत की|

इसके बाद के दौर में जोहानन ने अपने निष्ठावान् सहकर्मियों के साथ शुरू किये इस स्कूल ने ज्यूधर्मतत्त्वों का प्रसार करने का और मुख्य रूप में, ज्यूधर्मियों द्वारा घर में ही की जानेवाली प्रार्थना में प्रमाणबद्धता लाने का महत्त्वपूर्ण काम किया| मौखिक टोराह को लिखित रूप में (‘मिशनाह’) ले आने के कार्य का अहम हिस्सा जोहानन का माना जाता है| उस दौर में जोहानन द्वारा निर्धारित किये गये नियमों का पालन आज भी ज्यूधर्मियों द्वारा किया जाता है|

उसीके साथ, जोहानन के प्रयासों से ‘सॅनहॅड्रिन’ की (७१ धर्मोपदेशकों का केंद्रीय सर्वोच्च न्यायालय – ‘ग्रेटर सॅनहॅड्रिन’ या फिर २३ ज्यू धर्मोपदेशकों के स्थानीय छोटे न्यायालय – ‘स्मॉलर सॅनहॅड्रिन्स’) परंपरा का पुनरुज्जीवन किया गया|

इसके बाद आगे चलकर इसवीसन ११५-११७ के दौरान दूसरा ज्युइश-रोमन युद्ध (‘किटोस वॉर’) हुआ; वहीं, इसवीसन १३२-१३६ के दौरान तीसरा ज्युइश-रोमन युद्ध (‘बार-कोखबा रिव्होल्ट’) हुआ, जिनका अंजाम रोमन सेना द्वारा इन बग़ावतों को कुचल देने में ही हुआ|

तीसरे युद्ध के पश्‍चात् तत्कालीन रोमन सम्राट हॅड्रियन ने ‘ज्युडिया’ इस नाम को ही नक़्शे से मिटाने के उद्देश्य से उसका नामकरण ‘सिरिया पॅलेस्टेनिया’ कर दिया; वहीं, जेरुसलेम का नाम ‘एलिया कॅपिटोलिना’ ऐसा रखा गया| साथ ही, ज्यूधर्मियों पर जेरुसलेम में प्रवेश करने की पाबंदी लगायी गयी| इसी दौरान लगभग १० हज़ार ज्यूधर्मियों को रोम में लाकर बतौर ग़ुलाम बेचा गया| लेकिन जोहानन के प्रयासों से उनमें से अधिकतर लोगों की ग़ुलामी में से रिहाई कर दी गयी| लेकिन साथ ही, लाखो ज्यूधर्मियों कोे मार दिया गया| इन सबसे बचे हुए हजारों ज्यूधर्मीय खुद ही अन्यत्र स्थानांतरित हुए|

सेंट हेलेना ने निर्माण करवाया हुआ जेरुसलेम स्थित चर्च ऑफ सेपल्चर

आगे चलकर हॅड्रियन की मृत्यु के बाद इन पाबंदियों को थोड़ाबहुत शिथिल कर दिया गया और ज्यूधर्मियों पर होनेवाली जेरुसलेम-प्रवेशबंदी को, ‘तिशा बआव’ (हिब्रू ‘आव’ महीने का नौंवा दिन) इस अनशन के दिन का अपवाद (एक्सेप्शन) किया गया| इस दिन ज्यूधर्मियों के इतिहास की कई दुर्घटनाएँ (दोनों होली टेंपल्स ठीक इसी दिन ध्वस्त हुए थे) घटित हो चुकीं होने के कारण यह वार्षिक अनशन का और शोक का दिन मनाया जाता है|

आगे चलकर इसवीसन चौथी सदी में रोमन सम्राट कॉन्स्टन्टाईन ने अधिकृत रूप में ईसाई धर्मच का स्वीकार किया| उसने कॉन्स्टॅन्टिनोपल को (हाल के तुर्की का सबसे बड़ा शहर ‘इस्तंबूल’) अपनी राजधानी बनाया और ईसाई धर्म को ‘रोमन साम्राज्य का अधिकृत धर्म’ घोषित किया| इस कॉन्स्टन्टाईन का मॉं ने – सम्राज्ञी हेलेना ने (सेंट हेलेना) इसवीसन ३२६-३२८ के बीच जेरुसलेम का दौरा किया, जिसमें उसने बेथलेहेम में ईसाई धर्म की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होनेवालें स्थानों पर कुछ चर्चेस का निर्माण करवाया| इस मोड़ पर, जेरुसलेम का ‘एलिया कॅपिटोलिना’ यह बदला हुआ नाम पुनः बदलकर ‘जेरुसलेम’ रखा गया|

इसवीसन ६५० में बायझन्टाईन साम्राज्य

इसी दौरान इसवीसन ३९० में रोमन साम्राज्य का विभाजन हुआ, जिसमें ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च का वर्चस्व होनेवाले ‘ईस्ट रोमन’ (‘बायझन्टाईन एम्पायर’) साम्राज्य के अंतर्गत यह ज्युडिया प्रांत समाविष्ट हुआ| लेकिन वहॉं पर अब धीरे धीरे ईसाईधर्मियों की आबादी बढ़ने लगी थी| ज्यूधर्मीय अपने हक़ की भूमि से अभीतक दूर ही थे| ‘ज्यू डायस्पोरा’ अब अधिक से अधिक बिखुरने लगा था| इसवीसन ६३४ तक ज्युडिया प्रांत इस बायझन्टाईन साम्राज्य का हिस्सा रहा|

बाद के कई शतकों में कोई न कोई आक्रमक यह भाग पहले की सत्ता से जीतता गयाऔर ज्यूधर्मियों की ऐसी ही दुर्दशा होती रही|

इसी दौरान अरब, जो आद्यपूर्वज अब्राहम के पुत्र इश्मेल (इस्माईल) के वंशज माने जाते हैं, वे अरबस्तान और मध्यपूर्वी ईलाके में अधिक से अधिक ताकतवर होते जा रहे थे और उनकी साम्राज्यविस्तार की भूख भी बढ़ती जा रही थी| उन्होंने बायझन्टाईन साम्राज्य पर जगह जगह हमले करना शुरू किया था|

इसवीसन ६३४ से ६३६ के बीच अरबी आक्रमकों ने इस जेरुसलेम प्रदेश को जीत लिया और इस प्रदेश का नाम ‘जुंद फिलस्तिन’ रखा| उसके बाद यहॉं का ईसाईधर्मियों का वर्चस्व खत्म होकर इस्लामी वर्चस्व स्थापित हुआ| लेकिन रोमन सम्राटों द्वारा ज्यूधर्मियों पर लगायी गयी जेरुसलेम-प्रवेश पाबंदी हटा दी गयी| इसी दौरान इसवीसन ६९१ में तत्कालीन खलिफा अब्द-अल-मलिक ने ज्यूधर्मियों के लिए सबसे पवित्र होनेवाले ‘टेंपल माऊंट’ पर ‘डोम ऑफ द रॉक’ इस इस्लामी प्रार्थनास्थल का निर्माण किया| आगे चलकर इसवीसन ७०५ में वहॉं से नज़दीक ही ‘अल्-अक्सा’ इस मसज़िद का भी निर्माण किया गया| उसके बाद इसवीसन १०९९ तक के समय में विभिन्न खलिफाओं के वंशों का शासन इस प्रदेश पर रहा|

इस प्रकार एक सहस्राब्द बीत चुका था, लेकिन ज्यूधर्मियों की जेरुसलेम में हक़ की भूमि में स्थानांतरित होने की घड़ी अभी तक कहीं दिखायी नहीं दे रही थी….(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर