१७. ‘एक्झोडस्’- पहला संघर्ष; ‘एक राष्ट्र’ बनने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम

उस प्रकार भूखमरी से त्रस्त हो चुके ज्यूबांधवों को दैवी खाने की आपूर्ति कर ईश्‍वर ने उनकी भूखमरी से रक्षा की – एक दो नहीं, बल्कि अगले पूरे चालीस वर्षों तक!

सीन के रेगिस्तान से ज्यूधर्मीय अगले प्रवास के लिए रवाना हुए। दिन में उस बादलों के स्तंभ के और रात को अग्निस्तंभ के पीछे पीछे यह समूह चलता था। धीरे धीरे मार्गक्रमणा करते हुए वे अब रेफिदिम इस स्थान पर पहुँचे। हालाँकि दैवी खाने की आपूर्ति अखंडित रूप में शुरू थी, मग़र फिर भी अब पुनः उनके पास का पानी खत्म हो चुका था। तब पुनः ज्यूधर्मियों ने मोझेस के पास शिकायतें करना शुरू किया। कुछ लोगों ने कुल मिलाकर इस सारे वाक़ये को लेकर ही अविश्‍वास और शक़ ज़ाहिर किया। लोगों के ग़ुस्से का पारा बहुत ही चढ़ने पर हमेशा की तरह ही मोझेस ने ईश्‍वर की प्रार्थना की। तब ईश्‍वर ने मोझेस को उनमें से बुज़ुर्ग लोगों को इकट्ठा कर वहीं के एक बड़े पत्थर के पास लेने को कहा और मोझेस से कहा कि वह अपनी लाठी से उस पत्थर पर प्रहार करें। मोझेस द्वारा वैसा किये जाने के बाद उस पत्थर में से ज़ोर से पानी बाहर निकलने लगा। सारे समूह की तथा जानवरों की प्यास बुझी, फिर भी पानी बह ही रहा था, ऐसा यह कथा बताती है।

एक्झोडस् के बाद के ये संकट नैसर्गिक तथा प्रायः भूख-प्यास से संबंधित थे। रेफिदिम में उनपर पहला मानवी संकट चलकर आया – वहाँ की ‘आमलेक’ नामक टोलीवालों ने उनपर धावा बोल दिया। ये आमलेक टोलीवाले यानी आयझॅकपुत्र एसाऊ के (जेकब का जुड़वा भाई) वंशज होकर, बहुत ही ख़ूँख़्वार तथा लड़ाकू थे। ज़ाहिर है, हाल ही में कई सदियों की ग़ुलामी में से बाहर निकले और रेगिस्तान में भटककर थके हुए ज्यूधर्मियों की उनसे मुक़ाबला करने की तैयारी नहीं थी।

इसी दौरान मोझेस ने अपना ख़ास विश्‍वसनीय सहकर्मी ‘जोशुआ’ को बुलाकर अगली योजना तय की। इस योजना के अनुसार जोशुआ ने इन ज्यूधर्मियों में से युवा, मज़बूत एवं लड़ाकू स्वभाव के लोग चुनकर उनकी सेना बनायी।

इन युवा एवं शूरवीर ज्यूधर्मियों ने जो जो हाथ लगा उन साधनों से आमलेकों का कड़ा प्रतिकार शुरू किया।

लेकिन मोझेस अपने भाई आरॉन तथा भतीजे हूर को लेकर पास ही के पहाड़ पर गया और वहाँ उसने ईश्‍वर की प्रार्थना की। ईश्‍वर ने उसे उसके हाथ और लाठी ऊपर उठाने के लिए कहा। वैसा मोझेस द्वारा किया जाते ही, तब तक ज्यूधर्मियों पर हावी हो रही आमलेक टोली की हार होने लगी, ऐसा वर्णन इस कथा में आता है।

लेकिन थोड़ी देर बाद जब मोझेस के हाथों में दर्द होने लगा और उसने हाथों को आराम देने के लिए हाथ ज़रासे नीच रखे, तब पुनः आमलेकी टोलीवालों की जीत होने लगी। तब उनकी समझ में यह आ गया कि जब तक मोझेस के हाथ और लाठी ऊपर उठाये हुए थे, तब तक ही ज्यूधर्मियों की जीत हो रही है। जब जब मोझेस के हाथ नीचे लाये जाते थे, तब तब आमलेकी टोलीवाले जीतने लगते थे। फिर उन तीनों को एक तरक़ीब सुझी। मोझेस को एक बड़े से पत्थर पर बिठाकर, आरॉन और हूर ने उसके एक एक हाथ को आधार देते हुए उसके हाथ ऊपर उठाकर रखे। ऐसा एक पूरा दिन घमासान युद्ध चला और आख़िरकार ज्यूधर्मियों की जीत होकर उन्होंने आमलेकी टोलीवालों को खदेड़ दिया। एक्झोडस् के बाद ज्यूधर्मियों के कई आक्रमकों के साथ अनेक युद्ध हुए, उनमें से यह पहला ही युद्ध था।

ज्यूधर्मियों की अगली सभी पीढ़ियों को, इस पहले युद्ध के बारे में जानकारी होने के लिए, इस युद्ध का वर्णन लिखकर उसे जतन कर रखने के लिए ईश्‍वर ने मोझेस से कहा।

उस समय ज्यूधर्मियों का वास्तव्य जहाँ पर था, वह रेफिदिम स्थान मोझेस के ससुराल के यानी मिडियन प्रांत के काफ़ी क़रीब था। ज़ाहिर है, इन लोगों के यहाँ पहुँचने की ख़बर मोझेस के ससुर तक – जेथरो तक पहुँची। जिस कार्य के लिए मोझेस मिडियन से रवाना हुआ था, वह कार्य संपन्न हुआ है, यह जानने पर जेथरो खुश हुआ और मोझेस की पत्नी झिपोरा और बच्चें गेरशॉम-एलिझर इन्हें मोझेस से मिलाने वह उन्हें लेकर मोझेस से मिलने आया।

जेथरो मिलने आ रहा है, यह ख़बर मोझेस के दूतों ने उसे दी। तब वह स्वयं इस समूह की सीमा तक जाकर उनका स्वागत कर, उन्हें अपने तंबू में ले आया।

मुश्किल परीक्षाओं से भरे इतने समय के बाद अपने परिवार के साथ पुनर्भेंट का अनुभव करते हुए मोझेस भावुक हो गया था। मोझेस काफ़ी समय तक अपने ससुर से बातें कर रहा था। उसने अथ से लेकर इति तक सारी हकीक़त जेथरों को बयान की। वह सुनकर, ईश्‍वर की महानता जाननेवाला जेथरो भी गद्गद हो उठा।

उसके बाद जेथरो भी उनके साथ ही रहा। लेकिन उसने देखा कि इतने विशाल लाखों के जनसमुदाय की ज़िम्मेदारी अकेले मोझेस के ही कन्धे पर है। ईश्‍वर ने ही मोझेस को ‘ज्यूधर्मियों के नेता’ के रूप में चुना होने के कारण, ईश्‍वर की आज्ञाओं को ज्यूधर्मियों तक पहुँचाने का काम वही करेगा, यह तो स्वाभाविक था। लेकिन हाल ही में जीवनभर की ग़ुलामी में रिहा हुए होने के कारण, तब तक केवल इजिप्शियन लोगों की आज्ञाएँ ही कोड़ों की फटकार के साथ सुनने के आदी होनेवाले ज्यूधर्मियों में तक तक निर्णयक्षमता उतनी विकसित नहीं हुई थी और सीधीसादी बातों के लिए भी वे मोझेस पर ही निर्भर करते थे। इस कारण, ईश्‍वर की आज्ञाओं को ज्यूधर्मियों तक पहुँचाने के अलावा बाक़ी सारे काम भी – यहाँ तक कि दैनंदिन कामों से लेकर ज्यूधर्मियों में हुए किसी झगड़े में फैसला सुनाने तक सारे काम – मोझेस को ही करने पड़ते थे। मोझेस हालाँकि उन कामों को बिना-तक़रार करता था, मग़र फिर भी उसके अकेले पर ही सारा बोझ होने के कारण, कई बार कामों को लेकर कुप्रबन्ध भी हो जाता था। अचानक उठीं किसी समस्या का निवारण करते समय महत्त्वपूर्ण आवश्यक काम कई बार पीछे छूट जाते थे।

यह सारा कुप्रबंध जेथरो ने देखा। कल ‘प्रॉमिस्ड लँड’ में पहुँचने के बाद यदि ज्यूधर्मियों का यह समूह ‘एक राष्ट्र’ के रूप में अस्तित्व में आना चाहता है, तो इस समूह को अभी से ही अपने आप को सुनियंत्रितता की आदत डाल लेनी होगी, ऐसा जेथरो के मन ने ठान लिया। उसने फिर मोझेस से चर्चा की और कामों का विभाजन करने की एक व्यवस्था (डेलिगेशन) शुरू करने के बारे में उसने मोझेस को सलाह दी।

‘सबसे पहले मोझेस को चाहिए कि वह इन ज्यूधर्मियों में से धर्मभीरू, नीतिमान्, ताकतवर तथा जिस ध्येय के लिए ज्यूधर्मियों ने इजिप्त से स्थानांतरण किया है, उस ध्येय के साथ एकनिष्ठ होनेवाले आदमी चुनें। उसके बाद हज़ार-हज़ार ज्यूधर्मीय लोगों के समूहों पर, इन चुने हुए व्यक्तिओं में से एक एक आदमी नेता के रूप में नियुक्त किया जाये और उन्हें मार्गदर्शक तत्त्व एवं उनका अधिकारक्षेत्र इच्छा तरह से समझाकर बताया जाये। ये नेता अपने अपने अधिकारक्षेत्र में होनेवाले उन हज़ारों के समूह का खयाल रखेंगे, उनकी ज़रूरतों का ध्यान रखेंगे, उनके छोटे-मोटे झगड़ें सुलझायेंगे, उन लोगों की परेशानियाँ कैसे कम हो सकती हैं और वे लोग कैसे भाईचारे से रह सकते हैं, इसकी ओर ध्यान देंगे।

उसके बाद ऐसे सौ-सौ नेताओं पर एक ज्यूधर्मीय नियंत्रक होगा, जो मोझेस का ख़ास विश्‍वासनीय होगा। ऐसे नियंत्रक ठेंठ मोझेस के संपर्क में होंगे और अपने अपने गुट के उन उन सौ नेताओं के कामकाज़ के ब्योरे के साथ ही, उन नेताओं के अधिकारक्षेत्र के बाहर होनेवालीं समस्याओं को पहचानकर उन्हें मोझेस तक पहुँचाने का काम करेंगे। यानी कि, इस पदक्रमवाली संरचना में से (‘हायरार्की’ में से) लोगों की समस्याएँ तथा भावनाएँ मोझेस तक पहुँचायीं जायेंगी और मोझेस के निर्णय एवं सन्देश पुनः उलटे इसी पदक्रमवाली संरचना में से आमजनता तक पहुँचाए जायेंगे’ ऐसी योजना जेथरो ने मोझेस को सूचित की।

ईश्‍वर का इतना विश्‍वासपात्र होने के बावजूद भी पैर अभी तक ज़मीन पर ही होनेवाला मोझेस, जेथरो ने बिना-पूछे ही दी इस सलाह पर ग़ुस्सा न होकर, उल्टे उसे यह योजना पसन्द आयी और उसने इस योजना को मंज़ुरी देकर उसपर अमल करना भी शुरू किया।

इस प्रकार, ज्यूधर्मियों के उस समूह का, सुनियंत्रित समूह में – ‘एक राष्ट्र में’ रूपांतरण होने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम बढ़ा था! (क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर