३८. डेव्हिड के बाद सॉलोमन इस्रायलियों का राजा; ज्यूधर्मियों के सर्वोच्च ‘होली टेंपल’ का निर्माण


जेरुसलेम इस्रायलियों के कब्ज़े में आ गया और डेव्हिड ने ‘टॅबरनॅकल’ एवं ‘आर्क ऑफ कॉव्हेनन्ट’ को जेरुसलेम में समारोहपूर्वक स्थानांतरित किया| डेव्हिड को हालॉंकि मंदिर के निर्माण की अनुमति नहीं दी गयी थी, मग़र मंदिर के निर्माण के लिए आवश्यक होनेवाली, सोना, चॉंदी, कांस्य, अन्य मूल्यवान वस्तु, ईमारतनिर्माण के लिए आवश्यक विभिन्न प्रकार के पत्थर आदि सामग्री का संग्रह करने की उसने धीरे धीरे शुरुआत की|

उस समय हालॉंकि लड़ाइयॉं शुरू नहीं थीं, मग़र डेव्हिड यह जानता था कि जब तक इस्रायलियों के आसपास दुश्मन हैं, तब तक यह शान्ति झूठी है| इस कारण उसने बार बार मुहिमें आयोजित कर अराबी, मोआबी, अमोनी, आमलेकी इन दुश्मनों को, साथ ही इस्रायलियों के जानी दुश्मन होनेवाले फिलिस्तिनियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और फिलिस्तिनियों की तत्कालीन राजधानी की नगरी ‘गाथ’ को अपने कब्ज़े में रखा| उसके बाद उसने ‘रब्बाह’ (हाल के सिरिया का एक शहर) यह मोआबियों के राज्य को भी जीत लिया|
डेव्हिड

उसीके साथ ‘झोबा’ (हाल के सिरिया का एक प्रदेश) यह एक और बहुत बड़ा और महत्त्वपूर्ण पड़ोसी राज्य पर डेव्हिड ने कब्ज़ा किया| दमास्कस से लेकर युफ्रेटिस नदी तक झोबा का विस्तार था| इस प्रकार इस्रायली साम्राज्य धीरे धीरे बढ़ रहा था| ‘इजिप्त नदी से लेकर युफ्रेटिस नदी तक’ ऐसा ईश्‍वर ने अभिवचन दी भूमि का (‘प्रॉमिस्ड लँड’) अधिक से अधिक प्रदेश डेव्हिड के नियंत्रण में आता जा रहा था, जिसमें हाल के सिरिया, जॉर्डन और लेबेनॉन में होनेवाला प्रदेश भी समाविष्ट था| दरअसल इस ‘प्रॉमिस्ड लँड’ का अधिक से अधिक हिस्सा डेव्हिड के कार्यकाल में ही इस्रायलियों के नियंत्रण में आया था|

अब बतौर एक समाज इस्रायली लोग सुस्थिर होने लगे थे| उनका कारोबार भी बढ़ता चला जा रहा था| अब जेरुसलेम की शोहरत आसपास के इलाक़ो में फैलती चली जा रही थी| कॅनान के पड़ोसी ‘तायर’ प्रांत का राजा ‘हिराम’ (पहिला) ने भी जेरुसलेम की ख्याति सुनी| हिराम ने डेव्हिड के साथ दोस्ती का समझौता कर उसके प्रस्तावित आलीशान राजमहल के निर्माण के लिए, अपने राज्य में पायी जानेवाली, बहुत ही टिकाऊ मानी जानेवाली, क़ीमती देवदार वृक्ष की लकड़ियों की आपूर्ति की| आगे चलकर सॉलोमन के कार्यकाल में होनेवाले ‘होली टेंपल’ के निर्माण में भी हिराम का महत्त्वपूर्ण सहभाग होनेवाला था|

इस प्रकार लगभग चालीस साल इस्रायल पर राज करने के बाद उम्र के ७० वें साल में डेव्हिड की मृत्यु हुई| डेव्हिड यह शूरवीर एवं नीडर योद्धा के रूप में विख्यात था, उसने जीवन में कई लड़ाइयों में विजय प्राप्त की, उसे अपरंपार शोहरत मिली| लेकिन इन सबसे परे डेव्हिड का बड़प्पन ‘ईश्‍वर पर का अटूट विश्‍वास एवं सबुरी यही है’ ऐसा कहना पड़ेगा| उसके हाथों ग़लतियॉं हुईं, कुछ पाप भी हुए, लेकिन उसे उनको लेकर पश्‍चात्ताप होनेके बाद उसने उन पापों को ईश्‍वर के सामने प्रामाणिकता से क़बूल किया और यह मान लिया कि उसके हाथों ग़लती हो गयी| इसी कारण उसे मिलनेवालीं सज़ाएँ भी सौम्य कर दी गयीं| इन्हीं कारणों से राजा डेव्हिड यह उसकी मृत्यु के बाद भी ज्यूधर्मियों के लिए आदर्श बना|

डेव्हिड के बाद उसका बेटा सॉलोमन इस्रायल का राजा होगा, ऐसी ईश्‍वर की ही इच्छा थी, ऐसा इस कथा में स्पष्ट रूप से कहा गया है| लेकिन डेव्हिड के अन्य कुछ बेटों के दिलों में भी डेव्हिड के बाद राजा होने की सुप्त इच्छा थी ही और उस दृष्टि से उनके ख़ुफ़िया कारनामें भी शुरू हो चुके थे| इस कारण डेव्हिड ने मृत्युशय्या पर होते हुए ही सॉलोमन को ‘अगला राजा’ घोषित किया था और उसका राज्यशासन का, साथ ही टोराह का प्रशिक्षण शुरू भी किया था| डेव्हिड के इस निर्णय का हालॉंकि सॉलोमन के अन्य सौतेले भाइयों ने या तो गुप्त रूप से या फिर खुलेआम विरोध किया, मग़र फिर भी अपने अन्य बेटों ने की बग़ावत को मात देकर डेव्हिड ने सॉलोमन को ही राजा बनाया| उस समय सॉलोमन की उम्र बारह साल थी|

उसके कुछ ही दिन बाद डेव्हिड की मृत्यु हुई थी| शोक की कालावधि ख़त्म होने के बाद सॉलोमन ने ईश्‍वर के पास कृपायाचना कर, इन्साफ़ से शासन करने के लिए सद्बुद्धि एवं सारासारविवेकबुद्धि मॉंगी| यह मॉंग ईश्‍वर ने आनन्दपूर्वक मान ली और उसकी इस उचित मॉंग से प्रसन्न होकर – ‘यदि टोराह का प्रामाणिकता से पालन करोगे, तो तुम्हें और तुम्हारे वंश को किसी बात की कमी नहीं होगी’ ऐसा आशीर्वाद दिया|

सॉलोमन का कालखंड यह तौलनिक दृष्टि से शान्ति से गुज़रा| डेव्हिड ने पहले ही परास्त किया, कॅनान के आसपास के प्रदेश स्थित दुश्मन तथा तटस्थ राजा भी इस्रायलियों के साथ मित्रता के संबंध रखना चाहते थे और उसके लिए कोई अपने पास होनेवाले अच्छी क़िस्म के घोड़े तथा अन्य उपयुक्त जानवर, कोई बेहतरीन शस्त्र, तो कोई सोना, चॉंदी, गहनें-आभूषण, क़ीमती लकड़ी, गृहनिर्माण के सर्वोत्तम पत्थर आदि विभिन्न क़ीमती वस्तुएँ सॉलोमन को उपहारस्वरूप प्रदान करते थे| इस्रायल यह आशिया एवं अफ्रिका महाद्वीपों को जोड़नेवाला एक अग्रसर कारोबारी केंद्र के रूप में मशहूर हो रहा था|

‘होली टेंपल’, निर्माण, सॉलोमन, राजा, नियंत्रण, इजिप्त, अफ्रिकाराज्यकारोबार की बागड़ोर सँभालने के चौथे वर्ष में सॉलोमन ने ज्यूधर्मियों के सर्वोच्च ‘होली टेंपल’ का निर्माण शुरू किया| जहॉं सैंकड़ों साल पहले इस्रायली लोगों का आद्यपूर्वज अब्राहम ईश्‍वर की आज्ञा से अपने पुत्र आयझॅक की बली चढ़ाने के लिए तैयार हुआ था, वह ‘माऊंट मोरिया’ पर्वत यह इस टेंपल का स्थान होनेवाला था|

हज़ारों मजदूरों ने दिनरात एक करके किये इस टेंपल के निर्माण को सात साल लग गये| डेव्हिड ने इस टेंपल के लिए जमा कर रखीं निर्माण-उपयोगी वस्तुओं के साथ ही आसपास के राजाओं ने दोस्ती की खातिर उपहारस्वरूप भेजीं वस्तुओं का भी निर्माण में इस्तेमाल किया गया| उस एक साल में सॉलोमन के पास केवल ऐसे उपहारों के जरिये हज़ारों किलो सोना जमा हुआ था| उसीके साथ पड़ोसी तायर राज्य के राजा हिराम (पहले) ने भी डेव्हिड से होनेवाली अपनी दोस्ती को डेव्हिड के बेटे – सॉलोमन के साथ भी बरक़रार रखा था| उसने भी इस टेंपलनिर्माण के काम में सॉलोमन की शुरू से सहायता की| इतना ही नहीं, बल्कि सॉलोमन की विनति पर उसने इस काम में बहुत ही माहिर होनेवाले एक कारिगर को सॉलोमन के पास भेजा, जिसका नाम भी संजोगवश ‘हिराम’ ही था|

सात साल में इस टेंपल का निर्माण पूरा हो जाने के बाद, जेरुसलेम में स्थापन किये गये ‘आर्क ऑफ कॉव्हेनन्ट’ को सॉलोमन समारोहपूर्वक धर्मोपदेशकों की शोभायात्रा के साथ इस मंदिर में ले आया|

इस अभूतपूर्व समारोह को देखने सारे कॅनानप्रांत से ज्यूधर्मीय जेरुसलेम आये थे| इजिप्तवासियों की ग़ुलामी में से ज्यूधर्मियों की रिहाई होने के बाद जब ‘ईश्‍वर के रेगिस्तान में अस्थायी स्थान’ के रूप में टॅबरनॅकल बनाया गया था, उसके तक़रीबन पौने-पॉंचसौ साल बाद यह स्थायीस्वरूप ‘होली टेंपल’ तैयार होकर, टॅबरनॅकल उसमें विलीन किया गया| ज्यूधर्मियों के इस सर्वोच्च मंदिर के निर्माण के साथ राजा सॉलोमन का नाम दृढ़तापूर्वक जुड़ा गया है|

डेव्हिड

इस टेंपल की तथा राजा सॉलोमन की बुद्धिमत्ता की ख्याति भी दूर-दूर के देशों में फैल रही थी| निर्माणकार्य का यह सुन्दर नमूना देखने के लिए और राजा सॉलोमन की बुद्धिमानी की झलक देखने दूर दूर से लोग, यहॉं तक कि राजा-महाराजा भी चले आते थे| ऐसी ही एक कथा बतायी जाती है, ‘क्वीन ऑफ शेबा’ की, जो कुछ अभ्यासकों के मतानुसार दक्षिण अरबस्तान के एक राज्य की रानी थी; वहीं, कुछ लोगों के मतानुसार एक अफ्रिकी राज्य की! बहुत ही बेशक़ीमती नज़रानों से लदे कई ऊँटों का झुँड़ लेकर वह सॉलोमन से मिलने आयी| उसने पूछे हुए कई कूटप्रश्‍नों के सॉलोमन ने आसानी से जवाब दिये| सॉलोमन की तेज़ बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उसने खुशी से, अपने साथ लाये क़ीमती नज़राने सॉलोमन को भेंट किये और वह वापस लौट गयी|

सॉलोमन ने भी लगभग ४० साल शासन किया| बूढ़ापे में उसके भी हाथों कई ग़लतियॉं हुईं, कुछ बार तो टोराह का उल्लंघन भी उसके द्वारा किया गया| ईश्‍वर ने उसे इसका एहसास कराया, लेकिन डेव्हिड को वचन दिया होने के कारण उसने सॉलोमन को ठेंठ सजा नहीं दी; बल्कि ‘इस्रायल के साम्राज्य के टुकड़े होते देखना तुम्हारे बेटे को नसीब होगा’ ऐसा ईश्‍वर ने सॉलोमन से कहा| सॉलोमन के आख़िरी दिनों में उसी के ‘जेरोबम’ नामक एक सेनाधिकारी ने उसके खिलाफ़ बग़ावत की| सॉलोमन ने उसे क़ामयाब नहीं होने दिया और जेरोबम अपनी जान बचाने के लिए इजिप्त में भाग गया| जीवन भर इस्रायल का उत्कर्ष देखे हुए और उस उत्कर्ष का एक साधन बने सॉलोमन को अपने जीवन के आख़िरी दिनों में ये सदमें सहन करने पड़ रहे थे|

सॉलोमन के बाद उसका पुत्र ‘रेहाबम’ इस्रायल की राजगद्दी पर बैठ गया, लेकिन….(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर