दिल्ली भाग-५

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मयूरसिंहासन। दिल्ली के अतीत के एक लंबे दौर का यह गवाह रह चुका है। सोना, हीरें, मोती, माणिक, पन्नें इनसे बने इस सिंहासन पर मार्च १६३५ में सर्वप्रथम विराजमान हुआ, दिल्ली का शासक ‘शाहजहाँ’।

पिछले लेख में हम ‘तवेर्नियर’ इस फ्रान्सिसी जौहरी द्वारा किये हुए मयूरसिंहासन के वर्णन को पढ़ ही चुके हैं। उसने स्वयं इस सिंहासन को देखा था। उस समय के लिखे गये वृत्तान्त से यह जानकारी मिलती है कि अधिकतर इस सिंहासन को ‘दीवान-ए-ख़ास’ में रखा जाता था, लेकिन कभीकभार उसे ‘दीवान-ए-आम’ में भी रखा जाता था।

अब पुन: एक बार सिंहासन की ओर रुख करते हैं। पिछले लेख में हमने यह देखा कि ११५० किलो शुद्ध स्वर्ण से बने इस सिंहासन को २३० किलो रत्नों, हीरों एवं मोतियों से सजाया गया था। मशहूर ‘कोहीनूर’ हीरा इसी में जड़ा गया था और साथ ही कई बहुमूल्य रत्न भी। इस सिंहासन में कुल ११६ पन्नें एवं १०८ माणिक भी थे।

इस जगमगाते सिंहासन पर बैठकर शाहजहाँ ने दिल्ली में से शासन किया। उसके बाद उसके वंशजों ने इस पर बैठकर हुकूमत की। अठारहवीं सदी में नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला किया और इस सिंहासन को वह अपने साथ ले गया। सिंहासन के इसके बाद के सफ़र के बारे में अलग अलग बातें बतायी जाती हैं। कुछ लोगों की राय में नादिरशाह का अन्त करानेवालों के कब्ज़े में यह सिंहासन चला गया और आगे चलकर उसमें स्थित बहुमूल्य रत्नों को निकाल लिया गया।

अन्य राय के अनुसार नादिरशाह की मौत के बाद अँग्रेजों ने इस सिंहासन पर कब्ज़ा कर लिया और वहाँ से जहाज़ द्वारा उसे अन्य जगह ले जाते समय वह जहाज़ डूब गया और उसके साथ वह सिंहासन भी सागर की गहराई में खो गया। लेकिन कुछ लोगों की राय में इस सिंहासन के कुछ हिस्सों को डूबने से बचाने में कामयाबी मिली थी। संक्षेप में, आज की तारीख़ में इस सिंहासन का अस्तित्व इस पृथ्वी पर से समाप्त हो चुका है, ऐसा कहा जाता है। तो यह है ‘मयूरसिंहासन’ की कहानी।

देखिए, बातें करते करते हम लाल क़िले में से बाहर आ भी गये। चलिए, अब एक नयी वास्तु को देखने चलते हैं।

दर असल नई और पुरानी दिल्ली में ऐतिहासिक एवं कलात्मकता की दृष्टी से महत्त्वपूर्ण रहनेवाली कई वास्तुएँ हैं। इनमें से हर एक वास्तु का अपना एक इतिहास, अपनी एक ख़ास पहचान, विशेषताएँ और सुन्दरता हैं, इसीलिए हम बड़े ही आराम से उन्हें देखेंगे।

अरे, वह देखिए। एक लाल रंग का मीनार दूर दिखायी दे रहा है। लाल क़िले की तरह इस मीनार का निर्माण भी लाल रंग के वालुका-पत्थरों द्वारा किया गया है। चलिए, उसे देखते हैं। अब तक शायद आप उसका नाम भी जान चुके होंगे। जी हाँ, यही है वह ‘कुतुब मीनार’।

७२.५ मीटर्स की ऊँचाईवाले इस ‘कुतुब मीनार’ का निर्माण ‘कुतुबुद्दिन ऐबक’ ने किया, ऐसा कहा जाता है। कुछ लोगों की राय में दिल्ली के शासक रहनेवाले राजपूतों ने इसकी नींव रखी थी और जब उन्हें कुतुबुद्दिन ने परास्त कर दिया तब अपनी जीत के प्रतीक के रूप में उसने इस मीनार का निर्माण कार्य शुरू कर दिया। वहीं कुछ लोगों का कहना यह है कि कुतुबुद्दिन नामक सन्त के शागीर्द रहनेवाले उस समय के शासक ने इसे यह नाम दिया।

बारहवीं सदी के अन्त में इस मीनार की नींव रखी गयी और कुतुबुद्दिन ने इसकी पहली मंजिल बनाने तक के कार्य को पूरा किया। उसके बाद की तीन मंज़िलों को तेरहवीं सदी में उसके वंशज ‘इतुत्मिश’ ने बनाया, ऐसा कहा जाता है।

साढ़े बहत्तर मीटर्स की ऊँचाईवाला यह मीनार नीचे से ऊपर तक शंकु के आकार का है। इसकी हर मंज़िल के चारों ओर गॅलरी जैसी रचना का निर्माण भी किया गया है। मीनार के ऊपर तक जाने के लिए कुल ३७९ सीढ़ियाँ भी बनायी गयी हैं। इसका अर्थ यह है कि इस मीनार की सभी मंज़िलों तक जाकर वहाँ से लोग आसपास के नज़ारे को किसी ज़माने में देखते होंगे। कुछ लोगों का कहना यह है कि सामूहिक प्रार्थना करने के लिए लोगों को बुलाने के लिए इसका उपयोग किया जाता था। लेकिन इसकी ऊँचाई को देखते हुए इस राय को निराधार क़रार दिया गया है।

इस ऊँचे गोलाकार मीनार पर जालियों तथा फूलों की ऩक़्क़ाशियाँ बनायी गयी हैं। यह मीनार इतना ऊँचा है कि पत्थरों, ईंटों से बना यह दुनिया का सबसे बड़ा मीनार है, ऐसा कहा जाता है। इसे युनेस्को द्वारा ‘वर्ल्ड हेरिटेज’ के रूप में घोषित किया गया है।

समय के साथ इस मीनार की रचना में जिस तरह वृद्धि होती रही, उसी तरह इस मीनार को प्राकृतिक आपदाओं का सामना भी करना पड़ा। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए हालाँकि इसके कुछ हिस्से का नुकसान ज़रूर हुआ है, मग़र समय पर किये गये रिपेअर के काम के कारण यह आज भी खड़ा है।

फिरोज़शाह के शासनकाल में भूकंप से ढह चुके मीनार की ऊपरि दो मंज़िलों का उन्होंने पुनर्निर्माण किया। सोलहवीं सदी में भी इस तरह का काम करना पड़ा। वहीं अठारहवीं सदी के अंत में यह रिपेरिंग का काम किसी अँग्रेज इंजिनियर द्वारा किया गया।

तो ऐसा यह कुतुब मीनार प्राकृतिक आपदाओं को सहते हुए, थोड़ा-बहुत नुकसान उठाते हुए आज भी शान से खड़ा है।

इस कुतुब मीनार के परिसर में कई छोटी बड़ी वास्तुएँ हैं।

यहाँ पर ११९८ में कुतुबुद्दीन द्वारा बनाया गया एक प्रार्थनास्थल भी है। साथ ही इतुत्मिश की स्मृति भी इसी परिसर में है।

क्या आप लोहे के बारे में जानते हैं? अचानक से यह सवाल पूछने की वजह क्या है, यह शायद आप सोच रहे होंगे।

हमारे भारतवर्ष में बहुत पुराने ज़माने से लोहे का उपयोग किया जाता था। अब हम रोज़मर्रा के जीवन में लोहे का उपयोग कई जगह करते हैं। लेकिन कुतुब मीनार के साथ इसका क्या ताल्लुख़ है?

हवा के संपर्क में आने से लोहे को जंग (रस्ट) लगती है, यह तो आप जानते ही होंगे। अब आप सोच रहे हैं कि लोहे के बारे में इतना घुमाफिराकर मैं क्यों बात कर रही हूँ? तो चलिए, ठेंठ मुद्दे की बात करते हैं।

कुतुब मीनार के परिसर में एक लोहे का स्तम्भ है। लेकिन यह कोई मामूली स्तम्भ नहीं है। यह स्तम्भ भारतीयों की प्राचीन धातुशास्त्रीय प्रगति की एक मिसाल है। क्योंकि लगभग सोलह सौं वर्ष बीतने के बावजूद भी आज तक इस लोहे के स्तंभ पर जंग नहीं लगी है।

अब आप समझ ही गये होंगे कि लोहे के बारे में इतने सवाल मैं क्यों कर रही थी?

दिल्ली, इतिहास, अतुलनिय भारत, कुतुब मीनार, दिल्ली, भारत, भाग-५कुतुब मीनार के परिसर में स्थित इस लोहस्तंभ (आयर्न पिलर) को यहाँ कौन ले आया, कैसे ले आया, कब ले आया यह आज भी एक अनसुलझी पहेली ही है। कुछ लोगों की राय में इसका मूल स्थान ‘विष्णुपदगिरी’ यह था। यह स्थान मध्य भारत में था ऐसा भी कहते हैं। गुप्तवंशीय ‘चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य’ नाम के राजा ने चौथी या पाँचवी सदी में इसका निर्माण किया ऐसा मानते हैं। विष्णुपदगिरि पर स्थित यह लोहस्तम्भ सूर्य की बदलती स्थिती ने अनुसार समय दर्शाने का काम करता था, यह भी कहा जाता है की शायद वहाँ पर स्थित जंतरमंतर का ही वह एक हिस्सा था।

कुछ लोगों की राय में दिल्ली का ‘विग्रह राजा’ नामक शासक इस स्तम्भ को यहाँ ले आया, वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इस स्तम्भ को बनाने का काम ‘अनंगपाल’ नाम के राजा ने किया।

दर असल ‘दिल्ली’-‘ढिल्ली’ यह नाम एक शिथिल (लूज़) स्तंभ के कारण इस नगर को मिला है, यह हम पहले ही पढ़ चुके हैं।

नीचे से ऊपर की ओर शंकु के आकारवाले इस स्तम्भ की ऊँचाई ७ मीटर्स है। छह टन से भी अधिक वज़नवाले इस स्तम्भ के तलस्थित हिस्से का व्यास (डायमीटर) १६.४ इंच है और ऊपरी छोर का व्यास १२.०५ इंच है। इस स्तंभ का लगभग सवा मीटर्स इतना हिस्सा जमीन में गढ़ा हुआ है और उसे मज़बूती दिलाने के लिए लोहे की कैचियों का सहारा दिया गया है।

इसके ऊपरी हिस्से (टॉप पोर्शन) पर प्राचीन समय में गरूडजी की प्रतिमा थी, ऐसा भी कहते हैं और इसीलिए यह विष्णुस्तम्भ हो सकता है, ऐसा भी माना जाता है।

इसके चिकने पृष्ठभाग पर किसी ‘चन्द्र’ नामक राजा की प्रशंसा कुरेदी गयी है। संस्कृत भाषा में वर्णित इस प्रशंसा को ब्राह्मी लिपि में कुरेदा गया है।

इस प्रशंसा में ‘यह राजा बहादुर है और इसने दुश्मनों को परास्त किया है’ ऐसा उल्लेख मिलता है।

अध्ययनकर्ताओं की राय में इस वर्णन में जिस ‘चन्द्र’ राजा का उल्लेख किया गया है, वह पूर्वोक्त ‘चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य’ हो सकता है।

इस लोहे के स्तम्भ के निर्माण में ९८% ‘रॉट आयर्न’ का उपयोग किया गया है। कुल सोलह सौं वर्षों से दिन-रात यह स्तम्भ धूप, आँधी, बारिश, धूल, लोगों का संपर्क इन जैसी बातों को सह रहा है। साथ ही इसने कई आपत्तियों का मुक़ाबला भी किया होगा। मग़र इन सब बातों कि बावजूद भी इसपर रत्ती भर भी जंग नहीं लगी है। इसके पीछे भला क्या राज़ हो सकता है? इसी राज़ पर से परदा उठायेंगे, अगले एपिसोड़ में।