दिल्ली भाग-३

यमुना नदी के तट पर बसी दिल्ली का इतिहास विस्तृत है और यमुना उस पूरे इतिहास की मूक गवाह हैं।

यमुनोत्री में उद्गमित यमुना तेज़ी से बहते हुए मैदानी इलाके में दाखिल होती है और इस मैदानी इलाके में ही समय के विभिन्न पड़ावों पर विभिन्न नगर यमुना के तट पर बसते रहे। दिल्ली इनमें से ही एक है; लेकिन अन्य शहरों की तुलना में काफ़ी अरसे तक इतिहास का केन्द्रस्थान बना हुआ और वर्तमान समय में भी मध्यवर्ती भूमिका रहनेवाला।

इतिहास कहता है कि महाभारत काल में पांडवों ने यहाँ पर अपनी ‘इन्द्रप्रस्थ’ नामक राजधानी बसायी थी और पुरातत्त्ववेत्ताओं द्वारा की गयी खुदाई से इस बात को पुष्टि भी मिलती है। इससे हम यह कह सकते है कि दिल्ली के इतिहास का प्रारम्भ वहीं से होता है।

आगे चलकर इन्द्रप्रस्थ तो नहीं रहा, लेकिन इस भूमि पर एक नया नगर बस गया – ‘ढिल्ली’। इस ढिल्ली का वर्णन करनेवाला कवि कहता है कि हालाँकि यह इस भूमि पर बसे कई गावों में से एक है, लेकिन यहाँ के लोग इतने बहादुर है कि वे किसी विदेशी हुकूमत को बरदाश्त नहीं करते।

इसा की गणना के पूर्व आठवीं सदी के तोमर वंशीय ‘अनंगपाल’ नाम के राजा इस दिल्ली नगर के संस्थापक माने जाते हैं। इस बात की पुष्टि ‘पृथ्वीराज रासो’ इस काव्य में उसके रचयिता करता है। यह कवि बारहवीं सदी में दिल्ली के शासक रहनेवाले पृथ्वीराज नाम के राजा के दरबार में था। राजा के साथ युद्धों के समय वह जाता था और सैनिकों में वीरश्री जागृत करने के लिए गीत गाकर उन्हें प्रोत्साहित भी करता था।

अनंगपाल ने ‘लाल कोट’ नामक वास्तु का निर्माण करने के साथ साथ इस दिल्ली नगर की नींव रखी। ‘विबुध श्रीधर’ नामक व्यक्ति उस समय की दिल्ली का वर्णन करते हुए कहता है कि यहाँ पर चारों ओर खंदक़ रहनेवाला एक बहुत बड़ा क़िला है और साथ ही ‘अनंग’ नाम की एक झील भी है। यहाँ के बाज़ार में हमेशा ही वस्त्र, धान, मिठाईयाँ बड़ी तादाद में रहती थी और साथ ही वह इस जगह को अध्ययन का मध्यवर्ती केन्द्र भी कहता है।

इससे पहले इसा पूर्व तीसरीं सदी में मौर्य राजवंश के शासनकाल में यहाँ पर नगर बसाया गया था।

गत दो लेखों में हम नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली, दिल्ली के भूमि पर बस चुके अन्य शहर इनकी जानकारी प्राप्त करते हुए दिल्ली के इतिहास को भी संक्षेप में देख ही चुके हैं। आज उसमें थोड़ा गहराई से झाँकते हैं। क्योंकि किसी भी शहर का इतिहास वहाँ की भूमि जितना ही वहाँ की वास्तुएँ, नवनिर्माण, दर्शनीय स्थल और वहाँ के शासकों के साथ साथ वहाँ के आम नागरिक इन सब के साहचर्य से ही बनता है।

तो ऐसी यह दिल्ली! हज़ारो वर्ष पूर्व अस्तित्व में आयी हुई।

बारहवीं सदी के अन्त में अजमेर के चौहान राजवंश के शासक ने ‘लाल कोट’ जीतकर यहाँ पर सत्ता स्थापित की। उसने इस लाल कोट को ‘क़िला लाल पिथोरा’ यह नाम दिया। दिल्ली पर उसकी सत्ता अल्पजीवी रही, यह इतिहास से ज्ञात होता है; क्योंकि तेरहवीं सदी की शुरूआत में ही दिल्ली पर सुलतान की हुकूमत स्थापित हो गयी।

यहाँ से फिर दिल्ली की सरज़मीन पर विदेशियों की हुकूमत और जंग इनका सिलसिला शुरू हो गया।

तेरहवीं सदी के प्रारम्भ में दिल्ली पर ‘कुतुबुद्दिन ऐबक़’ ने सत्ता स्थापित की। इसीने जीत के प्रतीक के रूप में ‘कुतुब मीनार’ का निर्माण किया। लेकिन कुतुबमीनार का निर्माण कार्य उसके जीवन में पूरा नही हो सका। उसके बाद दिल्ली पर इस ग़ुलाम राजवंश का राज रहा। फिर दिल्ली के तख़्त पर खिलजी, तुघलक, सय्यद, लोदी, मुग़ल इन विभिन्न वंशो ने राज किया। यह साधारणत: तेरहवीं सदी से सतरहवीं सदी की शुरुआत तक का घटनाक्रम माना जाता है।

चौदहवीं सदी के अन्तिम चरण में दिल्ली पर किसी विदेशी हमलावर ने हमला करके इस नगरी को बेतहाशा लूटा था और अनगिनत ज़ुल्म भी ढाये थे, यह इतिहास से ज्ञात होता है।

इन विभिन्न शासकों ने उनके शासनकाल में विभिन्न वास्तुओं तथा स्मारकों का निर्माण किया। उन रचनाओं पर संबंधित शासकों की वास्तुशैली का प्रभाव हम आज भी देख सकते हैं।

साधारणत: सोलहवी सदी के प्रारंभ में पानिपत की पहली जंग के बाद मुग़लों का दिल्ली पर राज स्थापित हो गया और उन्होंने काफ़ी लंबे अरसे तक यहाँ पर राज किया। लेकिन उनके शासनकाल में भी कई बार अन्य विदेशी आक्रमकोंने दिल्ली जीतकर वहाँ पर अपनी सत्ता स्थापित की, यह उल्लेख भी मिलते हैं।

लेकिन इस इतिहास में दिल्ली पर स्वकीयों का राज बहुत ही अल्प समय तक रहा।

हूमायूँ, अकबर इन शासकों के नाम दिल्ली के इतिहास में ठोंस रूपसे सामने आते हैं। सोलहवीं सदी के अन्त में किसी ‘हिमू’ नामक स्वकीय ने दिल्ली पर सिर्फ़ एक महीने तक राज किया था, यह ज्ञात होता है। अकबर के शासनकाल में उसने आग्रा को राजधानी रखकर वहाँ से शासन किया।

लेकिन सतरहवीं सदी में शाहजहाँ ने यहाँ पर ‘शाहजहाँबाद’ यह शहर बसाया और दिल्ली पुन: एक बार सत्तास्थान बन गयी।

शाहजहाँ के बाद की उसकी पीढ़ियों ने यहीं से राज किया। मुग़लों को मात देने के लिए मराठों ने मुग़लों की दक्षिणी सत्ता को अपने क़ब्जे में कर लिया। उन्होंने उत्तर की ओर भी कूच किया। इसके बाद काफ़ी लंबे अरसे तक मराठों की बहादुरी का प्रभाव दिल्ली के तख़्त पर पड़ा।

पानिपत की तीसरी जंग के बाद दिल्ली पर फिर एक बार विदेशी हुकूमत स्थापित हो गयी। इसी दौरान अँग्रेज़ भारत में दाखिल हो चुके थे और उस समय के शासकों और अँग्रेज़ों के बीच कई जगह जंग छिड़ गयी। आख़िर कई छोटी-बड़ी रियासतों को निगलकर भारत पर कब्ज़ा करने की अँग्रेज़ों की मन्शा सफल हो गयी।

लेकिन इससे पहले भारतमाता के कई सपूतों ने उनका कड़ा विरोध किया, उन्हें यहाँ से खदेड़ देने की कई कोशिशें भी की। इनमें पहली कोशिश थी, १८५७ का स्वतन्त्रता संग्राम। अँग्रेज़ों की फौज़ में काम करनेवाले भारतीय सैनिकों के मन में उमड़ी असन्तोष की चिंगारी इन्कलाब की आग की रूप में भड़क उठी।

भारतीय सैनिकों के साथ कुछ रियासतों के शासक भी जुड़ गये। दिल्ली के मुग़ल बादशाह ‘बहादुरशाह जफ़र’ भी उनमें से एक थे। अँग्रेजों ने उन्हें पदच्युत कर रंगून भेज दिया और यहीं से दिल्ली पर रहनेवाला मुग़ल शासन समाप्त हो गया और वहाँ पर अँग्रेज़ों की हुकूमत स्थापित हो गया।

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में इसी वजह से दिल्ली का महत्त्व अनन्यसाधारण है। दिल्ली पर सत्ता स्थापित करने के बाद वह अँग्रेज़ों के भारत के साम्राज्य के हिस्से के रूप में बनी रही।

सारे भारत वर्ष में सत्ता स्थापित कर चुके अँग्रेज़ों ने उस समय उनकी राजधानी के रूप में कोलकाता को चुना था। वहाँ से ही अँग्रेज शासन करते थे।

लेकिन १९११ में यकायक उन्होंने दिल्ली को राजधानी बना लिया। उनके द्वारा यहाँ पर बसायी गयी नगरी शुरू शुरू में ‘लुटीन्स दिल्ली’ इस नाम से जानी जाती थी और बाद में उसका नाम ‘नई दिल्ली’ हो गया।

नई दिल्ली की स्थापना के अन्य ऐतिहासिक संदर्भ हम गत लेख में पढ़ ही चुके हैं।

१९११ में हालाँकि दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा अँग्रेजों ने की थी, लेकिन उसका संपूर्ण विकास १९३१ में हुआ। १९३१ से लेकर १९४७ तक अँग्रेज़ोने दिल्ली से भारत पर राज किया।
१५ अगस्त १९४७ को आज़ाद हुए भारत की राजधानी दिल्ली ही बनी रही। ‘नई दिल्ली’ को भारत की राजधानी के रूप में घोषित किया गया।

तो यह था दिल्ली का लंबा चौड़ा इतिहास। इस दिल्ली ने स्वदेशी एवं विदेशी इनके युद्ध देखें, कई शासकों को और उनके शासनकालों को देखा। स्वतन्त्रता संग्राम को देखा और इसी दिल्ली की सरज़मीन पर १४ अगस्त १९४७ की मध्यरात्रि में बड़ी शान और गर्व के साथ आज़ाद भारत का तिरंगा लहराया था।

इसी दिल्ली ने कई वास्तुओं एवं स्मारकों के निर्माण को देखा और उन्हें विरासत के रूप में जतन भी किया। इसी दिल्ली ने सुख-दुख के कई पल देखें भी और महसूस भी कियें। यह सब दिल्ली उसकी साथी रहनेवाली यमुना के साथ करती रही। ऐसी इस दिल्ली का हमारा अगला सफ़र जारी रखेंगें, अगले भाग में।

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