दिल्ली भाग-४

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१४ अगस्त १९४७ की मध्यरात्री में सारे भारत की दृष्टि से एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना घटित हुई। जी हाँ! भारत आज़ाद हो गया। व्यापार करने आये और शासक बन बैठे अँग्रेज़ों की हमारे भारत पर रहनेवाली हुकूमत हमेशा के लिए समाप्त हो गयी। इस ऐतिहासिक घटना की और स्वतंत्रता के उस अत्युच्य पल की गवाह बनी, दिल्ली की एक वास्तु। जी हाँ! सही पहचाना आपने, लाल क़िला।

यमुना के तट पर स्थित इस ‘लाल क़िले’ का यानि कि ‘रेड फोर्ट’ का निर्माण लाल रंग के पत्थरों से किया गया है।

शाहजहाँ ने जब आगरे से अपनी राजधानी दिल्ली स्थलांतरित करने का फ़ैसला किया, तब उसने अपनी इस राजधानी की नगरी में इस क़िले का निर्माणकार्य शुरू कर दिया।

साधारणत: इसवी १६३८ में इस क़िले का निर्माणकार्य शुरू हुआ और आगे चलकर लगभग ९-१० वर्षों में वह पूरा हो गया। कुछ लोगों की राय में यह काम पूरा होने में इससे दुगुना समय लगा। लेकिन हम भला बाहर से इस क़िले की सुंदरता का आस्वाद क्यों ले रहे हैं? चलिए, क़िले में दाखिल होते हैं, फिर यह क़िला स्वयं ही अपनी कहानी बयान करेगा।

दर असल इस क़िले में प्रवेश करने के लिए दो प्रवेशद्वार बनाये गये हैं। इस क़िले के अतिविस्तार को देखकर हमें यह अँदाज़ा आ ही जाता है कि इसके प्रवेशद्वार भी विशाल ही होंगे। दर असल इस क़िले की विशालता का बाहर से हम स़िर्ङ्ग अँदाज़ा ही लगा सकते हैं, लेकिन उसको हम अनुभव करते हैं, भीतर दाखिल हो जाने के बाद ही।

चलिए, तो फिर १२० एकर्स में फैले इस लाल क़िले में ‘लाहोर गेट’ से दाखिल होते हैं, क्योंकि फिलहाल इस क़िले का ‘दिल्ली गेट’ यह दुसरा प्रवेशद्वार बंद रहता है। क़िले में जानेवाली राह गुज़रती है,‘छत्ता चौक’ में से। जिसकी छत बनायी गयी है, ऐसा यह ‘छत्ता चौक’ एक बाज़ार है। दिल्ली पर जब शाहजहाँ की हुकूमत स्थापित हुई थी, तब अधिकांश आबादी इस क़िले में ही बसा करती थी और उसी वजह से उनकी रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वालीं सारी चीज़ें इस क़िले में ही मौजूद थीं।

छत्ता चौक से गुज़रकर हम जब आगे बढ़ते हैं, तब लाल क़िले की वास्तुएँ दिखायी देने लगती हैं। हालाँकि इस क़िले का निर्माण शाहजहाँ ने किया था, लेकिन उसके बाद के शासकों ने भी उनके शासनकाल में आवश्यक वास्तुओं का निर्माण किया। आज भी यह क़िला मुग़ल वास्तुशैली का बेहतरीन नमूना माना जाता है।

क़िले की ख़ासियत है, यहाँ के खंभों पर किया गया ऩक़्क़ाशीकाम। यह काम सिर्फ़ कुरेद कर नहीं किया गया है, बल्कि कई रंग भरकर ऩक़्क़शियाँ निकाली गयी हैं। आलीशान दालान, बड़े बड़े महल, संगेमर्मर में कुरेदी गयी जालीवाली रचनाएँ इन सबके साथ साथ यहाँ पर हैं, कई फ़व्वारें और विभिन्न दालानों में से बहाया जानेवाला यमुना का जल एवं ख़ूबसूरत विशाल बग़ीचें, जिनमें मौसम के अनुसार तरह तरह के गुल खिलते हैं। लेकिन यह नज़ारा उस समय का है, जब यहाँ पर आबादी बसा करती थी। आज तो सिर्फ़ ऩक़्क़ाशीकाम, कुरेदकर बनायी गयी आकृतियाँ दालानों में मौजूद हैं, अतीत की गवाही देते हुए। हालाँकि आज यहाँ के फ़ौव्वारें उड़ते नहीं हैं, लेकिन उनका अस्तित्व आज भी है। यहाँ के दालानों में बनायी गयीं छोटी छोटी नहरों जैसी रचनाओं में से आज यमुना का जल न भी बहता हो, लेकिन उस बात की गवाही देनेवालीं रचनाएँ आज भी यहाँ मौजूद हैं।

इस क़िले की चहारदीवारी के साथ क़िले के चारों ओर बनाया गया विशाल खंदक भी उसकी रक्षा करता था। लेकिन इतना सबकुछ होने के बावजूद भी इस लाल क़िले को अतीत में आक्रमण का मुक़ाबला करना प़डा। इसवी १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद क़िले पर अँग्रेज़ों ने कब्जा कर लिया और यहाँ के शासक को बंदी बनाकर इस क़िले में रख दिया। कहा जाता है कि किसी ज़माने में इस क़िले के परिसर में लगभग तीन हज़ार की आबादी बसा करती थी। अँग्रेज़ों ने इस क़िले पर कब्जा करने के बाद इसका इस्तेमाल अपने प्रशासकीय काम के लिए करना शुरू कर दिया।

‘होशियार!’ कहते ही ‘दीवान-ए-आम’ में बैठे नागरिकों की खुसुरफुसुर बंद होकर वे राजा के आने का इंतज़ार करने लगते थे। ‘दीवान-ए-आम’ यह एक विशाल मुक्त दालान है। यहाँ पर हर एक नागरिक आ सकता था और अपनी फ़रियाद शासक तक पहुँचा सकता था। आम नागरिकों के लिए होने के बावजूद भी इस दालान के खंभों को ऩक़्क़ाशियों से सजाया गया है। यहाँ पर राजा का सिंहासन हुआ करता था। यह जानकारी भी मिलती है कि इस दालान के खंभों को, मेहराबों (आर्च) को स्वर्ण, चाँदी और बहुमूल्य रत्नों से सजाया गया था।

‘दीवान-ए-आम’ में जाने से पहले ‘नौबतख़ाने’ पर एक नज़र डालते हैं। नौबतख़ाना यानि राजा के पधारने की इत्तला करानेवाला या राजा के लिए दिन में कई बार बजाया जानेवाला नगाड़ा या नौबत जहाँ बजाये जाते थे, वह जगह।

‘दीवान-ए-ख़ास’ भी दीवान-ए-आम की तरह ही विशाल था। लेकिन यहाँ पर राजा कुछ ख़ास (स्पेशल) लोगों से ही मिला करता था, इसलिए इसका रूप-रंग दीवान-ए-आम से कुछ हटकर है।

आगे बढ़ने से पहले जिनका हम पहले ही ज़िक्र कर चुके हैं, उन नहर जैसी रचनाओं को देखते हैं।

दिल्ली का गरमी का मौसम जितना सख़्त, उतना ही जाड़ों का मौसम भी कड़ाके की ठंड का। लेकिन तेज़ गरमी का इलाज इस क़िले के रचनाकारों ने क़िले का निर्माण करते समय ही कर रखा था। दीवान-ए-ख़ास में, साथ ही राजा के निवास से संबंधित वास्तुओं में ज़मीन में खुदाई की गयी नहरें (कॅनॉल्स) दिखायी देती हैं। हालाँकि ये नहरें ज़्यादा गहरीं तो नही हैं, लेकिन काफ़ी लंबी ज़रूर हैं। खेत में जल की आपूर्ति करने के लिए जिस तरह की नहरों का निर्माण किया जाता है, उसी तरह इनकी रचना है। विभिन्न महलों में इन नहरों का निर्माण किया गया था। यमुना के जल को (विशेष योजना द्वारा) यहाँ तक ले आकर इन नहरों में से बहाया जाता था। इससे यह रचना तेज़ गरमी में भी नॅचरल ए.सी. का काम करती थी।

यह लाल क़िला इतना विशाल है कि बातों बातों में कुछ देखना हम भूल ही जाते हैं। जिस दीवान-ए-ख़ास को हमने देखा, वहाँ पर भी बीचोंबीच संगेमर्मर से बना एक बड़ा सा चबूतरा है और उसी चबूतरे पर वह लाजवाब, ख़ूबसूरत, बहुमूल्य ‘मयूरसिंहासन’ (पिकॉक थ्रोन) रखा जाता था। इस मयूरसिंहासन की सुंदरता को यदि बयान करना हो, तो लाजवाब, बेहतरीन ये शब्द ही मुँह से निकलेंगे। पहले हम क़िले को देखते हैं और वापसी में इस मयूरसिंहासन के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करेंगे।

तो क़िले के नॅचरल ए.सी. को देखने के बाद आइए अब कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण स्थल देखते हैं। राजा और उसके परिजनों के आवास के लिए कुल छह महल बनवाये गये थे। इन महलों का इस्तेमाल जिनके द्वारा किया जाता था याजिस काम के लिए किया जाता था, उसके अनुसार उनके कुछ ख़ास नाम रखे गये थे।

इनमें से ही एक है, ‘रंगमहल’। अपने नाम की तरह ही रंगीन! दर असल इसके भीतरी भाग को रँगा गया है, जिससे इसे ‘रंगमहल’ कहा जाता है। राजा के रानियों द्वारा इस महल का इस्तेमाल किया जाता था, ऐसा कहा जाता है। यहाँ के दालान में किये गये ऩक़्क़ाशीकाम में छोटे छोटे कई आइनों का उपयोग किया गया था। यहाँ बीचोंबीच एक कमल है और किसी ज़माने में इस कमल के चारों तरफ़ फ़ौव्वारें उछला करते थे और उसके जल में छत पर लगाये गये चाँदी-सोने के फूलों की छबि मन को मोह लेती थी।

‘खास महल’ में कई दालान थे और उनका इस्तेमाल राजा और उसके परिजन विभिन्न दैनिक कामों के लिए करते थे।

अब राजा से संबंधित सभी वास्तुओं का ख़ूबसूरत और कुछ अनोखा सा होना स्वाभाविक ही है। फिर उसका हमामख़ाना (स्नानागार) भी वैसा ही होगा। लाल क़िले में शाही ग़ुस्लख़ाने आज भी हैं, लेकिन वहाँ पर प्रवेश करने पर पाबंदी लगायी गयी है।

जिस ज़माने में इस क़िले में पूरा का पूरा शहर बसा करता था, तब यहाँ पर कितनी चहलपहल रहती होगी, इसका हम आज सिर्फ़ अँदाज़ा लगा सकते हैं।

जिसने स्वतंत्रता के उदय को देखा, उस लाल क़िले का महत्त्व आज भी १५ अगस्त को याद आता है।

अब वापसी में हम ‘मयूरसिंहासन’ के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करते हैं। राजा के इस सिंहासन के दोनों तरफ़ अपने परों को खोलनेवाले दो मोर थे यानि वे दो मोर इस सिंहासन का एक हिस्सा थे और इसी वजह से इस सिंहासन को ‘मयूरसिंहासन’ कहा जाता था। इसका महज़ वर्णन पढ़ने से ही हम ताज्जुब में पड़ जाते हैं।

‘तवेर्नियर’ नाम के किसी फ्रान्सीसी जौहरी ने इस सिंहासन का ‘आँखों देखा हाल’ बयान किया है। वह लिखता है ६बाय४ फीट के प्लॅटफॉर्म (बैठने की जगह) को चारों तरफ २० से २५ इंच के स्वर्ण से बने पैर थे। यहीं से ऊपर की दिशा में जा रहे बारह स्तम्भ थे, जो सिंहासन के चँदोवे (छत) को सहारा देते थे। इन स्तम्भों पर, माणिक, पन्नों, हीरों और मोतियों द्वारा ऩक़्क़ाशीकाम किया गया था। इसी सिंहासन पर वह मशहूर ‘कोहिनूर’ हीरा जड़ाया गया था।

देखिए, महज़ वर्णन को पढ़ने से ही हम वह सिंहासन कैसा होगा, इसकी कल्पना कर सकते हैं। जी हाँ! यह सच है कि शब्दसृष्टि और प्रत्यक्ष में काफ़ी फ़र्क़ होता है। लेकिन इस मामले में हमें सिर्फ़ शब्दसृष्टि का ही सहारा लेना पड़ेगा, क्योंकि आज यह सिंहासन धरती पर उपलब्ध नहीं है, ऐसा कहा जाता है।

संक्षेप में, मोती, हीरें, माणिक, पन्नें इस तरह के कई रत्नों से ऩक़्क़ाशीकाम किया गया यह सिंहासन था। इस सिंहासन के मोरों के खुले हुए पंखो में भी कई तरह के रत्न जड़ाये गये थे। इन मोरों की आकृति के बीच माणिक और हीरों से बनाये गयी पेड़ों की आकृतियाँ थीं।

इस संपूर्ण मयूरसिंहासन के निर्माण में कुल ११५० किलो शुद्ध स्वर्ण का इस्तेमाल किया गया था और इसमें इस्तेमाल किये गये हीरों, माणिक, पन्नों और मोतियों का वज़न कुल २३० किलो था और उस ज़माने में उस सिंहासन की क़ीमत थी, ४० मिलियन्स या १०० मिलियन्स।

मयूरसिंहासन के इस वर्णन को पढ़कर हमारी जिज्ञासा यक़ीनन ही जाग उठी होगी। तो फिर इस जिज्ञासा का शमन करेंगे, अगले लेख में।