रक्त एवं रक्तघटक – ५१

हम अपने रक्त की सफ़ेद पेशियों की जानकारी ले रहे हैं। हमारे शरीर में ‘हल्लाबोल’ करनेवाले विभिन्न जीवजंतुओं का प्रतिकार करने का और शरीर को उनके दुष्परिणामों से बचाने का कार्य ये पेशियां करती हैं। इन पेशियों की प्रतिकार करने की पद्धति अलग होती है। आज हम सबसे पहले न्युट्रोफ़िल पेशी और मोनोसाइट पेशी उर्फ़ मॅक्सोफ़ाज पेशीयों की कार्यपद्धति का अध्ययन करेंगें।

न्युट्रोफ़िल्स और मॅक्सोफ़ाज पेशियों की बचाव पद्धति :-

ये दोनों पेशियां शरीर पर आक्रमण करनेवाले सभी प्रकार के जीवाणुओं, विषाणुओं तथा अन्य घातक चीजों पर सीधा आक्रमण करती हैं। यह आमने-सामने युद्ध लड़ने जैसा होता है। इस युद्ध में सफ़ेद पेशियां जीवजंतुओं को मार देती है अथवा नष्ट कर देती हैं। मोनोसाइट पेशियां रक्त में रहते हुए जीवाणुओं को नष्ट नहीं कर सकतीं। रक्तवाहिनी में से बाहर निकलकर शरीर की पेशियों में प्रवेश करने के बाद ये आकार में बढ़ने लगती हैं। यहाँ पर इनका आकार मूल आकार के पाँच से छ: गुना बढ़ जाता है। अब इन आकार में बड़ी हो चुकी मोनोसाइट्स को मॅक्सोफ़ाज पेशी कहा जाता है। ये मॅक्सोफ़ाज पेशियां जीवाणुओं को नष्ट करने का कार्य करती हैं।

जीवाणुओं/विषाणुओं द्वारा शरीर पर आक्रमण किये जाने के बाद शरीर के पेशीसमूह में क्या घटित होता है, इसका अब हम अध्ययन करेंगे। इसके लिये हम जीवाणुओं अथवा विषाणुओं के शरीर में प्रवेश होने के बाद के घटनाक्रम को देखेंगें।

जीवाणुओं अथवा विषाणुओं के शरीर में घुसने के बाद किसी एक अवयव में उनकी वृद्धि शुरु होती है। इस वृद्धि के दौरान (यह वृद्धि संख्या में होती हैं यानी एक जीवाणु से हजारो जीवाणु तैयार हो जाते हैं।) अवयवों की बाधित पेशियां नष्ट हो जाती हैं। मृत पेशियों – जीवाणुओं से युक्त भाग में रक्तप्रवाह बढ़ जाता है और इन अवयवों में सूजन आ जाती है। इसे वैद्यकीय परिभाषा में ‘इनफ्लमेशन’ कहा जाता हैं। जब अवयवों में सूजन आती है तब वहाँ कुछ रासायनिक पदार्थ इकट्ठा हो जाते हैं। इसमें जीवाणुओं एवं विषाणुओं द्वारा स्रावित किया गया विष (toxin), मृतपेशी और जीवाणु इत्यादि का समावेश होता है। ये रासायनिक पदार्थ बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये पदार्थ न्युट्रोफ़िल्स और मॅक्सोफ़जेस इन्हें अपने पास आकृष्ट करते हैं। इस क्रिया को किमोटॅक्सीस (chemotaxis) कहते हैं।

किमोटॅक्सीस में जिन पेशियों को अधिक मात्रा में विषाणु बाधा होती है, वहाँ ये रासायनिक पदार्थ भी का़फ़ी मात्रा में जमा हो जाते हैं। फ़लस्वरूप न्युट्रोफ़िल पेशी भी बड़ी मात्रा में इसी भाग की ओर आकृष्ट होती है। बाधित स्थान से ज्यादा से ज्यादा १०० मायक्रोमीटर अंतर तक ही यह आर्कषण शक्ती काम करती है। इसका अर्थ यह है बाधित स्थान से रक्तवाहिनी यदि १०० मायक्रोमीटर की दूरी पर कहीं भी होगी तो भी सफ़ेद पेशियों को आकर्षित किया जाता है। रक्ताभिसरण संस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करते समय हमने देखा था कि शरीर का कोई भी पेशीसमूह ये केशवाहिनी से ५० मायक्रोमीटर से ज्यादा दूर नहीं रहताहै। ङ्गलस्वरूप विना प्रयास ही बड़ी मात्रा में सफ़ेद पेशियां रक्त से बाहर निकल जाती हैं। यह है परमेश्‍वरी योजना!

सफ़ेद पेशियां जिस तरीके से केशवाहनियों से बाहर निकलती हैं उसे डायपेडिसिस (Dia-pedesis)कहते हैं। यह क्रिया इस प्रकार होती हैं। केशवाहनियों की दीवार के छोटे छिद्र से ये पेशियां बाहर निकलती है। इस समय पेशी का कुछ भाग छिद्र की अपेक्षा छोटा व कोमल (लचीला) होकर छिद्र से बाहर निकलता हैं। उसके पीछे पेशी का शेष भाग भी लचीला होकर बाहर निकलता है।

कुछ ‘अमीबा’ जैसी क्रिया करके एक मिनट में ४० मायक्रोमीटर अंतर ये सफ़ेद पेशियां पार करती हैं और कार्यस्थल तक पहुँच जाती हैं।

किसी पेशीसमूह में जीवाणु अथवा विषाणु बाधा हो जाने पर महज़ एक से डेढ मिनिट की कालावधि रक्त की सफ़ेद पेशियां प्रतिकार के लिए पहुँच जाती हैं। हजारो सफ़ेद पेशियों से (न्युट्रोफ़िल पेशी) वह पेशीसमूह भर जाता है। न्युट्रोफ़िल पेशी इन जीवाणुओं को पहले खा जाती है अथवा निगल जाती है। इसे ‘फ़ॅगो सायटोसिस’ कहते हैं।

(क्रमश:-)