वरंगल भाग- २

काकतीय राजवंश के उदय एवं अस्त का गवाह होनेवाला वरंगल। दरअसल इन काकतीय राजाओं के शासनकाल में ही वरंगल पूरी तरह विकसित हुआ और काकतीयों की राजधानी का दर्जा प्राप्त होने के कारण वरंगल के विकास ने चोटी को छू लिया।

काकतीयों के जमाने में वरंगल में उत्तमोत्तम मंदिरों का निर्माण हुआ, यह पिछले लेख में हम पढ़ ही चुके हैं। साथ ही वरंगल ने व्यापार के क्षेत्र में भी का़फ़ी तरक्की की। इससे यह हमारी समझ में आता है कि काकतीय राजाओं ने केवल कला के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि व्यापार-उद्योग के क्षेत्र में भी वरंगल को का़फ़ी विकसित किया।

काकतीय राजवंश के उदय एवं अस्त

उस समय वरंगल में बहुत ही मुलायम सूती वस्त्रों का उत्पाद होता था। मार्को पोलो ने उसके स़फ़रनामे में वरंगल के मुलायम सूती वस्त्रों की का़फ़ी तारी़फ़ की है। सूती वस्त्रों के साथ साथ वरंगल में सुन्दर ऊनी कंबल भी बनाये जाते थे और रेशम की कारीगरी भी की जाती थी।

आज के वरंगल में भले ही ऊपर उल्लेखित बातें न हो रही हो, क्योंकि समय के साथ साथ बदलाव होते रहते हैं; मग़र फ़िर भी का़फ़ी समय तक वरंगल में कपास का उत्पाद बहुत बड़े प्रमाण में होता रहा। आज वरंगल एक बड़े बा़जार के रूप में मशहूर है और चावल यह यहाँ की प्रमुख फ़सल है।

वरंगल का क़िला काकतीय राजाओं की शिल्पकला का बेहतरीन नमूना माना जाता है। आज यह क़िला भग्नावस्था में है। मग़र आज भी इस क़िले के उपलब्ध भग्नावशेषों या थोड़ीबहुत सुस्थिति में रहनेवाले स्तम्भों का अवलोकन करने पर हम जान सकते हैं कि पुराने समय में यह क़िला कितना शानदार रहा होगा।

१२ वी सदी के अन्त में वरंगल के इस क़िले के निर्माणकार्य की शुरुआत हुई और काकतीय राजाओं की तीन पीढ़ियों ने इस क़िले के निर्माणकार्य को पूरा किया।

इस क़िले के विषय में एक जनश्रुति है। जब काकतीय वंश के रुद्रदेव राजा अपनी राजधानी को हनमकोंडा से उसके पास के वरंगल में ले आये, तब एक बार एक बैलगाड़ी पत्थर से टकरा जाने के कारण पलट गयी। उसके धक्के के कारण जमीन में एक दरार पड़ गयी और तब वहाँ पर एक स्वयंभू शिवलिंग पाया गया। इस शुभ शकुन के कारण रुद्रदेव ने उस स्थान पर मंदिर बनाया और क़िले का निर्माण करना भी शुरू किया। उसके बाद उन्होंने वहाँ पर एक नगर बसाया। यह शिवलिंग जहाँ पाया गया, वहाँ एक बहुत बड़ी अखण्डित रूप में फ़ैली हुई शिला थी, जिसे तेलुगु में ‘ओर्गुगल्लू’ कहते हैं। इसी ओर्गुगल्लू के यानि कि बहुत बड़ी शिला के सहारे वरंगल इस नगर को बसाया गया और इसीलिए यह नगर पुराने समय में ‘ओर्गुगल्लू’ इस नाम से जाना जाता था।

रुद्रदेव ने १२ वी सदी में वरंगल क़िले का निर्माण करना शुरू किया और उनके बाद राजगद्दी सँभालनेवाले गणपतिदेव और फ़िर राणी रुद्रम्मा देवी ने इसे जारी रखा। राणी रुद्रम्मा के शासनकाल में इस क़िले का निर्माणकार्य पूरा हो गया।

बहुत बड़े भूभाग पर बसे इस क़िले की सुरक्षा के लिए कुल तीन चहारदीवारों का निर्माण किया गया। उनमें से सबसे बाहरी चहारदीवारी मिट्टी से बनायी गयी थी और बीच की चहारदीवारी ग्रॅनाइट से बनायी गयी थी। क़िले में प्रवेश करने के लिए बड़े पत्थरों से बने चार दरवा़जे थे। उस हर दरवा़जे की ऊँचाई लगभग ३० फ़ीट है और उसपर बहुत ही ख़ास शिल्पकाम किया गया है। आज भी क़िले का यह सुन्दर प्रवेशद्वार सुस्थिति में है और वह वरंगल की पहचान बन गया है। इन प्रवेशद्वारों को काकतीयों का कीर्तितोरण कहा जाता है। क़िले के बीचोंबीच एक मंदिर है और इस मंदिर का शिल्पकाम बहुत ख़ास है।

आज भग्न अवशेषों के रूप में होनेवाला यह क़िला, जिन्हें प्राचीन शिल्पकला के बारे में जानने में रुचि है, उनके लिए जैसे एक अनोखी दावत ही है, क्योंकि इससे काकतीयों की शिल्पकला के कई पहलू हमारे सामने स्पष्ट होते जाते हैं और उनकी सुन्दरता को देखकर हम दंग रह जाते हैं। आन्ध्रप्रदेश के राज्यकर्ताओं में से काकतीय राजाओं की शिल्पकला का जिक्र अवश्य किया जाता है। दूसरी शैलियों की अपेक्षा इन राजाओं के समय की शिल्पकला बहुत ही नाज़ुक हुनरभरी, महीन और ख़ूबी से की गयी है। साथ ही काकतीयों के शासनकाल में चमकीले स्तम्भों का निर्माण किया गया।

वरंगल के क़िले से निकलकर अब हम वरंगल की एक और विशेषता का अवलोकन करते हैं। जिस तरह यह वरंगल की विशेषता है, उसी तरह काकतीय राजाओं की बेहतरीन शिल्पकला की विशेषता भी है।

‘ह़जार स्तम्भों का मंदिर’ कहने पर हमारी आँखों के सामने विशाल मंदिर का चित्र उभरकर आता है। है ना! ‘सहस्र स्तम्भों का मंदिर’ अथवा ‘वेय्यि स्तम्भल गुडी’ इन नामों से भी यह मंदिर जाना जाता है।

१२ वी सदी में ही इस मंदिर का निर्माणकार्य शुरू हुआ और लगभग ७२ वर्षों बाद यह मंदिर बनकर पूरा हो गया।

भारतीय पुरातत्त्व विभाग ने जब इस मंदिर में उत्खनन तथा पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया, तब इस मंदिर के मण्डप के नीचे कुछ कुए पाये गये। इससे यह सूचित होता है कि इस मंदिर का निर्माण जल पर यानि कि जल के स्रोत पर किया गया है। १००० इस संख्या से लेकर सभी पहलुओं में यह मंदिर अजूबों और बेमिसाल बातों से हमें चौका देता है।

रुद्रदेव द्वारा बनाये गये इस मंदिर में तीन प्रमुख देवता हैं – शिव, विष्णु और सूर्य। इस मंदिर में की गयी सूर्य की प्रतिष्ठापना से इस बात का प्रमाण मिलता है कि काकतीय वंश के राजा सूर्य के उपासक थे।

‘एक ह़जार स्तम्भ होनेवाला मंदिर’ कहने पर हमारी आँखों के सामने बहुत ही विशाल मंदिर का चित्र उभरकर आता है। लेकिन इस ‘वेय्यि स्तंभल गुडी’ का निर्माण बहुत ही सुघड़ एवं सुसंगत रूप से किया गया है। इस मंदिर में शिवजी के वाहन होनेवाले नंदीजी की बहुत बड़ी मूर्ति भी है।

फ़ूल, पत्तें ये तो शिल्पकाम में प्रायः दिखायी देनेवाले घटक हैं, लेकिन इनके साथ ही विभिन्न प्रकार की नक़्क़ाशी यह इस मंदिर की ख़ासियत है।

इस मंदिर का प्रवेशद्वार दक्षिण दिशा में है और प्रवेश करने के बाद फ़ौरन दिखायी देते हैं, गज यानि कि हाथी और वृषभ यानि कि बैल इनके शिल्प। इस मंदिर का ‘नाट्यमंडप’ ख़ास माना जाता है। प्राचीन समय में बनाये गये भारत के मंदिरों में नाट्यमण्डप तो अवश्य होता था, क्योंकि नृत्य-नाट्य ये ईश्‍वर की सेवा के, उनके चरणों में अर्पण करने के साधन के रूप में जाने जाते थे। इस नाट्यमण्डप की छत बहुत ही सुन्दर है। इससे हम यह अनुमान कर सकते हैं कि प्राचीन समय की वरंगल नगरी में यह मंदिर कितना महत्त्वपूर्ण रहा होगा! यहाँ के देवताओं की नित्य पूजा होती होगी, श्रद्धालु इनके चरणों में माथा टेकते होंगे और इस मंदिर को बनानेवाले राजा तथा उनके वंशज भी उनके उपास्य देवता के दर्शन करने आते होंगे। कोई नृत्य के माध्यम से ईश्वर की आराधना करता होगा। मगर कहते हैं ना, कालाय तस्मै नम:। काल के प्रवाह में राजा और राजसत्ता बह गये और साथ ही इन मंदिरों की ओर ध्यान देनेवाला कोई नहीं रहा। आज स़िर्फ़ शिल्पकला के एक बेहतरीन नमूने के रूप में इन मंदिरों को देखा जाता है।

ख़ैर! अब इस ह़जार स्तम्भों के मंदिर के बाद हम जानकारी हासिल करते हैं, वरंगल से लगभग ७७ कि.मी. की दूरी पर स्थित ‘रामप्पा मंदिर’ के बारे में।

‘रामलिंगेश्‍वर’ का यानि कि शिवजी का यह मंदिर ‘रामप्पा मंदिर’ इस नाम से जाना जाता है। साधारण तौर पर कोई भी मंदिर उसमें होनेवाले उपास्य देवता के अथवा यदि उस मंदिर में एक से अधिक संख्या में देवतागण हैं, तो उनमें से प्रमुख देवता के नाम से जाना जाता है। लेकिन यहाँ की बात कुछ और ही है।

‘रामप्पा’ इस मंदिर के मूर्तिकार थे और उन्हीं के नाम से इस मंदिर को ‘रामप्पा मंदिर’ कहते हैं, ऐसी एक राय है। मूर्तिकार के नाम से जाना जानेवाला शायद यह एकमात्र मंदिर होगा। भारतीय संस्कृति की एक विशेषता से भी हम यहाँ पर परिचित हो जाते हैं कि मूर्तिकार का नाम उसके द्वारा निर्मित मंदिर को देकर हमारी भारतीय संस्कृति ने मूर्तिकार को भी यथोचित सम्मान दिया है।

गणपतिदेव नाम के काकतीय राजा के कार्यकाल में उनके ‘रेचेर्ला रुद्र’ नाम के सेनापति ने १२ वी सदी में इस मंदिर का निर्माण किया। मंदिर के शिलालेख से ही हमें इस बात की जानकारी मिलती है। लगभग ४० वर्षों तक इस मंदिर का निर्माणकार्य चल रहा था, ऐसा इतिहास कहता है। यहाँ के हर एक खम्भे पर, यहाँ की छत पर बेहतरीन नक़्क़ाशीकाम किया गया है। साथ ही उनपर कुछ पौराणिक प्रसंगों तथा व्यक्तित्वों का रेखांकन भी किया गया है।

अन्य मंदिरों की अपेक्षा इस मंदिर की रचना थोड़ीसी अलग प्रकार की है। कुछ फ़ीट की ऊँचाईवाले चबूतरे पर प्रमुख मंदिर का निर्माण किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की छत का निर्माण ऐसी इटों के द्वारा किया गया है, जो इतनी हल्की हैं कि वे पानी पर भी तैर सकती हैं।

आज तक कईं भौतिक तथा प्राकृतिक आक्रमणों का सामना करने के बाद भी यह मंदिर का़फ़ी अच्छी स्थिति में है। १७ वी सदी के एक शक्तिशाली भूकंप के कारण इस मंदिर का का़फ़ी नुकसान हुआ, मग़र फ़िर भी मंदिर का का़फ़ी हिस्सा आज भी ठीक है।

कला का उत्तम ज्ञान, उत्तम चाह, उत्तम दृष्टि और उत्तम शिल्प को तराशने के निदिध्यास से प्रेरित काकतीय राजवंश की राजधानी रह चुके इस वरंगल को, आज भी हम यक़ीनन बेहतरीन शिल्पों का शहर कह सकते हैं।