वरंगल भाग-१

इतिहास के विभिन्न कालखण्डों में भारत के हर एक प्रान्त पर विभिन्न राजवंशों ने राज किया। उस उस राजवंश ने उस उस प्रान्त पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी, जिससे विभिन्न प्रकार की कलाओं का, उदा. चित्रकला, शिल्पकला, मूर्तिकला आदि का उदय हुआ। इनमें से कुछ कलाप्रकार तो उस समय इतने विकसित थे कि आज भी विज्ञान-तन्त्रज्ञान की इतनी प्रगति होने के बाद भी यह वैज्ञानिकों की समझ में नहीं आ रहा है कि उस समय कला का इतना विकास कैसे सम्भव हुआ।

अत्यन्त विकसित शिल्पकला

वरंगल, दक्षिणी भारत के आन्ध्र प्रदेश का एक शहर। इस शहर में तथा उसके आसपास के इला़के में भी ऊपर वर्णित अत्यन्त विकसित शिल्पकला दिखायी देती है और उसे देखकर हम उन कलाकारों के हुनर को दिल से सलाम करते हैं।

काकतीय वंश की राजधानी के रूप में इस नगर का उदय हुआ। भौगोलिक दृष्टि से आन्ध्र प्रदेश के प्रमुख तीन विभाग हैं – समुद्री तट का प्रदेश, तेलंगना और रायलसीमा। इनमें से तेलंगना यानि कि समतल प्रदेश में वरंगल शहर बसा हुआ है।

प्राचीन समय में ‘ओर्गुगल्लू’ अथवा ‘एकशिला नगरी’ इस नाम से वरंगल जाना जाता था। ओर्गुगल्लू अथवा एकशिला ये दोनों समान अर्थ के शब्द हैं। ओर्गुगल्लू का अर्थ है, एक पत्थर और एकशिला का अर्थ भी वही है। इस नगरी की रचना एक बहुत बड़े पत्थर को तराशकर की गयी है, ऐसा माना जाता है और इसी कारण इस नगरी को प्राचीन समय में ‘ओर्गुगल्लू’ अथवा ‘एकशिला नगर’ कहा जाता था।

इस वरंगल शहर का अधिकांश इतिहास काकतीय राजवंश के साथ जुड़ा हुआ है, क्योंकि काकतीय राजवंश के कारण ही वरंगल अस्तित्व में आया। काकतीय वंश ने वरंगल को अपनी राजधानी बनाने के बाद का इतिहास प्राप्त होता है। लेकिन उसके पहले के वरंगल के अस्तित्व के चिह्न इतिहास को ज्ञात नहीं हैं।

वरंगल शहर के बारे में जानकारी प्राप्त करने के स़फ़र का पहला पड़ाव है, इस शहर को बसानेवाले काकतीय राजवंश के बारे में जानना।

१२वी सदी में काकतीय राजवंश के ‘रुद्रदेव’ नामक राजा ने वरंगल शहर को बसाया। इस वंश के राजा काकती देवी के उपासक होने के कारण इस वंश को ‘काकतीय’ कहा जाने लगा। एक अन्य मत के अनुसार इस वंश का निवास काकतीपुर में होने के कारण इसे ‘काकतीय’ कहा जाने लगा।

काकतीय इस नाम का प्रथम उल्लेख एक ताम्रपट में किया गया है। यह ताम्रपट इसवी ९४५ का है। इस ताम्रपट में, गुंडनार्य नाम के एक सामन्त ने एक ब्राह्मण को मांगल्लू नामक गाँव दान में दिया था, ऐसा उल्लेख है। यह गुंडनार्य नतवाटी देश का सामन्त था। इस नतवाटी देश का मुख्यालय था, वरंगल जिले का मेडपल्ली यह गाँव। सारांश, वरंगल का काकतीयों के साथ का़फ़ी पुराना रिश्ता है।

लेकिन इन काकतीयों के पूर्वजों के बारे में कईं मत-मतान्तर हैं। काकतीय राजा सूर्यवंशी थे, ऐसी कुछ लोगों की राय है। अग्रहार के एक दानपत्र में काकतीय राजाओं के सूर्यवंशी होने का उल्लेख मिलता है। इस दानपत्र में काकतीयों का का़फ़ी सविस्तार उल्लेख किया गया है। उसके अनुसार ये काकतीय राजा प्रारम्भ में ‘काकती राजू’ इस नाम से जाने जाते थे, जो कि उन्होंने धारण किया हुआ नाम था।

इसवी ११५० के आसपास आन्ध्र प्रदेश में इस काकतीय राजवंश के राजा स्वतन्त्र राजा के रूप में उदयित हुए। आन्ध्र के पूर्वीय प्रदेश में वेंगी के चालुक्यों का शासन था, वहीं पश्चिमी प्रदेश में कल्याणी के चालुक्यों की हुकूमत थी। काकतीयों ने इन दोनों राजाओं की हुकूमत को मानने से इनकार करके धीरे धीरे वरंगल में अपने स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की।

शुरुआत के कालखण्ड में काकतीयों के पास वरंगल और उसके आसपास का इलाक़ा था। धीरे धीरे काकतीयों ने एक के बाद करके आसपास के प्रदेशों पर कब़्जा करना शुरू कर दिया। इसीसे आगे चलकर १३वी सदी के आसपास काकतीयों ने बहुत बड़े प्रदेश पर कब़्जा कर लिया।

काकतीय वंश के उपलब्ध इतिहास के अनुसार उन राजाओं में से ‘राष्ट्रकूट यर्रय्या’ इनका नाम इतिहास को ज्ञात है। इस लेख में पहले जिन मांगल्लू नामक गाँव के सन्दर्भ में दानपत्र का उल्लेख किया गया है, उसमें गुंडनार्य यह नाम आता है। राष्ट्रकूट यर्रय्या ये इन गुंडनार्य के पिता थे।

गुंडनार्य के बाद के उनके वंशज ने – बेतराज-पहले ने कोरवी प्रदेश पर शासन किया। उनके बेटे प्रोळराज-पहले ने चालुक्यों के पक्ष में युद्ध करके कईं राजाओं को परास्त कर दिया था और उनके इस शौर्य के लिए उन्हें ‘अनमकोंडविषय’ यह प्रदेश इनाम में मिला था। यह ‘अनमकोंडविषय’ नाम का प्रदेश यानि कि आज के हनमकोंड के आसपास का प्रदेश। हनमकोंड यह वरंगल से कुछ ही दूरी पर स्थित एक गाँव है।

प्रोळराज-पहले के बेटे बेतराज-दूसरे ने भी चालुक्यों के पक्ष में युद्ध किये, लेकिन उसने ‘अनमकोंड’ में अपनी राजधानी स्थापित की।

बेतराज-दूसरे के बेटे प्रोळराज-दूसरे ने चालुक्य राजा विक्रमादित्य की मृत्यु के बाद चालुक्यों का मांडलिक बने रहने से इनकार करके स्वयं का स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर दिया। इससे हम यह कह सकते हैं कि काकतीय वंश के राजा या शासक के रूप में पहला नाम आता है, इन प्रोळराज का।

‘रुद्रदेव’ अथवा ‘प्रतापरुद्र’ ये प्रोळराज-दूसरे के बेटे थे और इन्हीं रुद्रदेव ने वरंगल को बसाया। उन्होंने वरंगल को अपने राज्य की राजधानी का दर्जा दिया और उसमें एक क़िले का निर्माण भी किया। इस तरह रुद्रदेव के शासनकाल से ही सभी दृष्टि से वरंगल का विस्तार एवं विकास होने लगा। काकतीय राजा कलाप्रेमी होने के कारण उनके शासनकाल में वरंगल और उसके आसपास के प्रदेश में बेहतरीन शिल्पों का निर्माण हुआ। आज भी यह शिल्पकला उसके हुनर के लिए मशहूर है। मिसाल के तौर पर वरंगल के ह़जार स्तम्भों के मन्दिर को ही देखिए! यह मन्दिर खूबसूरत तो है ही, साथ ही वहाँ के स्तम्भों पर किया गया कलाकौशल इतना ना़ज़ुक है कि उसकी नक़्क़ाशी के छोटे छोटे छिद्रों में से सिलाई का धागा बड़ी आसानी से जा सकता है। इससे हम अन्दाजा लगा सकते हैं कि वह कलाकौशल अथवा वह नक़्क़ाशीकाम कितनी बारीक़ी एवं अचूकता से किया गया होगा। दूसरा उदाहरण है, काकतीय राजाओं के क़िले का। इन्हीं रुद्रदेव ने वरंगल में जिस क़िले का निर्माण किया, उसके भग्न अवशेष आज भी मौजूद हैं। इनमें से इस क़िले की कमान को देखते ही काकतीयों के कलाप्रेम का प्रमाण ही मिलता है।

चालुक्यों के अधिपत्य में राज करते हुए काकतीयों के कलाप्रेम का आविष्करण नहीं हो सका। लेकिन स्वयं का स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के बाद उन्होंने विशेषतापूर्ण एवं वैभवशाली मन्दिरों तथा क़िलों का निर्माण किया। रुद्रदेव ने वरंगल को राजधानी बनाने के साथ साथ अपने राज्य का विस्तार किया और बग़ावत करनेवाले कईं सामन्तों को परास्त कर दिया।

उनके बाद राजगद्दी सँभालनेवाले राजाओं ने वरंगल से शासन किया।

रुद्रदेव के बाद उनके भाई महादेव ने सत्ता की बाग़डोर सँभाली और उनके बाद उनके पुत्र गणपति सत्ता में आ गये। इतिहास यह कहता है कि ये गणपति बहुत ही पराक्रमी थे। उन्होंने लगभग पूरे आन्ध्रप्रदेश पर कब़्जा कर लिया। उस समय ‘वरंगल’ यही उनकी राजधानी थी। इन्हीं गणपति के शासनकाल में व्यापार में भी इस प्रदेश की का़फ़ी तरक्की हुई।

गणपति के बाद उनकी बेटी ‘रुद्रांबा’ ने राजगद्दी सँभाली। भारत में शासक होनेवालीं महिलाओं में ‘रुद्रांबा’ अथवा ‘रानी रुद्राम्मादेवी’ को विशेष स्थान है। १३वी सदी में उनके शासनकाल में ‘मार्को पोलो’ इस विदेशी सैलानी ने भारत के स़फ़रनामे में वरंगल का उल्लेख कर रानी रुद्राम्मादेवी की शासनव्यवस्था की प्रशंसा की है। लेकिन अन्य राजाओं के आक्रमण के कारण और सामन्तों की बग़ावत के कारण इनके राज्य पर खतरा मँड़राने लगा। इनके बाद के शासक ‘प्रतापरुद्र’ ने अन्य राजाओं द्वारा जीते गये मुल्क को पुनः जीत लिया। लेकिन १४वी सदी के प्रारंभ में ही प्रतापरुद्र को विदेशी हमले का सामना करना पड़ा। उत्तर से आये हुए उलुघखान ने वरंगल पर धावा बोल दिया और प्रतापरुद्र को कैद करके वरंगल पर कब़्जा कर लिया। इस तरह प्रतापरुद्र की पराजय के साथ ही काकतीय वंश की वरंगल होनेवाली हुकूमत ख़त्म हो गयी। इन विदेशी आक्रमकों ने वरंगल को बुरी तरह लूट लिया। कईं महीनों तक वे वरंगल के वैभव को नोंच-नोंचकर हाथी-घोड़ें-ऊँटों पर लादकर ले जा रहे थे।

इन विदेशियों से वरंगल को पुनः प्राप्त करने में मुसुनुरी नायकों को कामयाबी प्राप्त हुई। मुसुनुरी नायक ये काकतीय राजाओं की सेना में सरदार थे। कुछ समय तक वरंगल पर उनकी हुकूमत थी, लेकिन उसके बाद वरंगल पुनः मुग़लों के कब़्जे में चला गया। भारत की आ़जादी के बाद वरंगल का समावेश आन्ध्र प्रदेश में किया गया।

जिस वरंगल ने काकतीय राजवंश का शासक के रूप में उदय होते हुए देखा था, उसी वरंगल ने काकतीय राजवंश के अस्त को भी देखा। वरंगल और काकतीय राजवंश यह इतिहास का एक दृढ़ समीकरण है। आज भी वरंगल ने उसे वैभवशाली नगरी बनानेवाले काकतीय राजाओं की यादें जतन की हैं, उन्हीं के द्वारा निर्माण किये गये शिल्पों के माध्यम से।