जुनागढ़ भाग-१

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गिरनार पर्वत की तलहटी पर बसा हुआ शहर, इस वाक्य से हम जुनागढ़ के भौगोलिक स्थान का अनुमान कर सकते हैं।

गुजरात राज्य में यह जुनागढ़ शहर बसा हुआ है। गिरनार की यानि कि गिरनार पर्वत की महिमा प्राचीन काल से सुविख्यात है। गिरनार की अर्थात् गिरनार पर्वत की ऊँचाई इतनी है कि उसके बारे में कहा जाता है कि, ‘उंचो गढ गिरनार, वादळथी वातो करे’ इसी ऊँचे गिरनार पर्वत पर पवित्र तीर्थस्थल बसे हुए हैं। इसीलिए पुराने जमाने से यह गिरनार बहुत ही पवित्र एवं पुण्यप्रद माना जाता है। तो अब हम जिस शहर का सफर करने के लिए निकल पड़े हैं, वह जुनागढ़ शहर इस पवित्र गिरनार की तलहटी पर बसा हुआ है।

जुनागढ़ इस नाम से ही हम अंदाजा लगा सकते हैं कि यहाँ पर कोई जूना यानि कि पुराना गढ़ बसा हुआ होगा, जिससे कि इस शहर का नाम जुनागढ़ हो गया या फिर उसी पुराने गढ़ के कारण यह शहर जुनागढ़ नाम से जाना जाने लगा। संक्षेप में, इस शहर के नाम की जन्मकथा इन्हीं दो शब्दों में समायी हुई है।

जैसा कि हमने अभी अभी देखा, उसी के अनुसार इस शहर का नाम उसी में स्थित एक पुराने गढ़ के कारण जुनागढ़ यह हुआ। इसी शहर में चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा इसापूर्व ३१९ में बनाया गया एक गढ़-क़िला-फोर्ट है और शायद उसीसे इस शहर को ‘जुनागढ़’ नाम से संबोधित किया जाने लगा हो। क्योंकि यह गढ़ काफ़ी पुराना है।

चलिए तो फिर इस जुनागढ़ में प्रवेश करते हैं। इस शहर की पृष्ठभूमि पर बसे हुए गिरनार के फिलहाल दूर से ही दर्शन करते हैं; क्योंकि आगे चलकर हमें गिरनार की यात्रा करनी ही है। जुनागढ़ से जिसप्रकार गिरनार जुड़ा हुआ है, उसी प्रकार कई सदियों का इतिहास भी इस जुनागढ़ से जुड़ा हुआ है। चंद्रगुप्त मौर्य ने यहाँ पर क़िले का निर्माण करवाया। इसका अर्थ है कि तभी से लेकर यह प्रदेश अस्तित्व में है।

आज के जुनागढ़ ने इन कई सदियों के इतिहास के चिह्नों को आज भी सँभालकर रखा है, इतना ही नहीं तो मानो ये वास्तुएँ जुनागढ़ के भूषण हैं। इतिहास के साथ ही इस जुनागढ़ की मिट्टी में अध्यात्म का जन्म और विकास हुआ। इसके गवाह के तौर पर अकेला गिरनार ही काफ़ी है। इसी जुनागढ़ की भूमि पर विचरण कर चुके संत नरसी मेहताजी, जो श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति में तल्लीन हो चुके थे, उन्हें हम भला कैसे भूला सकते हैं!

महात्मा गाँधीजी का बहुत ही प्यारा –

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे।
पर दुख्खे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे॥

यह भजन इन्हीं नरसी मेहताजी द्वारा रचित है।

ऊपर हम जिसका वर्णन कर चुके हैं, वह चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्माण किया हुआ पुराना क़िला शहर के बीचों बीच बसा हुआ है। लेकिन यह चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्मित वही क़िला नहीं है; क्योंकि इतिहास कहता है कि समय के चलते कई बार इस क़िले का पुननिर्माण किया गया है।

सबसे अहम बात यह है कि यदि जुनागढ़ का इतिहास देखा जाये तो इस शहर का अस्तित्व इसापूर्व भी था। इतिहास बताता है कि जुनागढ़ पर क्षत्रप, मौर्य, चुडासामा, गुप्त, वलभी, गुजरात के शासक (गुजरात सल्तनत) और बाबी नवाब इन्होंने शासन किया।

मौर्य राजवंश के राजा चंद्रगुप्त ने जब इस प्रदेश को जीत लिया, तब ऊपरोक्त क़िले का उन्होंने यहाँ पर निर्माण किया और वह समय इसापूर्व का था। लेकिन उसके पश्‍चात् भी काफ़ी लंबे अरसे तक इस प्रदेश पर मौर्यों का शासन बना रहा हुआ होगा; क्योंकि इसी राजा चंद्रगुप्त के पोते सम्राट अशोक द्वारा लिखे गये महत्त्वपूर्ण शिलालेख यहाँ पर पाये जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजा चंद्रगुप्त के पश्‍चात् भी यहाँ पर मौर्य राजवंश का शासन रहा होगा।

जुनागढ़ के इतिहास में सम्राट अशोक के इन शिलालेखों को महत्त्वपूर्ण स्थान है। आज भी जुनागढ़ में हम अत्यंत उत्तम स्थिति में और अच्छी तरह जतन किये इन शिलालेखों को देख सकते है। जुनागढ़ का इतिहास देखते देखते ही हम इन शिलालेखों के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे।

शिलालेख यह इतिहास की जानकारी का एक प्रमुख साधन है। यह साधन हमें विभिन्न प्रांतों, विभिन्न कालखंडों एवं विभिन्न राजाओं से परिचित कराता है। शिलालेख यानि कि बड़े आकार के पत्थर पर लिखा गया लेख। इन बड़े आकार के पत्थरों पर उस जमाने में उपलब्ध साधनों की सहायता से जानकारी की खुदाई की जाती होगी। शिला पर खुदाई करने के लिए उतना ही मज़बूत यानि कि लोहे जैसा ही कोई मज़बूत साधन काम में लाया जाता होगा, है ना? संक्षेपत:, लोहा या उसी प्रकार के किसी मज़बूत साधन से पत्थर पर की गई जानकारी की खुदाई यानि कि ‘शिलालेख’। लेकिन ऐसा करते समय काफ़ी सावधानी बरतनी पड़ती होगी; क्योंकि जिस पत्थर पर खुदाई की जा रही है, वह इस कार्य में यदि टूट जाता है तो सारी मेहनत बेकार हो जायेगी। कागज और क़लम लेकर मिनटों में लिख सकनेवाले आज के इस ज़माने में इन शिलालेखों का निर्माण करवानेवालों और करनेवालों की प्रशंसा जितनी भी की जाये उतनी कम ही है।

‘उरीजयता’ नामक पहाड़ी की ढ़लान पर ये अशोक के शिलालेख स्थित हैं। एक बड़े ग्रॅनाईट के पत्थर पर इन शिलालेखों की खुदाई की गयी है। कलिंग युद्ध के बाद अहिंसा को अपना चुके सम्राट अशोक के इन शिलालेखों में धर्म, शांति, समानता आदि विषयों पर महत्त्वपूर्ण भाष्य किया गया है। जीवन में हिंसा, लालच, लोभ आदि का विरोध करना चाहिए यानि कि इनका त्याग करना चाहिए, ऐसी महत्त्वपूर्ण सीख ये शिलालेख देते हैं।

जुनागढ़, इतिहास, अतुलनिय भारत, गिरनार पर्वत, गुजरात, भारत, भाग-१बड़े पत्थर पर तराशे गये ये ‘अशोक के शिलालेख’ ‘ब्राह्मी’ लिपि में तथा ‘पाली’ भाषा में लिखे गये हैं। इनका समय तकरीबन इसापूर्व २५० वर्ष पुराना माना जाता है। यहाँ पर लिखित शिलालेखों की लिपि को पढ़कर उनका हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद भी किया गया है। क्योंकि आज के जमाने में हमारे लिए यह लिपि पूरी तरह अज्ञात है।

इन शिलालेखों में सम्राट अशोक को ‘राजा पियदसी’ इस नाम से संबोधित किया गया है।

जुनागढ़ में स्थित इस बड़े पत्थर पर केवल सम्राट अशोक के शिलालेख ही नहीं है, बल्कि उसके पश्‍चात् इसी पत्थर पर और दो राजाओं ने शिलालेख खुदवाए हैं। यानि कि जुनागढ़ का यह एक ही बड़ा पत्थर महज़ एक या दो नहीं, बल्कि तीन विभिन्न कालखंडों के राजाओं के इतिहास को बयान करता है।

इसी पत्थर पर ‘महाक्षत्रप रुद्रदमन- प्रथम’ द्वारा ‘संस्कृत’ भाषा में लिखित शिलालेख प्राप्त होता है। इसका समय ईसापूर्व १५० वर्ष माना जाता है और तीसरा शिलालेख पाचवीं सदीं में ‘स्कंदगुप्त’ नामक अन्तिम गुप्त सम्राट का है।

रुद्रदमन- प्रथम नामक राजा के संस्कृत शिलालेख में सुदर्शन नामक तालाब और उसपर चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा बनाये गये बाँध अथवा जल की आपूर्ति करनेवाली व्यवस्था का वर्णन प्राप्त होता है। एक बड़े तूफ़ान में और ‘सुवर्णसिकता’ एवं ‘पलासिनी’ नामक नदियों में आयी हुई बाढ़ के कारण इस जल आपूर्ति व्यवस्था को काफ़ी नुकसान पहुँचा और राजा रुद्रदमन ने उसकी मरम्मत की, ऐसा वर्णन प्राप्त होता है। साथ ही रुद्रदमन यह प्रजाहितदक्ष शासक था, यह जानकारी भी प्राप्त होती है।

इसके पश्‍चात् इसी पाषाण पर खोदा गया ‘स्कंदगुप्त’ का शिलालेख संस्कृत भाषा में ही लिखित है और यह शिलालेख भी इसी बाँध या जल आपूर्ति व्यवस्था की स्कंदगुप्त राजा द्वारा मरम्मत किये जाने की जानकारी देता है।

इन्हीं शिलालेखों से हम अँदाजा लगा सकते हैं कि इस जुनागढ़ शहर ने कितने पुराने लेकिन बहुत ही महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को सँभालकर रखा है।

ऊपर उल्लेखित शिलालेख में वर्णित रुद्रदमन- प्रथम यह पश्‍चिमी क्षत्रप राजवंश का राजा मालवा का शासक था। ज़ाहिर है कि उस ज़माने में उसका इस प्रांत पर भी अधिकार रहा होगा। साथ ही गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में उनका भी इस प्रदेश पर अधिकार रहा होगा।

इससे यह बात स्पष्ट होती है कि विभिन्न कालखंडों में यह जुनागढ़ प्रांत विभिन्न शासकों के अधिकार में रहा था; मग़र उस समय इस प्रदेश को राजधानी का दर्जा प्राप्त हुआ दिखायी नहीं देता।

पूरे जुनागढ़ में जो ऐतिहासिक वास्तुएँ है, उनमें विभिन्न शासकों द्वारा उनके शासनकाल में बनायी हुईं नयी रचनाओं का समावेश होता है।
११वीं और १२वीं सदीं में गुजरात पर सोलंकियों का शासन था। इसी समय उनका जुनागढ़ पर भी शासन था, यह उनके द्वारा निर्मित वास्तुओं से स्पष्ट होता है।

१३वीं सदीं में गुजरात को जीतने के बाद गुजरात सल्तनत का निर्माण किया गया। १५वीं सदी के मध्य के बाद महमूद शाह-प्रथम ने जुनागढ़ को जीत लिया। इससे जुनागढ़ गुजरात सल्तनत का हिस्सा बन गया। गुजरात सल्तनत का हिस्सा बनने के बाद इस शहर का चेहरा काफ़ी कुछ बदल गया। यहाँ पर कई नयी दिलक़श वास्तुओं, महलों और बगीचों का निर्माण किया गया।

१६वीं सदी में पुर्तग़ालियों ने दीव और दमण पर अपना शासन स्थापित किया। पुर्तग़ालियों से जुनागढ़ की रक्षा करने हेतु उस व़क़्त जुनागढ़ के पुराने क़िले पर दो तोपों को स्थापित किया गया। अर्थात् आसपास घटनेवाली घटनाओं से जुनागढ़ अलिप्त नहीं रहा, बल्कि इन घटनाओं के जुनागढ़ पर भी कुछ न कुछ परिणाम होते रहे, फलस्वरूप यहाँ की वास्तुओं में कई नयी रचनाओं की वृद्धि होती गयी।

इन गतिविधियों के पश्‍चात् १८वीं सदीं के पूर्वार्ध में महमद बहादूर खानजी-१ का जुनागढ़ पर अधिकार स्थापित हुआ। महमद बहादूर खानजी-१ से ही बाबी राजवंश की शुरुआत हुई और आगे चलकर बाबी नवाब जुनागढ़ पर शासन करने लगे।

प्राचीन समय के इस जुनागढ़ ने अपनी इन सभी विशेषताओं के साथ आज के युग में प्रवेश किया है; लेकिन अपनी पुरानी विशेषताओं को गहनों की तरह सँभालकर रखते हुए।