श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६५

रोहिले की कथा के बारे में हम विस्तारपूर्वक चर्चा कर रहे हैं। इस अध्याय में ही और वह भी हेमाडपंत के एक अनुभव के पश्‍चात् इस कथा को लिखने के पिछे हेमाडपंत का क्या उद्देश्य है? हेमाडपंत को सेवानिवृत्त होने के पश्‍चात् यह चिंता सताने लगी कि अब अपने परिवार का एवं अपना गुजर-बसर कैसे होगा, अण्णा चिंचणीकरने इसके संबंध में स्वयं होकर ही बाबा से पुछा भी और बाबा ने ‘अब इन्हें मेरी ही चाकरी करनी चाहिए’ यह स्पष्टरूप से कहा। हेमाडपंत के इस अनुभव के बारे में हमें आरंभ में ही पता चल चुका है। और इसके पश्‍चात् अचानक हेमाडपंत हमें रोहिले की कथा सुनाते हैं अर्थात इसके पिछे जरूर ही कोई कार्यकारण संबंध तो होगा ही। साईबाबा इस कथा के माध्यम से हमें कुछ न कुछ सीख तो दे ही रहे हैं।

हेमाडपंत के अनुभव से संबंधित तथा हमारे जीवन से धुली-मिली होनेवाली महत्त्वपूर्ण बातों के संबंध में मार्गदर्शन यहाँ पर किया गया है। इसके लिए रोहिले की काल्पनिक कथा की योजना साईनाथ कर रहे हैं। रोहिले की यह कथा भले ही काल्पनिक होगी, परन्तु इसी के माध्यम से बाबा हमें वास्तविकता का अहसास करवा रहे हैं साथ ही उचित दिशा भी दिखला रहे हैं। इस कथा में रोहिला एवं उसकी पत्नी ये हमारे ही जीवन का एक अंग हैं। हेमाडपंत की कथा में हमने देखा कि हेमाडपंत के मन में ‘कल की चिंता’ चल रही है कि कल क्या होगा? कैसे होगा? आदि। और इस चिंता का निवारण आखिर बाबा ने ही किया। रोहिले की कथा में रोहिला अर्थात मानव का मन और उसकी पत्नी अर्थात ‘कल की चिंता’।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईहेमाडपंत के अनुभव के साथ ही यह रोहिले की कथा आती है, इसका कारण यही है कि हेमाडपंत के कथा के अनुषंग से हम सभी मानवों के मन का यह उहापोह साईनाथ इस रोहिले की कथा मार्गदर्शन करके सुलझाना चाहते हैं। हम सभी के मन को कोई न कोई चिंता सताती ही रहती है। और वह है ‘कल की चिंता’, भविष्य की चिंता, योगक्षेम की चिंता। यह ‘कल’ हमारे जीवन में तनाव निर्माण करता रहता है। जैसे भूतकाल का, काल का भूत हमारे गर्दन पर सवार रहता है, वैसे ही भविष्य काल की, ‘कल’ की चिंतारूपी रोहिले की पत्नी हमारे जीवन में उत्पात मचाये रहती है।

हमारे मन की अर्थात रोहिले की पत्नी कहलानेवाली कल की चिंता हमारे मन के साथ ही सदैव वास करती है। इसीलिए इस मनरूपी रोहिले की पत्नी का दर्जा दिया गया है। हम सभी को कल की चिंता चारों ओर से सताती रहती है। कल क्या होगा? कैसे होगा? कल मेरी नौकरी/कामधंदा (व्यवसाय) इनका क्या होगा? मेरी घर-गृहस्थी का क्या होगा? मेरी जमा की गयी मालमत्ता सुरक्षित रहेगी क्या? मैंने जो पैसा अनेक स्थानों पर निवेश किया है वह मुझे वापस मिल पायेगा क्या? मेरे बच्चों का आगे क्या होगा? इस प्रकार के अनेकों प्रश्‍न जो ‘भविष्य’ से संबंधित हैं प्रश्‍नचिह्न लगाकर मुझे परेशान करते रहते हैं।

इस तरह से कल की चिंता से ग्रस्त मन जब शिरडी में अर्थात भक्ति की भूमि में प्रवेश करता है और साईनाथ की शरण लेकर बाबा का गुणसंकीर्तन करने लगता है, उस समय उसकी, उस मन की पत्नी रोहिली अर्थात ‘कल की चिंता’ उसके साथ नहीं रह पाती है। वह उसे छोड़कर चली जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस क्षण से हमारा मन इस भगवान की, साईनाथ की भक्ति में रम जाता है, उनका गुणसंकीर्तन करने लगता है, उसी क्षण से उस मन के साथ सतत रहनेवाली ‘कल की चिंता’ अर्थात मन रुपी रोहिले की पत्नी दूर चली जाती है, मन पूर्णत: चिंतामुक्त हो जाता है। कल की चिंता नहीं रह जाती है, क्योंकि मेरे ये भगवान पूर्ण समर्थ तो हैं ही और वे मेरे भार का वहन करेंगे ही इसी विश्‍वास से मन को कल की चिंता से पूर्ण मुक्ति मिल जाती है।

फिर यह रोहिली अर्थात चिंता रोहिलारूपी मन को न सताकर बाबा को ही तकलीफ देने की कोशिश करती है। इसका अर्थ यह है कि हमारे हृदय में विराजमान रहनेवाले हमारे आराध्य देव को ही ग्रसित करने की कोशिश करने लगती है बाबा को तकलीफ देने की हिम्मत किसी में नहीं। इसीलिए यहाँ पर बाबा जो कहते हैं कि वह रोहिली मुझे ग्रसित करने की कोशिश में है अर्थात् वह भक्त के मन के आराध्य को ग्रसित करना चाहती है। यह चिंता अब संदेह, शंका, कुतर्क जैसे रूप धारण करके अपने आराध्य भगवान के संबंध में ही साईनाथ भगवान हैं क्या? ये तो कोई पागल फकीर लगते हैं? ये मेरे योगक्षेम की चिंता कैसे करेंगे? ये मेरी गृहस्थी एवं परमार्थ सुखमय कैसे बनायेंगे आदि अनेक प्रकार के विकल्प निर्माण करने का काम यह रोहिली करती रहती है।

परन्तु ऐसे ही समय में भक्ति की पहचान होती है और जिसका मन स्थिर है। जिसे अपने साईपर पूरा विश्‍वास है ऐसा भक्त विकल्पों की परवाह किए बगैर ही साईनाथ का गुणसंकीर्तन करता रहता है। मनरुपी रोहिला जोर-जोर से चिल्लाकर भगवान का स्तवन गाते ही रहता है। और फिर यह रोहिली कुछ भी नहीं कर सकती है। जिस पल यह रोहिला अर्थात मेरा मन गुणसंकीर्तन कर बंद कर देता है, उसी पल यह रोहिली अर्थात विकल्पात्मक वृत्ति अन्तर्मन में प्रवेश करने की कोशिश करने लगती है। मेरे श्रद्धास्थान को ग्रसित करने लगती है। इसीलिए तब तक विकल्पात्मकवृत्ती का यथायोग्य बंदोबस्त करनेवाले गुणसंकीर्तन करते रहना चाहिए यह मार्ग बाबा रोहिले की कथाद्वारा हमें दिखा रहे हैं। विकल्प की लहर जितनी अधिक उछलकर मचलकर आयेगी उतना ही किंबहुना इसकी अपेक्षा भी अधिक उत्कटता के साथ हमें इस भगवान का गुणसंकीर्तन करते रहना चाहिए।

इस भगवान का, साईनाथ का गुणसंकीर्तन यही है वह आसान राह, जो एक ही समय में ‘कल’ की चिंता एवं विकल्पात्मक वृत्ती इन दोनों को ही समूल उखाड़कर फेक देती है।