श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६४

जिसे हरिनाम का आलस। बाबा उससे दूर ही रहते।
कहते व्यर्थ ही क्यों रोहिले से परेशान होते हो। भजन में मग्न जो रहता सदा॥
जयासी हरिनामाचा कंटाळा। बाबा भीती तयाच्या विटाळा। म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा। भजनीं चाळा जयातें॥

‘परमात्मा का नामस्मरण’ यह मनुष्य को परमात्मा से जोड़नेवाली एक कड़ी है। मनुष्य को परमात्मा तक ले जानेवाला कोई एजंट नहीं ऐसा परमात्मा ने बारंबार कहा है। मात्र नामस्मरण यही एक मनुष्य को परमात्मा के साथ जोड़नेवाला एकमात्र कड़ी – एकमात्र साधन है।

किसी भी मनुष्य को बुलाते समय हमें यदि उसका नाम पता है तो नाम लेकर ही बुलाते हैं यह एक साधारण सी बात है जो हम नित्य प्रति अपने व्यवहार में लाते हैं और यह स्वाभाविक भी है। फिर वह जो इस संपूर्ण विश्‍व की ही जगत् जननी गुरुमाऊली है, वह परमात्मा उन्हें भी हमें उनके नाम से आवाज देकर पुकारते आना चाहिए। परमात्मा का गुणसंकीर्तन एवं नामसंकीर्तन करना ही परमात्मा को आवाज देकर बुलाना कहलाता है और यह गुहार (हाक) हर एक मनुष्य को परमात्मा को लगाते आना चाहिए। ऐसी गुहार (हाक) लगाने पर ही धीरे-धीरे परमात्मा के साथ होनेवाला अपना रिश्ता इसी तरह से दृढ़ करना चाहिए। क्योंकि इस परमात्मा के साथ होनेवाले अपने रिश्ते की पहचान मनुष्य ही भूलता रहता है। परमात्मा यह पहचान सदैव रखते ही हैं। ज़रूरत होती है मनुष्य की अपनी इस पहचान को समझने की और उसे दृढ़ करने की और इसीलिए जो कोई भी हरिनाम लेता है वह बाबा को प्रिय होता ही है।

यहाँ पर हरिनाम लेने के बीच आपका स्वर नहीं आता ना ही तुम्हारें समय का बंधन होता इसीलिए रोहिले का वह नैसर्गिक जोरदार आवाज उस पर उसका समय-असमय भगवान का नाम लेना भी बाबा को अच्छा लगता था।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईइस तरह से नामस्मरण करना अर्थात उस परमात्मा के साथ संवाद साधना, परमात्मा के साथ साध्य किया जानेवाला ऐसा नित्य संवाद हर एक जीव का उन्नयन करनेवाला होता है। बिलकुल साधारण उदाहरण भी यदि हम देखते हैं तो जैसे हम जिस मोबाईल का उपयोग अपने रोजमर्रा के जिंदगी में करते हैं उसी मोबाईल के माध्यम हम कभी भी, किसी से भी बात कर सकते है। मात्र इसी तरह से मोबाईल कार्यरत रहे तो इसके लिए हमें उसे चार्ज करना पड़ता है और परमात्मा के साथ नित्य साध्य किया जानेवाला संवाद ही हमें यह चार्ज देता रहता है। जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड चलाते हैं उस मूलस्तोत्र की ओर से ही जब ऐसा चार्ज हमें प्राप्त होता है तब दिनभर कार्यरत रहने की क्षमता के विषय में हमें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं मात्र इस तरह से कार्यरत रहना बनाये रखने के लिए हमें रोज चार्ज करना पड़ता है। और उस परमात्मा के साथ नित्य संवाद करते रहना यही रोज का चार्ज प्राप्त कर्ने के लिए किसे भी प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का उपयोग करने की भी ज़रूरत नहीं होती। बिलकुल कभी भी, कहीं भीम किसी भी वक्त, कैसे भी हम उस परमात्मा का नामस्मरण करके यह चार्ज प्राप्त कर सकते हैं। मोबाईल चार्ज करने के लिए हमें कुछ विशेष समय भी देना पड़ता है। परन्तु इस संवाद से, नामस्मरण से चार्ज करने के लिए किसी विशेष समय का बंधन नहीं होता बिलकुल कुछ ही मिनटों से कुछ घंटों तक हम नामस्मरण कर सकते हैं। परन्तु दिन के चौबीस घंटों में से चौबीस मिनट तो हमें इस तरह से चार्जिंग करना ही चाहिए। ऐसी उस परमात्मा की इच्छा होती है। जब कि इसमें उनका कोई फायदा नहीं होता, फायदा होता है तो केवल अपना ही।

इसीलिए जो रोहिला इस तरह से कभी भी, कहीं भी भगवान का नामस्मरण करता था, वह बाबा को अति प्रिय था और अपने रोज के दैनिक व्यवहार में इसतरह से चार्ज न प्राप्त करनेवाले बल्कि हर वक्त केवल अपना ही रोना रोनेवाले जो ग्रामस्थ थे उनकी शिकायत की ओर बाबा अनसुना कर देते हैं।

इस सृष्टि में प्रकाश यह विविध स्वरूप में हमें दिखाई देता है। फिर वह सूर्यप्रकाश है, दिपक का प्रकाश है। अर्थात अंतत: वह उस मूल प्रकाश का ही स्वरूप है। और हम इलेक्ट्रिसिटी की सहायता से जो मोबाईल की बेटरी चार्ज करते हैं तो क्या वह प्रकाश के ही एक रूप को हम उपयोग में ला सके इसीलिए दूसरे एक रूप में उसे रूपांतरित करते हैं, और जब साईनाथ के समान सद्गुरु, परमात्मा साक्षात् हमारे समक्ष होते हैं उस वक्त इसीतरह यदि हम अपने आप को चार्ज नहीं कर रहे हैं तो इसमें हमारा ही काफ़ी बड़ा नुकसान है।

ये परमात्मा ही मूल प्रकाश स्वरूप हैं इसीलिए परमात्मा के पास कभी भी प्रकाश की कमतरता नहीं होती और ना ही कभी रहेगी, परंतु ज़रूरत हमें ही होती है। हमें ही उनके पास से चार्ज, उर्जा, शक्ति प्राप्त करना होता है क्योंकि यह शक्ति मुझे पुरुषार्थ करने से प्राप्त होती है। और पुरुषार्थ करके बल प्राप्त करना यह हर एक मनुष्य का मानव धर्म है, हर एक जीव का कर्तव्य ही है।