श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५९

यहाँ पर हेमाडपंत रोहिले की कथा सुनाते हैं। जिसके बारे में संक्षिप्त जानकारी हमने पिछले लेख में हासिल की। परन्तु हेमाडपंत यहाँ पर स्पष्टरूप में बता रहे हैं कि बाबा को ग्रामवासियों की खोखली शिकायतों एवं बेवजह के क्लेश की अपेक्षा नामजप अधिक प्रिय है। अर्थात बाबा को नाम सर्वाधिक प्रिय है। तात्पर्य यह है कि परमात्मा के समक्ष खोखली शिकायतें लेकर दौड़ने की अपेक्षा यदि आप नामजप करते हैं तब वह भगवान को सर्वाधिक प्रिय लगेगा। तात्पर्य यह है कि परमात्मा के समक्ष केवल खोखली, व्यर्थ बातों को लेकर गुहार लगाने की अपेक्षा आप यदि नामजप करते रहोगे तो वह परमात्मा को सर्वाधिक प्रिय लगेगा क्योंकि उन्हें नामजप करते रहोगे तो वह परमात्मा को सर्वाधिक प्रिय लगेगा क्योंकि उन्हें नामजप ही प्रिय है। आप जितना अधिक नामजप करते रहोगे उतना ही अधिकाधिक आप परमात्मा के निकट जाते हो और उनके प्रिय बन जाते हो। जैसे-जैसे नामस्मरण बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ही आपकी चिंताएँ। फिर चाहे वह गृहस्थी से संबंधित हो अथवा कोई और, परमात्मा आप के कहे बगैर ही उसे दूर करने लगते हैं और यह सब वे परमात्मा इतनी सहजता से करते हैं कि यह समझ पाने में भी काफी समय बीत जाता है। साथ ही ये चिंताएँ सहज समस्याओं का समाधान करते हैं इतना ही नहीं बल्कि हमारा सारा भर ‘वे’ ही वहन करते हैं यह जब हमारी समझ में आता है, उस वक्त अपने-आप ही हमारा नामजप बढ़ने लगता है। अर्थात बढ़ते हुए नामजप के साथ ही परमात्मा की दिशा में मनुष्य का एक-एक कदम बढ़ने लगता है और परमात्मा की इच्छा भी यही होती है क्योंकी हम सभी का भार उठाने के लिए ‘वे’ समर्थ हैं। ज़रूरत होती है केवल हमें अनुभव लेने की ऐसा है यह गृहस्थी एवं परमार्थ का संबंध। जिसमें एक दूसरे के साथ मिलकर ही हर एक मनुष्य को जीवन में आगे बढ़ना होगा। क्योंकि जीवन के आरंभिक समय में केवल घर गृहस्थी के झमेले में फँसे रहकर परमार्थ की ओर पूर्णरूपेण अनदेखा करना। और जब शरीर थक जाता है, काम करने से इंकार कर देती है ऐसे में अब और क्या करूँगा? यह सोच परमार्थ करने लगे तो ऐसा जीवनप्रवास परमात्मा को कभी भी मान्य नहीं होगा। गृहस्थी एवं परमार्थ का स्थान हर एक मनुष्य के जीवन में उतना ही अधिक समानरूप में होना चाहिए। गृहस्थी से मुँह चुराकर परमार्थ की ओर मुड़ जाना यह ठीक नहीं है और गृहस्थी की गाड़ी नहीं खींची जा रही है इसीलिए परमार्थ की राहपर चलने का निश्‍चय कर लेना भी परमात्मा को बिलकुलपसंद नहीं हैं। क्योंकि जब कभी भी परमात्मा मानवीरूप में अवतार लेते हैं उस वक्त वे गृहस्थी एवं परमार्थ इन दोनों को ही अर्थात गृहस्थी एवं परमार्थ अपने जीवन में समानरूप में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं तथा सर्वोत्कृष्ट परमार्थ एक ही समय पर कर दिखाते हैं और हर एक मनुष्य के लिए एक आदर्श प्रस्थापित करते हैं। इसीलिए मनुष्य को देखना ही है तो केवल परमात्मा के चरित्र की ही ओर देखना चाहिए। क्योंकि मानव के लिए केवल परमात्मा का ही चरित्र यही एकमेव आदर्श होता है। अन्य किसी भी व्यक्ति का चरित्र मनुष्य के लिए आदर्श हो ही नहीं सकता है। एक मनुष्य का चरित्र दूसरे किसी मनुष्य के लिए मार्गदर्शक हो सकता है। परन्तु मनुष्य के लिए मात्र आदर्श केवल एक एवं एकही होता है। और वह है केवल और केवल ‘उस’ परमात्मा का चरित्र।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईरोहिले की काल्पनिक (मायिक) कथा इसी तरह की वृत्तियों का उदाहरण है। वह हर एक मनुष्य के जीवन में निरंतर घटित होती ही रहती है। अर्थात मनुष्य अर्थात सामान्य गृहस्थ मानव। जो हमेशा ही अपनी गृहस्थी उत्तम तरीके से चलती रहे और इसके साथ ही परमात्मा का नामस्मरण भी चलता रहे ऐसी इच्छा भी उसके मन में होती ही है।

परमार्थ करनेवाले मनुष्य की वृत्ति अर्थात वह रोहिला। जिसके मन में बाबा के प्रति आदर तोथा ही। बाबा के गुणों से मुग्ध होकर जो बाबा के पास ही रहने की उसकी इच्छा थी। मानव की परमार्थ करने की वृत्ति यह ऐसी ही बलवान होती है। और भगवान का नामस्मरण करने के लिए कोई भी बात आड़े नहीं आती। इसीलिए रोहिला दिन-रात, समय-स्थान आदि का विचार किए बगैर ही नाम लेना ही नहीं बल्कि जोरजोर से लेना शुरु कर देता है। परन्तु उस रोहिले की पत्नी मात्र होती है मनुष्य के गृहस्थी करनेवाली वृत्ति के समान जिसके पास निरंतर केवल चिंता, ङ्गिक्र ही होती है इसीलिए ये वृत्तियाँ दौड़कर बाबा के पास जाने के लिए उत्सुक रहती हैं, परन्तु केवल इसीतरह की शिकायतें लेकर एवं गृहास्थवृत्ति मात्र पारमार्थिक वृत्ति की परवाह नहीं करती। इसीलिए बाबा कहते हैं कि रोहिले की पत्नी उसके साथ नहीं रहती है। मात्र जिस क्षण यह पारमार्थिक वृत्ति नामस्मरण आरंभ करती है। उसी क्षण यह चिंता एवं फिक्र आदि की प्रापंचिक (गृहस्थी) वृत्ति स्थिर हो जाती है। अर्थात संक्षेप में कहे तो जैसे-जैसे नामस्मरण बढ़ने लगता है वैसे-वैसे इस गृहस्थी की चिंताएँ एवं विवंचनाएँ अपनेआप ही शांत होने लगती है। वास्तविक तौर पर देखा जाए तो ये चिंताएँ एवं विवंचनाएँ, व्यर्थ बातों में एवं ग्रामवासियों की खोखली शिकायतों में ही निहित होती हैं और यही व्यर्थ की एवं खोखली शिकायतें भगवान को पसंद नहीं। उन्हें प्रिय लगता है नामस्मरण। इसका और भी एक इस प्रकार से है कि जब तक मनुष्य का नामस्मरण अधिकाधिक बढ़ता नहीं है तब तक ‘उस’ परमेश्‍वर का रूप भी मनुष्य के ध्यान में नहीं आता है। क्योंकि बिलकुल किसी भी सामान्य मानव को हम उसके नामानुसार ही पहचानते हैं अर्थात उनके नाम से ही कोई उनका अतंरंग समझ में नहीं आता। परन्तु भगवान का मात्र ऐसा नहीं होता। भगवान का कोई भी नाम हम जितना भी अधिक लेते रहेंगे, वही नाम भगवान का रूप, गुण, सामर्थ्य इसीतरह भगवान के असंख्य गुणों का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ अहसास मनुष्य को दिलाता रहता है और एक बार यदि वह इस नामस्मरण में रंग गया कि अपने-आप ही उस नामी के रंग के में रंग जाता है।

जब यह पारमार्थिक वृत्ति अधिकाधिक सबल होती है। उस वक्त गृहस्थी बिलकुल ही सहजता से चलती रहती है और इसीलिए रोहिले के पास न रहनेवाली उसकी पत्नी उसके पास रहने लगती है। और बाबा को भी उससे कोई तकलिफ नहीं होती।

पर फिर भी शिरडी के उन ग्रामवासियों के समान कुछ लोग होते हैं जिन्हें भगवान का संपूर्ण समर्पण रूप में नाम लेनेवाला कोई दिखाई देता है कि अरे इसने तो गृहस्थी छोड़ दी है ऐसा वे मानने लगते हैं और इसी बात को लेकर उनके शिकायतों का दौर शुरु हो जाता है। स्वाभाविक है कि भगवान इस तर्ह की शिकायतों को अनदेखा कर देते हैं।

रोहिले की इस काल्पनिक (मायिक) कथा में अनेक शाखाएँ एवं अनेक स्तर हैं और काल्पनिक शब्द कहकर हेमाडपंत इन अनेक शाखाओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।