श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५६

‘मिल जायेगी उसे कोई भी नौकरी। करना है अब उसे मेरी चाकरी।
इससे सांसारिक सुखों की प्राप्ती होगी॥
(‘मिळेल मेली तयासी नोकरी। करावी आतां माझी चाकरी। सुख संसारीं लाधेल॥

हेमाडपंत के नौकरी की इस कथा से एक बात मात्र सूर्यप्रकाश के समान ही स्वच्छ एवं स्पष्टरूप में दिखाई देती है कि बाबा का शब्द कभी भी खाली नहीं जाता। जब साईनाथ सद्गुरु किसी बात का उच्चार करते हैं, उस वक्त उनके द्वारा उच्चारण की गयी घटना घटित होती ही है। आगे इसी तृतीय अध्याय में हेमाडपंत स्वयं ही यह बात स्पष्टरूप में लिखते हैं।

शब्द बाबा का खाली जायेगा। ऐसा तो कभी भी नहीं होगा।
(शब्द बाबांचा खालीं पडेल। हें तों सहसा कधींही न घडेल।)

इसीलिए बाबा के कहेनुसार यह घटना घटित हुई ही। अर्थात हेमाडपंत को नौकरी भी मिल गई। परन्तु बाबा के कहेनुसार कि उन्हें अब मेरी चाकरी करनी है। हेमाडपंत ने जो नौकरी मिली उसका स्वीकार किया क्योंकि घर-गृहस्थी चलाने के लिए उन्हें नौकरी की ज़रूरत तो थी ही। परन्तु वह नौकरी जैसे मिली वैसे ही चली भी गई। और अब बाबा के कहेनुसार मुझे उनकी चाकरी करना ही उचित है ऐसा हेमाडपंत को महसूस हुआ। इसीलिए हेमाडपंत कहते हैं कि नौकरी करके नरसेवा होगी, परन्तु उस नौकरी से मात्र कुछ अधिक हित नहीं होगा क्योंकि अपना हित तो बाबा की चाकरी में ही निहित है। यह बात हेमाडपंत भली-भाँति जानते थे।

नरसेवा का संबंध जुड़ जायेगा। परन्तु इससे अधिक हित की प्राप्ति नहीं होगी॥
(नरसेवेचा संबंध जडेल। परी न जोडेल हित मोठें॥

बाबा के कहेनुसार उनकी चाकरी करने में ही हित है। इस सच्चाई का पता इससे चलता है। क्योंकि एक बार यदि किसीने भी सद्गुरु की आज्ञा नुसार सद्गुरु की आज्ञा का पालन किया तो उसे सद्गुरु साईनाथ ने ही गवाही दी है।

गृहस्थी उनकी सुखमय रही सदा। सुख की कमी न रही कभी।
भाव साई के प्रति रहने पर सदा। दूर हो जायेगी आपदाएँ उनकी॥
(ताटें याचीं भरलीं सदा। यावज्जीव न रितीं कद। भावें मत्पर होतां सर्वदा। हरतील आपदा तयाच्या)

हेमाडपंत को प्रत्यक्ष श्रीसाईनाथने ही यह ग्वााही दी है और उनकी ग्वाही का एक अक्षर भी अभी तक झूठा नहीं पड़ा है।

हर एक सामान्य मनुष्य के मन में इस कथा का सारांश क्या है इस प्रकार का प्रश्‍न खड़ा हो सकता है। सारांश यही है कि जब हर एक मनुष्य फिर चाहे वह कितना भी सामान्य क्यों न हो भक्ति मार्ग का मार्गक्रमण करना आरंभ करता है। साथ परमात्मा के सत्य, आनंद एवं प्रेम इन तीनों तत्त्वों को दृढ़तापूर्वक पकड़कर चलता है, उन्हें अपने जीवन में अर्थात अपनी कृति में उतारने का प्रयास करता है तब उसके गृहस्थी की सारी चिंता वे सद्गुरु ही वहन करते हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने भी यह ग्वाही भगवत गीता में अपने सभी भक्तों को दी है।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषा नित्याभियुक्तानां योगक्षेम वहाम्यहम्॥

और हर एक मनुष्य को भी यही करना होता है, गृहस्थी के साथ-साथ परमार्थ भी करना होता है। परन्तु गृहस्थी के अन्तर्गत आये दिन नित-नयी मुसीबतों, रूकावटों, चिंता आदि का समावेश होता ही है। ऐसे में इन सारी मुसीबतों का सामना करें की भगवत भक्ति करें, इस प्रकार का प्रश्‍न उसे सताने लगता है। और फिर गृहस्थी के साथ-साथ भक्ति कैसे करूँ यदि दिन में कोई विशेष समय दे दिया तो गृहस्थी कैसे चलेगी। इस प्रकार के उलटे-सीधे प्रश्‍न हर एक सामान्य मनुष्य को सताने लगते हैं। फिर हर कोई अपने-अपने तरीके से इन प्रश्‍नों का हल ढूँढ़ने लगता है। इसी कारण एक ऐसा भी रास्ता सामने आता है जिसमें गृहस्थी से निवृत्त हो जाने की घड़ी आ जाती है। उस वक्त ही परमार्थ की ओर प्रवृत्त होना होता है। परन्तु भारतीय जीवन पद्धति में इस संकल्पना को कभी भी स्थान नहीं दिया गया था। क्योंकि भारतीय जीवन पद्धति में भक्ति को अपने दैनिक जीवन का अविभाज्य अंग माना गया है। इसीलिए फिर जप, पठन, उपासना आदि के अलावा किया जानेवाला हरएक कर्म ईश्‍वर के लिए किया गया है यही भाव रहता था। इसलिए गृहस्थी एवं परमार्थ भिन्न नहीं थे। जिस समय गृहस्थी के साथ-साथ परमार्थ भी किया जाता है उसी क्षण आपके गृहस्थी को सुखमय बनाये रखने की सारी चिंता वे परमात्मा करते हैं।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईकई बार तो इसप्रकार की सर्वसाधारण मान्यता होती है कि यदि कोई मनुष्य जब अपने संपूर्ण ताकत के अनुसार भक्ति करने की कोशिश करता है, ऐसे में या तो वह स्वयं ही अपने परिवार की ओर अनदेखा, अनसुना करता है। लोगों को लगने लगता है कि अब यह घर-गृहस्थी को छोड़कर भगवान के पिछे पड़ गया हैं। इसीलिए परमात्मा मानवीरुप में अवतार लेकर आते हैं और हर एक मनुष्य के समक्ष गृहस्थी कैसे करनी है और परमार्थ कैसे करना है यह आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

यदि हम श्रीराम का उदाहरण भी देखते हैं तो, उन्होंने माता जानकी के साथ गृहस्थी की, श्रीकृष्ण ने भी गृहस्थी की और केवल गृहस्थीही नहीं की बल्कि उत्तम एवं आदर्श गृहस्थी की। श्रीसाईनाथ ने भी अपने हर एक भक्त के लिए कुछ ऐसा ही आदर्श प्रस्तुत किया। बाबाने भी हंडी में अनाज (अन्न) पकाया, भोजन तैयार कर अपने भक्तों को पेट भर खिलाया भी। स्वयं जाते में गेहूँ पिसाकर। यह तो हुआ गृहस्थी का उदाहरण। हर एक अवतार में परमात्मा ने स्वयं ही भक्ति कैसे करनी है इस बात का आदर्श भी प्रस्तुत किया।

इसीलिए जहाँ पर परमात्मा स्वयं ही भक्ति करते हैं साथ ही गृहस्थी भी करते हैं, वहाँ पर सामान्य मनुष्य भला इन सब से दूर कैसे भाग सकता है?

अपने नौकरी के संदर्भ में वर्णन करते समय हेमाडपंत कहते हैं कि यदि मनुष्य की चाकरी करता हूँ तो थोड़ी-बहुत नरसेवा हो जायेगी। मात्र इससे हित नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि अपना सच्च हित किसमें हैं यह बात उन्हें पूर्णरूपेण एवं व्यवस्थित रूप में पता चल गई थी।

परमात्मा की चाकरी करने में ही अपना खरा हित है। इस बात का पूर्णत: अहसास हेमाडपंत को था। मात्र यह चाकरी करते समय अपनी गृहस्थी की ओर अनदेखा करने का विचार भी उनके मन में नहीं था क्योंकि उनके साईनाथ ही उनके योगक्षेम का वहन करनेवाले थे।

मनुष्य विभिन्न बातों में सुख को तलाशते रहता है। मात्र जिस क्षण वह परमात्मा की चाकरी अर्थात उनकी सेवा, उनके बच्चों की सेवा अपनी पूर्ण शक्तिनुसार करना आरंभ कर देता है उसी क्षण उसकी गृहस्थी एवं परमार्था दोनों ही सुखमय बन जाता है।