श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१४)

कथा कीजिए सादर श्रवण। उस पर कीजिए पूर्ण मनन।
मनन पश्‍चात् कीजिए चिंतन। समाधान की प्राप्ति होगी।

बाबा के मुख से निकलनेवाला हर एक शब्द हमारे लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। श्रीसाईसच्चरित के ‘साई उवाच’ अर्थात बाबा के मुख से निकले वचनों का संग्रह हम सभी लोगों को करना ही चाहिए और उसे बारंबार पढ़ना भी चाहिए। प्रथम अध्याय से लेकर पूरे साईसच्चरित में बाबा जहाँ-जहाँ पर भी जो कुछ भी कहते हैं, उन सभी बातों को एक साथ लिख लेना चाहिए। इससे हमें कैसा आचरण करना चाहिए, बाबा हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं इन जैसे बातों की जानकारी प्राप्त होगी।

‘निजभक्त’ बनने के लिए ‘साई उवाच’ यह हमारा मार्गदर्शक एवं प्रमाणदर्शक है। इसीलिए बाबा के वचनों का संग्रह करके, उसका बारंबार मनन एवं चिंतन करके उसे आचरण में उतारना ज़रूरी है और यही सबसे आसान मार्ग है।

यहाँ पर इन पंक्तियों में बाबा हमें इसी पिपीलिका मार्ग का दिग्दर्शन कर रहे हैं। साईसच्चरित की कथाओं का अध्ययन कैसे करना चाहिए, इस बात का दिग्दर्शन बाबा स्वयं कर रहे हैं। कथाश्रवण करना, फिर यदि मुझे पढ़ना-लिखना न भी आता हो, तब भी कथाओं का श्रवण करना, मनन करना और इसके पश्‍चात् चिंतन करना, इस प्रकार से साईसच्चरित का अध्ययन करना चाहिए।

१) श्रवण
२) मनन
३) निदिध्यास (चिंतन)

१) श्रवण – (सुनकर उसे अंत:करण में उतारना)
श्रवण इस शब्द का अर्थ केवल कथा सुनना इतना ही नहीं है, बल्कि उन कथाओं में होनेवाले बोध को अपने आचरण में उतारना, यह इसका पूर्ण अर्थ है। हम यदि एक कान से कथा सुनते हैं और दूसरे से उसे निकाल देते हैं। तो यह सर्वथा गलत है।

‘रिघू द्या ईस आंतुलीकडे’ यानी ‘उसे अपने अंत:करण में उतारना’ यही हक़ीकत में श्रवण कहलाता है। ‘वाचले ते नाही संपले। कृतित उतरले पाहिजे’। यानी ‘पढ़ने से ही हमारा उद्देश्य पूरा हो गया ऐसा नहीं है, बल्कि जो कुछ भी पढ़ा-सुना उसे अपनी कृति में, आचरण में भी उतारना ज़रूरी है’। यही सच्चा श्रवण कहलाता है। ‘श्रवण’ यानी केवल स्थूल कानों से सुनना नहीं, बल्कि उसे सुनकर उसी के अनुसार आचरण करना, उसे अंगीकार करना अर्थात आत्मसात कर लेना (Not Only to Hear But to Listen)।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई हमारे लोहे के समान जड़ बन चुके जीवन को श्रवण यह पारस का स्पर्श प्रदान करता है। साईनाथजी से जो सुना उसपर अमल करना यह जीवन को स्वर्ण बना देता है। हमारे जीवन को सोना बना देनेवाला पारस है, यह आत्मसात करने की क्रिया। वाद-विवाद की कथा पढ़कर भुला देने से कुछ नहीं होनेवाला है, बल्कि हमें उस कथा को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए। नहीं तो साईसच्चरित पढ़ते रहना पर उस में दिए गए मूल्यों को अनदेखा कर प्रत्यक्ष जीवन में वाद-विवाद आदि करते रहना, यह कहाँ तक उचित होगा। यह तो वही होगा, ‘उलटे घड़े पर पानी डालने’ के समान।

साईसच्चरित का ‘श्रवण’ करना इस क्रिया में केवल दूसरों से सुनना, यह अभिप्राय भी नहीं है। जो लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते हैं, उनकी बात छोड़ दो, परन्तु मैं यदि पढ़ना-लिखना जानता हूँ, तो मुझे साईसच्चरित स्वयं पढ़कर उसका श्रवण करना चाहिए। साईसच्चरित कैसे पढ़ना चाहिए, यह प्रश्‍न अकसर हमारे मन में उ़ठता है। आदरणीय सुचितदादा की आवाज में हम सभी ने अध्याय ११वाँ, २२वाँ एवं ३३वाँ सुना ही है। उसी लय में, उसी तरीके से पढ़ना चाहिए। उसे पढ़ना भी इस तरह चाहिए कि हम स्वयं उसे सुन सके।

२) मनन –
श्रवण के पश्‍चात् मनन यह पड़ाव काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। हमारे मन पर लगाम कसने के लिए मनन की ज़रूरत होती है। कथा का श्रवण करने के पश्‍चात् हमें उसका मनन करना चाहिए।

मनन से क्या तात्पर्य है और इसे कैसे करना है?

मनन करना यानी वह कथा ग्रंथ में पढ़े बगैर भी मन के समक्ष प्रस्तुत करते रहना।

अब हेमाडपंत के भाटेजी के साथ हुए वादविवाद की कथा का उदाहरण देखते हैं। इस कथा में वाद-विवाद का कारण क्या था, इसका आरंभ कैसे हुआ, हेमाडपंत एवं भाटे इन दोनों ने क्या कहा, इस वाद-विवाद का अंत कैसे हुआ, बाबा ने हेमाडपंत यह नामकरण कैसे किया इन सभी घटनाओं को क्रमानुसार मन में याद करते रहना चाहिए।

गेहूँ पीसनेवाली कथा का मनन करते समय बिलकुल सुबह उठने से लेकर बाबा ने क्या-क्या किया, उन चारों स्त्रियों ने क्या-क्या किया, महामारी का नाश कैसे हुआ आदि घटनाओं को जैसे कि कोई फिल्म चित्रित हो रही हो इस प्रकार से देखना चाहिए। कथा पढ़कर पूरी होते ही मनन करना आरंभ कर देना चाहिए। इसके पश्‍चात् पुन: मूल कथा बिलकुल वैसे ही पढ़नी चाहिए। मूल कथा पढ़ते समय हमें इस बात का अहसास होगा कि अरे, मनन करते समय यह बात तो मैं भूल ही गया था। इस घटना को तो मैं भूल ही गया था। फिर पुन: उस घटना का उस कथा में अंतर्भाव करके कथा को पुन: पुन: उसी बारिकी के साथ याद करते रहना है।

मनन का प्रमुख लाभ यही है कि साईसच्चरित की हर एक कथा हमारे लिए वर्तमान में अवतरित होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम कोई फिल्म देख रहे हैं, नाटक देख रहे हैं। ऐसा होने से हमारा मन अन्य किसी अनुचित बात में उलझता नहीं है। बाबा की कथाओं का मनन करते करते मन उन्हीं कथाओं में रम जाता है। हम जब अन्य कोई भी गतिविधि करते हैं, तब मन की उस गतिविधि में न रमने की जो ‘प्रॉब्लेम’ हमारे समक्ष उपस्थित होती है, आलस (कंटाला) आता है, वह यहाँ पर नहीं आता।

‘कथा’ सुनने, पढ़ने की इच्छा हर किसी के मन में होती ही है। कथा में मन तुरन्त रम जाता है, कथा से ऊब नहीं जाता। नाटक, सिनेमा देखने में कथा, उपन्यास आदि पढ़ने में इसीलिए तो हमारा मन रम जाता है। मन के इसी गुणधर्म का उपयोग करके हमें मन को इसी सद्गुरु साईनाथ की कथाओं में उलझाकर रखना चाहिए, जिससे कि हम मन को अन्य बातों से सहज ही दूर रख सकते हैं। मन को अन्य बातों से दूर करके यहाँ पर इस विशेष बात पर मन को एकाग्र करो ऐसा प्राय: कहा जाता है, परन्तु साईनाथ की भक्ति में हम अपने मन को साईनाथ की कथा में लगाए रखते हैं। और यह करना काफ़ी आसान एवं स्वाभाविक है। ऐसा करते ही अपने आप ही मन अन्य सभी विषयों से परावृत्त हो जाता है।

मनन का अर्थ होता है याद करना और संग्रह करना। मन में बारंबार साईनाथ की कथाओं को याद करना और उसका संग्रह करना ये दो बातें मन से ही सिद्ध होती हैं। और मन में ये साईनाथ ही संपूर्णत: समाये रहते हैं। इन कथाओं का स्मरण करते समय और उनका संग्रह करते समय सबसे अधिक विशेष घटना यह घटित होती है कि श्रीसाईनाथ के सगुण साकार स्वरूप का सहज स्मरण होता रहता है और वह भी कैसे, तो सक्रिय साईनाथ के स्वरूप का। उन कथाओं में ‘कर्ता’ की भूमिका निभानेवाले श्रीसाईनाथ के स्वरूप का। साई की स्थिर प्रतिमा का ध्यान करने के लिए हमें उसके समक्ष बैठकर उतना समय देना पड़ता है, परन्तु एक बार यदि बाबा का रूप आँखों में भर जाता है और यदि हम उन कथाओं का मनन करते हैं तो फिर हम चाहे कहीं पर भी हों, फिर भी साईनाथ के ‘कर्ता’ स्वरूप को हम अपनी आँखों के समक्ष ला सकते हैं और यही बात आगे चलकर सगुण ध्यान करने में सहायक सिद्ध होती है।

मन को खाली न रखकर, जब भी हमें फुरसद मिलती है, उस वक्त हमें साईसच्चरित की कथाओं का स्मरण करते रहना चाहिए। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि साईसच्चरित में इतने बड़े प्रमाण में बाबा की विभिन्न कथाएँ हैं कि हमें मनन करने के लिए इन कथाओं की कोई कमी कभी मेहसूस ही नहीं होगी।

३) निदिध्यास (चिंतन) –
निदिध्यास का सरल अर्थ है, बारंबार चिंतन करते रहना। परन्तु इसके साथ ही यह अर्थ भी अभिप्रेत है कि उस चिंतन के साथ ही मुझे स्वयं मुझ में कौन सा उचित बदलाव लाना है। इस बात की लगन होनी चाहिए और इसके लिए निरंतर प्रयास भी करते रहने चाहिए। चिंतन यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव होता है। कथा का नित्य स्मरण बनाये रखना यह काम मन को ही करना पड़ता है। अब इसके आगे का पहलु है चिंतन।

काफ़ी लोग चिंतन का अर्थ चिकित्सा के रूप में ही मानते हैं। परन्तु यह उचित नहीं है, यहाँ पर भक्ति मार्ग में चिंतन केवल प्रेम की खातिर, बाबा की भक्ति के लिए ही होता है। चिंतन में उस कथा में रममाण हो जाना होता है। उस कथा का एक-एक पात्र मैं ही हूँ यह मानकर उन विशेष भूमिकाओं के अनुसार उन कथाओं पर विचार करना होता है। वहीं कभी मैं उन कथाओं में अभी जैसा हूँ, वैसा ही उस समय यदि होता तो मैं इस प्रसंग में कैसा व्यवहार करता, इस बात को लेकर आत्मचिंतन करना चाहिए।

चिंतन अनंत है और यही भक्ति की अनंतता है। हर बार चिंतन करने पर नवनवीन बोध प्राप्त होता है। उन कथाओं के सागर में गोता लगाकर हम जितनी भी गहराई में जायेंगे, हर बार उस गहराई में हमें नवनवीन बोधरत्न प्राप्त होते रहते हैं और यह हर एक रत्न हर किसी को अपने-आप ही भक्ति की गहराई तक जाकर स्वयं ही प्राप्त करना होता है।