श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-३५)

हेमाडपंत लिखते हैं-
काकासाहब भक्त-प्रवर (भक्तश्रेष्ठ)। नानासाहब चांदोरकर।
इनका ऋणानुबंध यदि न होता। तो कैसे पहुँच पाता शिरडी में यह हेमाडपंत॥

‘पहली बार मैं शिरडी कैसे आया’ इस बात का वर्णन करते हुए, जिन लोगों ने उन्हें शिरड़ी की राह दिखाई थी उनके ऋणों का निर्देश हेमाडपंत यहाँ पर कर रहे हैं और साथ ही यह भी एहसास करा रहे हैं कि आज भी हम साईभक्तों को शिरडी की राह दिखाने वाले काकासाहब दीक्षित एवं नानासाहब चांदोरकर ये दोनों भक्तप्रवर ही हैं। काकासाहेब दिक्षित एवं नानासाहेब चांदोरकर इन दोनों के साथ हेमाडपंत का पहले से ही घनिष्ट परिचय तो था ही।

साईनाथ की महिमा

काकासाहब दीक्षित हेमाडपंत को बार बार साईनाथ की महिमा बताते रहते थे। साथ ही ‘कम से कम एक बार तो शिरडी जाकर दर्शन कर लीजिए’ इस बात का आग्रह करते रहते थे। एक बार काकासाहब के द्वारा काफ़ी आग्रह किये जाने पर हेमाडपंत ने शिरडी जाने का निश्‍चय कर ही लिया। परन्तु जिस दिन जाना तय हुआ, ठीक उसी वक्त एक ऐसी घटना घटी कि जिसे सुनकर हेमाडपंत का मन शिरडी जाने से परावृत्त हो गया और उन्होंने अपनी शिरडी जाने की योजना रद कर दी।

हेमाडपंत का एक करीबी दोस्त था। वह अपने परिवार के साथ लोनावला गया था। इस मित्र के भी गुरु थे और उनकी ओर से उसे अनुग्रह भी प्राप्त हुआ था। परन्तु लोनावला जाने पर उसके पारिवारिक जीवन में एक विचित्र घटना घटी। उस शुद्ध जलवायु के स्थान में अर्थात लोनावला में ही उसके इकलौते बेटे के अचानक बीमार पड़ जाने के कारण हेमाडपंत के उस मित्र ने अनेक प्रकार के सारे मानवी एवं अन्य उपचार करके देखे। डॉक्टरी उपाय के साथ-साथ गंडे, धागे, उतारे आदि दैवी उपाय तक सब कर डाले, मग़र तब भी बच्चे का ज्वर किसी तरह कम हो ही नहीं रहा था। आखिर में हारकर उस मित्र ने अपने गुरु को ही बुलाकर उसके सामने बिठा दिया और उनसे विनति की कि मेरे बच्चे को बचा लीजिए। पर फ़िर भी उस लड़के का निधन हो गया।

ऐसी कठिन घड़ी में अचानक इकलौते बेटे का निधन हो जाना, वह भी ना तो किसी बीमारी के और ना ही किसी विशेष कारण के। स्वस्थ बच्चे का दुनिया से इस तरह अचानक चले जाना और वह भी इस मुसीबत से अपने बेटे को बचाने के लिए बेटे के सामने आपने गुरु को लाकर बिठा देने के बावजूद भी, यह बात भी हेमाडपंत के शिरडी जाने में रुकावट लानेवाली साबित हो रही थी।

हेमाडपंत को जब इस बात का पता चला, तब वे मन ही मन अत्यधिक उद्विग्न हो गए। तब उनके मन में यह विचार आया कि आख़िर गुरु की उपयुक्तता ही क्या? गुरु के पास होते हुए भी वे यदि बच्चे को बचा नहीं सकते तो गुरुभक्ति करने से क्या लाभ है? ऐसा विचार मन में उठने पर शिरड़ी की योजना रद कर दी गई।

मेरे मित्र के साथ जो हुआ, उसके गुरु प्रत्यक्ष उसके पास होते हुए भी उसके इकलौते बेटे को वे बचा नहीं सके, तो फ़ीर मैं गुरु के चक्कर में क्यों पडूँ? गुरु कर्मगति को भला कैसे बदल सकते हैं? जो कुछ भी नसीब में लिखा होता है वही यदि होना होगा तो फ़ीर गुरु के होने या न होने से क्या फ़र्क पड़ने वाला है? यदि मुझे प्रारब्ध का भोग भुगतना ही है और इसके अलावा कोई अन्य रास्ता ही नहीं है तो फ़ीर गुरु की आवश्यकता ही क्या है? कर्म के अटल सिद्धान्त को कोई भी बदल नहीं सकता है, तो व्यर्थ ही गुरु के पीछे भागने का क्या मतलब है? जो कुछ भी भोग अपनी किस्मत में लिखे हैं उन्हें भुगतना ही है, उन सभी सुख-दुखों को यदि भुगतना ही है, तो फ़ीर गुरु के पास जाने का क्या फ़ायदा? इन सभी विचारों के कारण हेमाडपंत ने शिरडी जाने के अपने फैसले को रद कर दिया।

हम भी जब ऐसी कोई घटना देखते हैं अथवा सुनते हैं, तब हमारे मन में भी इस प्रकार के विचार आते ही हैं। कर्म का अटल सिद्धान्त जब चुक नहीं सकता है, तो फ़ीर सद्गुरु की क्या आवश्यकता? इस प्रकार के प्रश्‍न हमारे मन में भी उठते ही हैं। परन्तु यहीं पर हमें ध्यान देना चाहिए कि कर्म के अटल सिद्धान्त के अनुसार जो भोग मेरे हिस्से में आते हैं, उन भोगों की शुरुआत होते ही हमारे सहनशक्ति के अनुसार उचित कर्म करवा कर पुण्य का, भक्ति का संचय बढ़ाना, यह काम केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं। प्रारब्धभोग की तीव्रता को कम करना, उसे सहन करने की शक्ति प्रदान करना और उस भोग से पुन: बुरे प्रारब्ध का जन्म न हो और साथ ही उचित पुरुषार्थ करवाकर भक्ति की जमापूँजी बढ़ाना, यह कार्य केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं।

श्रीमद्पुरुषार्थ प्रथम खंड- सत्यप्रवेश में श्री अनिरुद्ध बापु ने इससे संबंधित अत्यन्त सहज, सुंदर एवं सरल विवेचन आसान शब्दों में उदाहरणसहित किया है कि सद्गुरु-भक्ति का महत्त्व क्या है। उसे स्वयं पढ़ना अधिक श्रेयस्कर होगा। इससे हमारे मन में उठनेवाली शंका-कुशंकाओं का शमन हो जायेगा और साथ ही ऊपर उठनेवाले प्रश्‍नों का उचित उत्तर मिल जाने पर सद्गुरु-भक्ति का महत्त्व भी समझ में आ जायेगा।

एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना, यह मान लो किसी मनुष्य के प्रारब्ध का भोग है और इसी कारण उसे ‘अ’ स्थान से निकलकर ‘ब’ स्थान तक का प्रवास करना है। यदि वह सद्गुरु के भक्तिमार्ग का प्रवासी नहीं है, तब उसे इस भोग को बड़ी ही बुरी तरह से भुगतना पड़ेगा। यूँ ही धूप-ताप में भटकते हुए, उसे बगैर अन्न-जल के यह प्रवास करना पड़ेगा। परन्तु जो साईनाथ का श्रद्धावान है, उसके लिए बाबा ऐसी योजना बनायेंगे कि ‘ब’ स्थान पर जाना उसके लिए काफ़ी आसान हो जायेगा। साथ ही उस स्थान पर जाने से उसका लाभ ही होगा। इसके अलावा यह प्रवास पथरिले रास्ते पर पैदल चलते हुए करने के बजाय वह गाड़ी में बैठकर यह प्रवास करेगा और वह भी गाड़ी की पिछली सीट पर आराम से बैठकर आनंदपूर्वक करेगा। साथ ही जाते-जाते पोथी पढते हुए, स्तोत्रपाठ करते हुए, रामनाम बही लिखते हुए या अन्य भक्तिसंबंधित कार्य करते हुए वह समय भी वह श्रद्धावान सत्-कार्य में लग जायेगा। रास्ते में किसी अन्य वृद्ध व्यक्ति को पैदल चलते देख वह श्रद्धावान उसे भी अपनी गाड़ी में बिठाकर उसके गंतव्य स्थान तक छोड सकेगा यानी इस भोग को भुगतते हुए वह पुण्य भी कमा लेगा। हो सकता है कि रास्ते में किसी अपघात में जख्मी होने वाले व्यक्ति को वह स्वयं की गाड़ी में आश्रय देकर अस्पताल तक पहुँचाकर पुण्य प्राप्त कर लेगा। प्रवास का भोग भुगतना उसके प्रारब्ध में था ही, परन्तु साईनाथ की कृपा से उसका यह भोग सहज ही, बगैर किसी क्लेश के, उसने भुगत लिया और साथ ही उसके हिस्से में पुण्य एवं भक्ति भी जुड़ गई।

कर्म के अटल सिद्धान्त के अनुसार जो होना है वह चाहे कितना भी अटल क्यों न हो, परन्तु बाबा के मन में जो आता है, उसे कोई भी नहीं रोक सकता है, वह तो होता ही है। बाबा के मन में जिस पर कृपा करनी है उसके प्रारब्ध का नाश तो होगा ही क्योंकि इस साईनाथ की इच्छा ही सर्वोच्च है। संत एकनाथ महाराज के अनुसार ‘हरिकृपा से प्रारब्ध का नाश होता ही है इसमें कोई शक नहीं है’ और इसीलिए सद्गुरु-कृपा प्राप्त करने के लिए हमें साईनाथ के मर्यादाशील भक्तिमार्ग पर चलते रहना चाहिए। फ़ीर मेरा क्या करना है, वह बाबा भली-भाँति जानते ही हैं और बाबा मेरा उद्धार अवश्य करेंगे ही।