श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ४४)

श्रीसाईसच्चरित इस ग्रंथ को सचमुच श्रीसाईनाथ ने ही हेमाड़पंत को लेखनी (कलम) बनाकर स्वयं ही लिखा है। इसमें लिखी कथाओं को पढ़ते-पढ़ते हमारी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह वह प्रसंग, घटना अपने आप ही साक्षात् सरकती रहती है। ऐसा सामर्थ्य स़िर्फ साईनाथ के द्वारा लिखे गये अथवा लिखवाये गये अक्षरों में ही हो सकता है। उस कथा में हम पूरी तरह से ‘रम’ जाते हैं ।

20_11_2011_COL- श्रीसाईसच्चरित

कथा पढते या सुनते समय और कुछ भी सामने न आते हुए मन में सिर्फ साईनाथ एवं उनकी लीला ही होती है और प्रेम से उन्हें जो कुछ भी मुझे देना होता है वह वे मुझे देते ही रहते हैं। एक ही कथा को हम यदि बारंबार याद करते रहे, तब भी हमें हर बार एक नये आनंद की प्राप्ति होती है और साथ ही स्निग्ध-मधुर ज्ञान भी प्राप्त होता है। जिस तरह गोताखोर पानी में डूबकी लगाकर गहराई में जाकर हर बार कोई न कोई नया रत्न लेकर बाहर आता है, उसी तरह इन कथाओं में हर एक श्रद्धावान के साथ भी ऐसा होता है, हर बार उसे एक नये बोध-रत्न की प्राप्ति होती है।

गेहूँ पीसनेवाली कथा में सबसे पहले हमने हमारी तरह  ही गृहस्थाश्रमी रहनेवालीं चारों स्त्रियों के आचरण का अध्ययन करके उससे बोध प्राप्त किया। उसके पश्चात् साईनाथ के आचरण का अध्ययन करते-करते हमने ग्यारह मुद्दों का अध्ययन किया। सच पूछा जाये तो साई के आचरण का अधिक अध्ययन करके हमें अधिक से अधिक बोधामृत प्राप्त करना चाहिए। बाबा का हर एक बोल, उनकी हर एक कृति हमारे लिए बहुत ही मूल्यवान हैं। बाबा के हर एक भक्त की कृति हमारे लिए मार्गदर्शक हैं। हर एक कथा में बाबा और भक्त इन दोनों के आचरण का, उनके बोलों का अध्ययन करके अधिक से अधिक बोध प्राप्त करके उसे अपने आचरण में उतारने की जोरदार कोशिश हमें करनी चाहिए। हमारे इस प्रयास के प्रवास में हो सकता है कि चलते समय हम गिर पड़ेंगे, लड़खड़ायेंगे, मगर तब भी साईनाथ की राह हम नहीं छोड़ेंगे, बाबा के बिना और कहीं भूलकर भी नहीं देखेंगे।

‘मेरा जो कुछ भी करना है वह बाबा तुम्हीं करो, मुझे मारो, पीटो, सज़ा दो, जो जी चाहे वह करो; पर मुझे अपने से दूर मत रखना। बस! तुम मुझे कभी नहीं छोड़ोगे, इस बात का मुझे पुरा विश्वास हैं। हे साईबाबा! तुम मुझे अपने पैरों की धूल की तरह हमेशा अपने साथ रखना। तुम्हारे चरणों के बिना और कोई जगह नहीं है मेरी। तुम्हारे चरणों में ही मेरा सर्वस्व है।’ ऐसी ही होनी चाहिए हमारी प्रार्थना।

साईचरण हमें प्राप्त होते हैं केवल उचित आचरण से और इसीलिए हमने अब तक साईनाथ के आचरण का (गेहूँ पीसने की कथा का) अध्ययन करके ग्यारह महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया। अब हम उन मुद्दों का पुन: अवलोकन करेंगे, क्योंकि इन सभी मुद्दों को हमारे आचरण में उतारना बहुत ज़रूरी है। इसीलिए इन मुद्दों पर जितना विचार हम करेंगे उतना कम है।

संतश्रेष्ठ श्री तुलसीदास जी श्रीराम को ‘मायामनुष्य’ कहते हैं। सचमुच तुलसीदास ने इस एक ही शब्द में श्रीराम का अत्यन्त समर्पक वर्णन किया है। मेरे साईराम भी इसी तरह ‘मायामनुष्य’ ही हैं। अपनी माया के अनुसार मानवरूप धारण करनेवाले वे मायामनुष्य बाबा, स्वयं साक्षात् ईश्वर होकर भी उन्होंने जब मानवरूप, मानव की काया धारण की, तब उन्होंने मानवी देह की सभी मर्यादाओं का पालन पूर्ण रूप से करते हुए ही सभी लीलाएँ की। इसीलिए साई के आचरण का अध्ययन करना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसका मतलब यह नहीं है कि साई जिस तरह खंडयोग करते हैं, धुनी में हाथ डालते हैं, गरम हंड़ी में हाथ डालते हैं, लकडी की सँकरी पट्टी चिंदियों से तख्ते से टाँगकर उस पर चारों तरफ दीप जलाकर सोते हैं, वैसा ही हमें भी करना चाहिए। जानबूझकर यदि कोई ऐसी बात करता है, तो साईं का सटका उसकी पीठ पर पड़ा ही समझो। साई के आचरण का अध्ययन करके यदि कोई उनकी बराबरी करने की कोशिश करता है, तो उससे बड़ा मूर्ख और कोई नहीं, क्योंकि बाबा की बराबरी कभी कोई कर ही नहीं सकता है।

हमें साई के आचरण का अध्ययन करना है। साई स्वयं मानव देह धारण करके हर एक मानव के लिए जिस मर्यादा मार्ग को दिग्दर्शित करना चाहते हैं, उसका विवेकपूर्ण अध्ययन करके स्वयं के आचरण में उचित रूप से बदलाव लाकर इस साईराम का वानरसैनिक बनने के लिए, मुझे कैसा आचरण करना चाहिए, एक भक्त के रूप में मुझसे साई क्या चाहता है, यह सब समझकर साईनाथ का मर्यादाशील भक्त बनने के लिए, श्रद्धावान बनने के लिए मुझे इन ग्यारह मुद्दों का गहन अध्ययन करना है।

१)समय का अचूक नियोजन करना:
नित्यनैमित्तिक काम-काज के लिए लगनेवाले समय को ध्यान में रखकर उसी के अनुसार समय का अचूक नियोजन करना और वक्त का पाबंद बने रहना।

२)कोई भी कार्य करते समय स्वयं की अनेक जिम्मेदारियों का भी ध्यान रखना:

हम भक्तिमार्गी हैं, इसीलिए हम व्यावहारिक जीवन में बेगाने बनकर रहें, हमें कोई भी फँसाये, हम अपनी वेशभूषा भी फकीरों की तरह रखें, अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों एवं मर्यादा के प्रति उदासीन भाव रखें, ऐसा कहकर नहीं चलता। हमें भक्तिमार्ग के साथ-साथ अन्य सभी बातों में भी उचित एवं सुव्यवस्थित रूप में रहकर अपने जीवन को सुखमय बनाना है।

३)अंतिम ध्येय की निश्चितता एवं सावधानी:
कार्य आरंभ करने से पहले, कार्य करते समय तथा कार्य हो जाने के पश्चात् भी हमें अपने अंतिम ध्येय के प्रति सावधान रहना है। कार्य आरंभ करने से पहले ही हमें अपने ध्येय को निश्चित कर लेना चाहिए और उसी के अनुसार दिशा भी कायम रखनी चाहिए।

४)सावधानी के साथ पूर्व-तैयारी:
किसी भी कार्य की तैयारी अच्छी तरह से करके ही कार्य का आरंभ करना चाहिए। ‘कार्य में आगे चलकर आवश्यक रहनेवाली सामग्री उस उस विशेष समय पर मिल ही जायेगी’ इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए। आवश्यक सामग्री अथवा उपसामग्री या पूरक सामग्री आदि का व्यवस्थित रूप से लेखा-जोखा रखकर ही कार्य को आरंभ करना चाहिए।

५)अपनी भूमिका की सिद्धता:
इस कार्य में मेरी स्वयं की भूमिका क्या है? इस बात का गहराई से अध्ययन करके उसी के अनुसार स्वयं को भी सक्षम रखना है। कार्य का सर्वांगीण अध्ययन तथा अपने स्वयं के गुण-दोष का एहसास होना, अपनी योग्यता का सही ज्ञान रहना, इन सभी बातों का बारीकी के साथ अध्ययन करके उसी के अनुसार स्वयं को सिद्ध रखना है।

६)कार्यविरोधी एवं कार्यबाधक बातों को पहले से ही दूर रखना है:
मेरे एवं मेरे कार्य के बीच अवरोधक बननेवाली बातों को कार्य का आरंभ करने से पहले ही दूर कर देना है। मान लो कि कार्य का आरंभ होने के बाद यदि ऐसी कोई बाधक बात यदि उपस्थित हो भी जाती हैं तो उसे दूर करने में न हिचकिचाते हुए ‘मेरे और मेरे परमेश्वर के बीच जो कुछ भी आता है, उसे छाँट देनेवाली तलवार मुझे अपने पास निरंतर रखनी ही चाहिए।’ आदरणीय साधनाताई के इन बोलों को मुझे यहाँ पर याद रखना चाहिए। साधनाताई ने उनके इन बोलों को प्रत्यक्ष में उतारा, यह हम सबने देखा ही है। हमारे लिए ज्येष्ठ मार्गदर्शक रहनेवाली एवं भक्तिमार्ग में श्रेष्ठ होनेवाली इस बडी बहन के बोलों को हमें सदैव ध्यान में रखना ही चाहिए।

७)हर एक बात का प्रमाण अचूक रूप में निश्चित करना अर्थात् प्रमाण का ध्यान रखना:
इसमें भौतिक कार्य की तरह ही व्यावहारिक एवं पारमार्थिक कार्य का भी समावेश होता है। मुझे अपने जीवन में किसे कितना ‘प्रमाण’ देना चाहिए, किसे कितना ‘महत्त्व’ देना चाहिए, इस बात का निश्चय मुझे ही करना है। परमात्मा के पास ले जानेवाली बातें अधिक प्रमाण में होनी चाहिए, तो परमात्मा से दूर ले जानेवाली बातें अंशमात्र भी नहीं होनी चाहिए्। जीवन में हर बात का जमाखर्च मुझे बारंबार जाँच-परखकर देखते रहना चाहिए।

८)आत्मनिर्भरता (स्वावलंबन) और किसी से भी कभी कुछ भी मुफ़्त में न लेना:
किसी पर भी निर्भर न रहते हुए, किसी से भी कोई भी अपेक्षा न रखते हुए आत्मनिर्भर रहना और कभी भी किसी से कुछ भी मु़फ़्त में न लेना।

९)कार्य में सहभागी होनेवाले श्रद्धावान का अंत:स्थ हेतु जानने के बाद ही उसे उचित जानकर ही अपने कार्य में सहभागी करना:

परमात्मा को न माननेवाले, सत्य-प्रेम-आनंद एवं पावित्र्य के मूल्य को पहचानकर उसका जतन न करनेवाले, फिर वे चाहे कोई भी क्यों न हो, कितने भी बड़े क्यों न हो, ऐसे लोगों से किसी भी मदद का स्वीकार न करना, श्रद्धावानों से ली गई मदद को आभार-सहित लौटाना और हमसे जितनी हो सके उतनी श्रद्धावानों की मदद करने के लिए सदैव तैयार रहना।

१०)कार्य का व्यवस्थापन अचूकता से करना:
इस मुद्दे के अन्तर्गत हमने बाबा से अनेक बाते सीखीं। कार्य को विभाजित करके कार्य को बिलकुल आसान कर देना और फिर उन विभागों का परस्पर समन्वय (को-ऑर्डिनेशन) बनाये रखना। हर एक विकल्प (ऑप्शन) के लिए नया रास्ता तैयार रखना, सामूहिक प्रयास एक साथ मिलकर होते रहे इसके लिए भक्ति-सेवा का मेल-जोल बनाये रखना, समूह में यदि कोई गलत जा रहा हो तो उसे प्रेमपूर्वक इस बात का एहसास करा देना। समय, काम, वेग, दिशा इन सभी बातों का ध्यानरखना, ध्येय एवं लक्ष्य का ध्यान रखना, ‘एकाग्रता’ रखना।

११)भगवत्-अर्पण:
‘मैं कर्ता’ यह भावना न रखकर ‘साईराम ही कर्ता हैं’ इस दृढ़भावना के साथ ही काँटे से काँटा निकालकर ‘शुद्ध स्वधर्म’ साध्य करना चाहिए। हर एक कर्म ‘इदं न मम। इदं साईनाथाय। श्रीसाईनाथापर्णमस्तु।’ इसी निष्ठा के साथ करना चाहिए।
किसी भी कार्य का श्रेय मुझे मिलना चाहिए, लोगों से ‘वाहवाही’ मिलनी चाहिए ऐसी अपेक्षा न रखकर अपना काम साई के मूल्यों के अनुसार साई को कर्ता मानकर प्रेम के साथ करना चाहिए।

‘लोग क्या कहेंगे? कोई क्या कहेगा?’ इससे कहीं अधिक ‘मेरा साई क्या कहेगा?’ इस बात को ध्यान में रखकर अपना नित्यनैमित्तिक कर्म करते रहना है। इस सब को सुचारु रूप से करने के लिए उदी का नित्य सेवन एवं धारण करना, सद्गुरु की प्रतिमा किसी न किसी रूप में अपने पास रखना, प्रार्थना करना आदि का यानी मर्यादाशील भक्तिमार्ग का सहारा लेना चाहिए। इन सब में सब से आसान राह है- हेमाडपंत के द्वारा दिखायी गयी राह, बाबा की कथाओं में मग्न रहने का मार्ग । ‘श्रीसाईसच्चरित’ यह ग्रंथ और उसमें होनेवाली हर एक कथा को बारंबार प्रेमपूर्वक पठन करते रहना, उनका चिंतन, मनन करते हुए आत्मसात कर अपने जीवन में उसके बोधामृत को उतारते रहना। हम सब के लिए यही एक सहज, सरल एवं सुंदर आसान मार्ग है।