समय की करवट (भाग ७२) – पकड़ने जाओ को काटता है, छोड़ दिया तो भाग जाता है

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-३२

क्युबा की भूमि पर सोव्हिएत क्षेपणास्त्र (मिसाईल्स) तैनात होने की बात अमरिकी टोह-विमानों के टोह में आने के कारण ‘कोल्ड वॉर’ एकदम गर्म हो उठा था। अमरीका के इतने नज़दीक, बेझिझक ये लगभग ४० क्षेपणास्त्र क्युबा में तैनात करने में सोव्हिएत को क़ामयाबी मिलने के कारण अमरीका अधिक ही बेचैन हुई थी। उसमें भी, यह ख़बर मिलने के बाद तो राष्ट्राध्यक्ष केनेडी की हालत ‘पकड़ने जाओ तो काटता है, छोड़ दो तो भाग जाता है’ ऐसी हुई थी।

केनेडी ने फिर अतिमहत्त्वपूर्ण ऐसे चौदह सलाहगारों का एक कार्यगुट तैयार किया और फिर इस मुद्दे पर अमरीका की भूमिका क्या होनी चाहिए, इसके बारे में चर्चा शुरू की।

इस मामले में अमरीका द्वारा उठाये गये किसी भी संभाव्य कदम के लघुकालीन एवं दीर्घकालीन परिणाम क्या होंगे, इस मुद्दे पर इस गुट की दिनरात चर्चाएँ शुरू थीं।

कई विकल्पों के बारे में सोचा गया, जैसे कि –
– कुछ भी ना करें और क्युबा पहला कदम उठाने तक प्रतीक्षा करें;
– सोव्हिएत रशिया से चर्चा करें और सोव्हिएत रशिया के नज़दीक के तुर्कस्तान-इटली इन जैसे देशों में तैनात अमरिकी क्षेपणास्त्रों को हटाने के बदले में क्युबास्थित इन सोव्हिएत क्षेपणास्त्रों को हटाने का सौदा करें;
– क्युबा पर हमला करें;
– क्युबा की घेराबंदी करें;
– इन क्षेपणास्त्रों के स्थानों पर हमलें कर उन्हें नाक़ाम बना दिया जायें;
ऐसे कई विकल्पों पर चर्चाएँ कीं गयीं।

कुछ सलाहगारों की राय क्युबा पर हमला करें, ऐसी थी। लेकिन अपर्याप्त अचूक जानकारी न होने के कारण फँसी हुई ‘बे ऑफ पिग्ज’ मुहिम का अनुभव ताज़ा होने के कारण केनेडी का मत इस विकल्प को अनुकूल नहीं था।

वैसे इन सोव्हिएत क्षेपणास्त्रों से तत्काल कोई ख़तरा नहीं था और यदि उन्होंने हमला किया भी, तो भी उनकी ख़बर लेने के लिए, लगभग ५ हज़ार के आसपास क्षेपणास्त्र अपने संग्रह में होनेवाली अमरिकी क्षेपणास्त्रयंत्रणा समर्थ थी ही; इसी कारण फिलहाल ‘वेट-अँड-वॉच पॉलिसी’ अपनायी जाये ऐसा कुछ सलाहगारों का मत था। लेकिन ‘कुछ भी नहीं किया’ ऐसा भी दिखाई देना नहीं चाहिए था। क्योंकि यदि ऐसा हो जाता, तो क्रेमलिन को, दोस्तराष्ट्रों को और अमरीका या सोव्हिएत इन दोनों में से किसी भी गुट में अब तक शामिल नहीं हुए तटस्थ राष्ट्रों को इससे यही ग़लत संदेश जाता कि अमरिकी सरकार दुर्बल है। साथ ही, अमरिकी जनता को भी उसमें अमरिकी प्रशासन का नाकर्तेपन प्रतीत होता; और चुनावों के क़रीब आते हुए यह ख़तरा मोल लेने के लिए केनेडी प्रशासन तैयार नहीं था।

असली झंझट का मुद्दा यही था। उस वक़्त ऐसे लगभग तीनसौ क्षेपणास्त्र सोव्हिएत के पास है ऐसी अमरिकी गुप्तचरों की ख़बर थी और उसमें इन लगभग चालीस क्षेपणास्त्रों की बढ़त हुई थी। लेकिन असली ख़तरा इससे भी नहीं था। क्योंकि उसी प्रकार के लगभग ५ हज़ार क्षेपणास्त्र अमरीका के पास थे और इन तीनसौ+चालीस से कुछ ख़ास प्रतिकूल फ़र्क़ अमरीका को पड़नेवाला नहीं था। लेकिन अमरीका में राजकीय उथलपुथल करने की ताकत तो यक़ीनन ही इस क्रायसिस में थी।

केनेडी को यह जानकारी मिले हुए और यह कार्यगुट इसपर गुप्त रूप से चर्चा करने लगे हुए सात दिन बीत गये थे। मुख्य रूप में, इस अवधि में तत्कालीन सोव्हिएत विदेशमन्त्री आंद्रेई ग्रोमिको के साथ संपर्क स्थापित किया गया था और यह ‘आक्रामक’ (‘ऑफेन्सिव्ह’) क्षेपणास्त्र न होकर ‘रक्षात्मक’ (‘डिफेन्सिव्ह’) क्षेपणास्त्र हैं, ऐसी लीपापोती सोव्हिएत ने की थी। लेकिन ज़ाहिर है, अमरीका को उसपर विश्‍वास नहीं था।
यह ख़बर लीक होकर अमरिकी जनता में घबराहट फैलने से पहले ही कुछ गतिविधि यक़ीनन ही करनी चाहिए थी।

केनेडी ने आख़िर फैसला किया और २२ अक्तूबर को एक राष्ट्रव्यापी विशेष टीव्ही प्रसारण के ज़रिये ‘क्युबा में सोव्हिएत क्षेपणास्त्र तैनात हुई हैं ऐसा हमारे टोह विमानों को दिखायी दिया है’ ऐसा घोषित किया। लेकिन अमरिकी जनता में घबराहट ना फैलें, इसके लिए – ‘क्युबा में से अमरीका की ओर आनेवाला कोई भी परमाणु क्षेपणास्त्र, यह सोव्हिएत ने ही दागा है, ऐसा अमरीका द्वारा माना जायेगा और उसके अनुसार उसका जवाब दिया जायेगा’ ऐसा भी निःसंदिग्ध शब्दों में घोषित किया।

क्युबा की समुद्री घेराबंदी के दौरान क्युबा की ओर आनेवाली सोव्हिएत युद्धनौका का पीछा करनेवाली अमरिकी युद्धनौका

इसी दौरान केनेडी ने एक ख़ास अध्यादेश जारी कर, अमरिकी नौसेना द्वारा क्युबा के चहूँ ओर अमरिकी लड़ाकू जहाज तैनात कर क्युबा की समुद्री घेराबंदी की। इस विशेष अध्यादेश में ‘नेव्हल क्वारंटाईन’ ऐसा सावधानीपूर्वक शब्दप्रयोग किया गया था, ताकि आंतर्राष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन किया होने का आरोप अमरीका पर ना हों।

उसीके साथ, अमरिकी हवाईदल को भी ज़रूरत पड़ने पर क्युबा पर हमला करने के लिए सुसज्जित रहने के आदेश दिये गये थे और लगभग सवा लाख सैनिक अमरीका-क्युबा सीमा पर फ्लोरिडा राज्य में क्युबा में घुसने के लिए तैनात क दिये गये थे।

लेकिन इस सागरी घेराबंदी की परवाह न करते हुए सोव्हिएत ने यदि क्षेपणास्त्र ले आनेवाले अपने जहाज़ बेझिझक आगे लाने के या तलाशी लेने के लिए मनाही करने के प्रयास किये होते तो….
तो युद्ध….परमाणु युद्ध अटल हो चुका हुआ होता!
….यह बात केनेडी और ख्रुश्‍चेव्ह दोनों भी भली भाँति जानते थे।
….यह जैसे पॉझिटिव्ह पॉईंट था, वैसे ही निगेटिव्ह भी!

दुनियाभर में ख़ौफ़ पैदा करनेवाले इस ‘क्युबन-मिसाईल्स’ क्रायसिस के खिलाफ़ दुनियाभर के अमरिकी दूतावासों के सामने ऐसे प्रदर्शन किये गये।

पूरी दुनिया साँस थामकर सोव्हिएत के प्रतिसाद की प्रतीक्षा कर रही थी। खुद अमरीका में हुए जनमत परीक्षणों में भी हर ५ में से ३ नागरिकों को ‘युद्ध होगा’ ऐसा ही लग रहा था। पूरी दुनिया की भी परवाह न करनेवालीं इन दो महासत्ताओं के खिलाफ़ दुनियाभर में ग़ुस्सा उबल रहा था। ख़ासकर देशों-देशों में स्थित अमरिकी दूतावासों के बाहर ‘परमाणुयुद्ध नहीं चाहिए’ ऐसे प्रदर्शन किये गये।

क्या उसके बाद तो इन सत्ताओं की अक़ल ठीकाने आ गयी?