समय की करवट (भाग ६७) – सुएझ : घटनाओं की गूँजें

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-२७

सुएझ नहर क्रायसिस हालाँकि समाप्त हो चुका था, उन घटनाओं की गूँजें अभी तक सुनायी दे रही थीं।

सुएझ नहर का राष्ट्रीयीकरण करने के बाद अरब जगत् में लोकप्रियता बुलंदी पर पहुँच चुके नासर को सबक सिखाने के उद्देश्य से ब्रिटन-फ्रान्स-इस्रायल इन तीन देशों ने अपने अपने हितों को सँभालने के लिए (ब्रिटन-फ्रान्स ने सुएझ नहर का कब्ज़ा हाथ से गया इसलिए, तो इस्रायल ने अरब-इस्रायल इस परंपरागत विवाद का पुराना हिसाब चुकता करने के लिए) जल्दबाज़ी में की हुई मुहिम असफल साबित हुई। जल्दबाज़ी में की हुई इस कृति के खिलाफ़ आंतर्राष्ट्रीय जनमत खौलकर, इन तीन देशों को जागतिक ग़ुस्से का सामना करना पड़ा और इन तीन देशों की सेनाओं को हाथ हिलाते हुए सुएझ नहर क्षेत्र से निकलना पड़ा। पोर्तुगाल और आईसलँड इन देशों ने तो – ‘ब्रिटन और फ्रान्स ने फ़ौरन सेना को पीछे नहीं हटाया, तो उन्हें ‘नाटो’ से निकाल बाहर कर दिया जाये’ ऐसी चरमसीमा की भूमिका अपनायी।

इस घटनाक्रम में परदे के पीछे के नाट्य में – अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष आयसेनहॉवर जितना ही, तब तक अमरीका या रशिया इनमें से किसी भी गुट में जाने की इच्छा न रहनेवाले ‘गुटनिरपेक्ष देशों’ के आन्दोलन के (‘नॉन-अलाइन्ड मूव्हमेन्ट’ के) नेता के रूप में उदयित हो रहे भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इनका भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने गुटनिरपेक्ष देशों का मत नासर की ओर मोड़ने के लिए ख़ास परिश्रम किये।

इस घटना से नासर की लोकप्रियता कम होने के बजाय, पश्‍चिमी देशों के ग़ुरूर को गर्दन उठाकर जवाब देनेवाले इजिप्शियन नेता के रूप में कई गुना बढ़ गयी। इजिप्त को आंतर्राष्ट्रीय मंच पर महत्त्वपूर्ण स्थान दिला देनेवाला नासर यह १९५० के दशक में उदयित हुआ मध्यपूर्व का एक अहम नेता था।

इसीके साथ, गत कई सदियों से जागतिक महासत्ता के रूप में जाना जानेवाला ब्रिटन – जो विश्‍वयुद्ध में (स़िर्फ अमरीका उसके समर्थन में खड़ी थी उसके बलबूते पर) विजय प्राप्त करके भी खोख़ला हो चुका था और इसी कारण से उनके भारतसहित कई उपनिवेश गत कुछ वर्षों में स्वतंत्रता प्राप्त कर रहे थे; – उस ब्रिटन ने जागतिक मानांकन में अपना अव्वल स्थान गँवाया होने के वास्तव पर इस ‘सुएझ नहर’ घटना से मानो मुहर ही लगी। यह वास्तव ब्रिटन के मुँह पर इतने ज़ोर से आ धमका कि विनावजह इस सैनिकी विकल्प का इस्तेमाल किया होने के कारण ब्रिटीश प्रधानमंत्री एडन के खिलाफ़ ब्रिटन में तूफ़ानी जनमत खौल उठा, जिसके परिणास्वरूप आगे चलकर एडन ने इस्तीफ़ा दे दिया।
फ्रान्स की भी तब तक जो ‘बंद मुठ्ठी लाख की’ थी, वह खुल गयी और फ्रान्स भी अब कमज़ोर हुआ होने का वास्तव दुनिया के सामने आया।

१९४० के दशक के मध्य से ही शुरू हो चुका – साम्राज्यवादियों के उपनिवेशों को आज़ादी मिलने का यह ‘ट्रेन्ड’ १९५० के दशक में भी क़ायम रहा था और अफ्रिका-एशिया-मध्यपूर्व-लॅटिन अमरीका ऐसे कई महाद्वीपों में स्थित साम्राज्यवादियों के उपनिवेश प्रखरतापूर्वक आज़ादी के लिए लड़ाई कर आज़ाद हो रहे थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर जगह जनतांत्रिक समाजव्यवस्था स्थापित हुई; ब्रिटीश या फ्रेन्च के चंगुल में से आज़ाद होने के स्थित्यंतर के दौर में कई जगह गृहयुद्ध शुरू होकर, उस अफ़रातफ़री के माहौल में सशस्त्र विद्रोहियों ने सत्ता हासिल की और अगले कई साल उन देशों में लष्करशाहों की मज़बूत पकड़ होनेवालीं सत्ताएँ क़ायम रहीं।

सुएझ नहर प्रदेश से इन तीन देशों ने अपनी अपनी सेनाएँ पीछे ले लीं, इसका मतलब यह नहीं था कि उस क्रायसिस का हल निकला; दरअसल इस टँगे हुए प्रश्‍न में ही भविष्यकालीन संघर्ष के बीज बोये गए।

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सोव्हिएत नेता बुल्गॅनिन ने इस दौर में लिखे हुए ‘ख़ुफ़िया’ पत्रों में दर्ज़, ‘ब्रिटन-फ्रान्स-इस्रायल ने यदि निर्धारित कालावधि में इजिप्त में से सेनाएँ नहीं हटायीं, तो उनपर परमाणुअस्त्र दाग देने की योजना सोव्हिएत रशिया के पास तैयार है’, ऐसा ‘गोपनीय’ विवरण चुपके से प्रसारमाध्यमों में ‘लीक होगा’ इसकी व्यवस्था ख्रुश्‍चेव्ह ने की।

इस गड़बड़ी में सोव्हिएत्स का हंगेरी में चल रहा दमनतन्त्र कुछ समय तक दुर्लक्षित हुआ और उन्होंने पश्‍चिमी देशों को ‘साम्राज्यवादी आक्रमक’ संबोधित तक ताने देने का यह अच्छाख़ासा मौका हाथ से जाने नहीं दिया। साथ ही, प्रचारतंत्र के हिस्से के रूप में ख्रुश्‍चेव्ह ने – सोव्हिएत नेता बुल्गॅनिन ने इस दौर में लिखे हुए ‘ख़ुफ़िया’ पत्रों में लिखा हुआ, ‘ब्रिटन-फ्रान्स-इस्रायल ने यदि निर्धारित कालावधि में इजिप्त में से सेनाएँ नहीं हटायीं, तो उनपर परमाणुअस्त्र दाग देने की योजना सोव्हिएत रशिया के पास तैयार है’, ऐसा ‘गोपनीय’ विवरण चुपके से प्रसारमाध्यमों में ‘लीक होगा’ इसकी व्यवस्था की थी और ‘वह विवरण सच है’ ऐसा ही सभी लोग सोचने लगे थे। (दरअसल इस ‘ओपन सीक्रेट’ के कारण ही अगले सारे चक्र घुम गये और अमरीका ने युनो के ज़रिये और अन्य मंचों पर से डाले हुए दबाव के कारण, इन तीन देशों को हाथ मलते हुए चुपचाप बैठना पड़ा।)

इस घटना के बाद सोव्हिएत्स की अरब राष्ट्रों के साथ अधिक गाढ़ी दोस्ती हुई।

मुख्य बात, इस घटना से सोव्हिएत नेतृत्व को यह नया रहस्य उजागर हो गया कि इस तरह की आण्विक ‘धमकी’ से कई उलझे हुए काम सुलझ जाते हैं। उन्होंने यह तरक़ीब फिर आगे चलकर और भी कई प्रसंगों में इस्तेमाल की।

लेकिन मध्यपूर्व में घुसने जा रहे सोव्हिएत्स के अतिक्रमण के ख़ौफ़ से अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष आयसेनहोव्हर ने ‘आयसेनहोव्हर डॉक्ट्रिन’ अमरिकी काँग्रेस से फ़ौरन पास करवा लिया, जिसमें मध्यपूर्वी क्षेत्र के किसी भी देश ने अमरीका से मदद माँगने पर लष्करी विकल्प का इस्तेमाल करने के अधिकार अमरिकी अध्यक्ष के हाथ में दिये गए थे। उसीके साथ, मध्यपूर्वी क्षेत्र के किसी भी देश को सोव्हिएत प्रभाव में से बाहर निकालने के लिए ‘विकासकार्य हेतु’ २०० मिलियन डॉलर्स की अतिरिक्त निधि का प्रावधान किया गया था। यह प्रस्ताव अमरिकी काँग्रेस ने फ़ौरन ही पास किया, यह बताने की ज़रूरत नहीं!

लेकिन नासर ने राजकीय बुद्धिमानी दिखाकर किसी भी एक महासत्ता की बेड़ी में बँधा लेने के बजाय दोनों महासत्तों को झूलाने की नीति अपनायी। ‘आयसेनहॉवर डॉक्ट्रिन’ यह महज़ उस राष्ट्र को अपने शिकंजे में खींचने की अमरीका की चाल है, इस बात को वह पूरी तरह से पहचान गया था। इस कारण इसका प्रत्यक्ष फ़ायदा न उठाते हुए, वह बीच बीच में उसका उपयोग सोव्हिएत्स को अपनी मर्ज़ी के अनुसार झुकाने के लिए करता था। आगे चलकर कुछ साल बाद ‘आयसेनहॉवर डॉक्ट्रिन’ बंद हो जाने के बाद, सोव्हिएत्स के गुट में न जाते हुए, उसने सोव्हिएत्स को हमेशा चार हाथ दूरी पर ही रखा।

बाक़ी दुनिया में जिस तरह परतन्त्र राष्ट्र स्वतन्त्र हो रहे थे, वैसी ही घटनाएँ लॅटिन अमरीका में भी घटित हो रहीं थीं। ये घटनाएँ, यह ‘कोल्डवॉर’ का इसके बाद का अहम पड़ाव है।