समय की करवट (भाग ४१) – सोव्हिएत युनियन का उदयास्त-१

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

महज़ पौने शतक के अस्तित्व में ही वैश्‍विक महासत्ता के रूप में पहचाने जाने लगे इस सोव्हिएत रशिया का जन्म ही मूलतः कैसे हुआ? और श्रमजीवी वर्ग को अनुकूल विचारधारा होनेवाला यह देश अपनी मूल संकल्पना से दूर कैसे गया? वह हम संक्षेप में देखते हैं।

महासत्ता
बिखरी हुई रशियन झारशाही का एकसंध रशियन साम्राज्य में रूपांतरण करनेवाला झार ‘पीटर द ग्रेट’

अठारहवीं सदी से पहले बिखरे हुए होनेवाले रशियन झार के साम्राज्य को ‘पीटर द ग्रेट’ इस रशियन सम्राट ने सुनियंत्रित रूप में एकत्रित करके सन १७२१ में ‘रशियन साम्राज्य’ का निर्माण किया। इस झारशाही का आख़िरी सम्राट था ‘दूसरा निकोलस’। उन्नीसवीं सदी में युरोप में हुई औद्योगिक क्रांति अब बीसवीं सदी की शुरुआत में रशिया के दरवाज़ें खटखटाने लगी थी। रशियन झारशाही की संवेदनहीन नीतियों के खिलाफ़ आवाज़ें उठने लगी थीं और ‘श्रमजीवियों का एवं किसानों का राज हो’ ऐसी ‘समाजवादी’ माँग झार के साम्राज्य का त़ख्ता पलटने की तैयारी में थी।

महासत्ता
रशिया की झारशाही का आख़िरी झार – दूसरा निकोलस

इसके अलावा एक और भी घटना घटित हुई – सन १९०४-०५ के जापान विरोधी युद्ध में रशिया का पराजय हुआ। प्रचंड आकार के होनेवाले रशिया को नन्हें से, तब तक दुनिया की गिनती में भी न होनेवाले जापान ने युद्ध में अनपेक्षित रूप में धूल चटायी थी। मांचुरिया तथा कोरिया इन प्रदेशों पर किसका स्वामित्व है, इस बात को लेकर हुए विवाद में से यह युद्ध शुरू हुआ था। यह बीसवीं सदी का पहला महत्त्वपूर्ण युद्ध था, क्योंकि उससे आशिया का सत्तासंतुलन ढलनेवाला था। तब तक ना के बराबर क़ीमत दी जानेवाले जापान की ताकत का पुनर्मूल्यांकन करने पर राजनीतिक निरीक्षक मजबूर हुए और इस नन्हें से राष्ट्र का दुनिया के राजनीतिक मंच पर पदार्पण इसी युद्ध में मिली विजय के कारण हुआ।

इस पराजय के अलावा युरोप में हुई औद्योगिक क्रांति की हवाएँ रशिया में बहने लगीं थीं और अपर्याप्त वेतन मिल रही श्रमजीवी जनता को, और खेती की नीति में ‘हल जोतनेवाले की ज़मीन’ ऐसे सुधारों की उम्मीद होनेवाले ग़रीब किसानों को, सम्राट की ज़ुल्मी नीतियों के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाना आवश्यक प्रतीत होने लगा था।

उसके बाद इस रशिया-जापान युद्ध में हुए पराजय के कारण हुई बेइज़्ज़ती से झुलस रहे रशिया ने, आन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मिट्टी में मिल चुकी अपनी इज़्ज़त को थोड़ीबहुत ही सही, लेकिन पुनः प्राप्त करने के लिए; और ‘यदि अब कुछ भी नहीं कर दिखाया, तो श्रमजीवी वर्ग में अन्दरूनी बगावत होकर अपना साम्राज्य डाँवाडोल हो जायेगा’ इस डर के कारण, बिना किसी कारण के, सन १९१४ में ऑस्ट्रिया-हंगेरी-सर्बिया इन तीन छोटे से राष्ट्रों के विवाद में दख़लअन्दाज़ी की; जिसके समर्थन में ‘सर्बियन ये मूलतः रशियन ही हैं’ ऐसा बादरायण संबंध लगाया….
…और फिर विभिन्न समस्याओं से धिरे और अपने अपने घोड़े ही आगे दौड़ाने का मौक़ा ही देख रहे विभिन्न राष्ट्र उन तीनों में से किसी एक के पक्ष में उस विवाद में कूद पड़े और देखते देखते उस छोटी सी लड़ाई का रूपान्तरण विश्‍वयुद्ध में हो गया….पहला विश्‍वयुद्ध!

हालाँकि रशिया की मिट्टी में मिल चुकी इज़्ज़त को सँवारने की दृष्टि से सम्राट निकोलस ने रशिया को इस युद्ध में धकेला था, मग़र फिर भी उसका परिणाम उलटा ही हुआ। एक ही साल में इस युद्ध के कारण रशिया में अनाज की और ईंधन की कमी, महँगाई, बेरोज़गारी, भूखमरी ऐसी एक के बाद एक समस्याएँ नंगानाच करने लगीं। इसके अलावा, युद्ध में मारे जानेवाले रशियन युवाओं की संख्या बढ़ती ही जा रही थी।
परिणामस्वरूप असंतोष बढ़ने लगा।

पहली चिंगारी भड़की, सन १७३२ से लेकर रशियन साम्राज्य की राजधानी होनेवाले पीटर्सबर्ग में! सन १९१७ के मार्च में पीटर्सबर्ग में, रशियन साम्राज्य में पहले कभी सुनायी नहीं दिया, ऐसी हड़ताल हुई और देखते देखते एक हफ़्ते में उसका रूपान्तरण देशव्यापी हड़ताल में हुआ। हड़ताल, प्रदर्शन, सभाएँ इनके परिणामस्वरूप, पहले से ही युद्ध के कारण हैरान हो चुकी सरकार ने आख़िर हार मान ली और सन १९१७ में ‘अस्थायी सरकार’ की स्थापना करने के लिए रशियन ड्युमा (सम्राट की कार्यकक्षा में होनेवाला विधिमंडल) ने मान्यता दी।

उसी दौरान पीटर्सबर्ग स्थित समाजवादी विचारधारा के लोगों ने श्रमजीवी एवं किसानों के प्रतिनिधियों का एक मंडल – ‘सोव्हिएत’ (सोव्हिएत=मंडल) की स्थापना की थी, जो अस्थायी सरकार के साथ काम करनेवाला था।

अब अपनी सारी समस्याएँ दूर हुईं हैं, ऐसा सोचनेवाले निकोलस की खुशी थोड़ी देर ही टिक सकी।

क्योंकि उसके बाद शुरू हुए रशियन सिविल वॉर ने रशियन साम्राज्य के सभी सत्तासमीकरण उथलपुथल कर दिये।

इसी रशियन सिविल वॉर के दौरान रशियन राज्यक्रांति हुई!