समय की करवट (भाग ६३) – ….और सुएज़ नहर जलने लगी!

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-२३

जिस समय पूर्वी एशिया में ‘कोल्ड वॉर’ का कोरियन युद्ध का नाट्य रंग ला रहा था, उस समय मध्यपूर्व में ‘कोल्ड वॉर’ के अगले एपिसोड़ की तैयारियाँ जारी थीं। कोरियन युद्ध के ख़त्म होने के बाद जब हंगेरी में सोव्हिएतपरस्त कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ़ बग़ावत हुई, उसी दौरान यानी सन १९५६ में ‘कोल्ड वॉर’ का यह एपिसोड़ शुरू हुआ – इजिप्त में ‘सुएज़ नहर’ जलने लगी!

एक तरफ़ इजिप्त, तो दूसरी तरफ़ ब्रिटन, फ्रान्स तथा इस्राएल (और अमरीका एवं सोव्हिएत रशिया स्वाभाविक रूप में परदे के पीछे से कठपुतलियाँ नचानेवाले) ऐसा यह मुक़ाबला था।

अब इन सब बातों का ‘कोल्ड वॉर’ से क्या संबंध है? तो इजिप्त सोव्हिएत रशिया की ओर मुड़ रहा है ऐसा अमरीका को यक़ीन होता जा रहा था और इसलिए इजिप्त उसकी ‘ब्लॅकलिस्ट’ में था!

इसकी पूर्वपीठिका देखने के लिए हमें थोड़ा सा अतीत में झाँकना पड़ेगा। इजिप्त पर सन १८८२ से ब्रिटिशों की सत्ता थी। लेकिन ब्रिटिशों की साम्राज्यवादी तानाशाही को धीरे धीरे वहाँ के लोग ऊब गये और उन्होंने भी भारत की तरह ही ब्रिटिशों के साथ स्वतन्त्रतासंग्राम किया। उसे सन १९५२ में सफलता मिली। सन १९५२ की इजिप्त क्रान्ति के बाद इजिप्त ब्रिटन के चंगुल से आज़ाद हो गया।

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ब्रिटीश चंगुल से इजिप्त को आज़ाद करनेवाले इजिप्त के राष्ट्राध्यक्ष गमाल नासर

स्वतन्त्र इजिप्त के पहले राष्ट्राध्यक्ष के रूप में जनरल मुहम्मद नजीब को चुना गया। लेकिन चार ही सालों में इजिप्त में पुनः बग़ावत होकर सन १९५२ की इजिप्त क्रान्ति का असली सूत्रधार गमाल नासर, नजीब को पदच्युत कर जून १९५६ में खुद राष्ट्राध्यक्ष बना। राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत भरे हुए इस नेता ने सत्ता की बागडोर सँभालते ही इजिप्त को ब्रिटीश प्रभाव में से बाहर निकालने के प्रयास शुरू किये। तब तक इजिप्त ब्रिटीश नियंत्रण में होने के कारण सुएज़ नहर पर भी ब्रिटिशों का ही नियंत्रण था। तय किये हुए समझौते के अनुसार ब्रिटिशों ने सन १९५६ के जून महीने के मध्य तक सुएझ नहर पर का अपना कब्ज़ा हटाकर वहाँ होनेवाली अपनी सेना को वापस बुला लिया।

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सुएज़ नहर की अन्तरीक्ष में से खींची तस्वीर
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सुएज़ नहर की अन्तरीक्ष में से खींची तस्वीर

वैसे देखा जाये, तो इस स्थान पर छोटी-मोटी नहरें खोदने के प्रयास इसवीसन की दूसरी सदी से ही उस उस समय की राजसत्ताओं ने किये थे। लेकिन भूमध्य समुद्र (मेडिटेरियन सी) और लाल समुद्र (रेड़ सी) इन्हें जोड़नेवाली इस सुएझ नहर का निर्माण, उसके इस आधुनिक स्वरूप में सन १८६९ में किया गया। निर्माण होने की तारीख़ से आज तक यह नहर हमेशा चर्चा में रही है। यह बनने से पहले, युरोप में से एशिया में व्यापार करने आनेवाले जहाज़ों को दक्षिण अफ्रिका की दक्षिण नोंक होनेवाले ‘केप ऑफ गुड होप’ शहर को हज़ारों मीलों का चक्कर लगाकर आना पड़ता था। यह हज़ारों मील का चक्कर इस नहर के कारण बच रहा होने के कारण, इस नहर को आन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व प्राप्त हुआ था। इस नहर के इस आन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व को पहचानकर ब्रिटिशों ने इसवीसन १९५० के दशक की शुरुआत में इस नहर पर का नियंत्रण क़ायम रखने के लिए लगभग ८० हज़ार सेना वहाँ लाकर तैनात की थी।

इजिप्त पर की ब्रिटिशों की सत्ता हटने के बाद समझौते के अनुसार उन्हें सुएझ पर के अपने नियंत्रण को भी हटाना पड़ा।

उसी दौरान बार बार बाढ़ आनेवाली, इजिप्त की नाईल नदी पर आस्वान बाँध बाँधने की योजना बन रही थी और अमरीका एवं ब्रिटन ने उसे आर्थिक सहायता देने का अभिवचन दिया था। लेकिन ब्रिटन, नासर को पदच्युत करके पुराना हिसाब चुकता करना चाहता था और वह मौक़ा ढूँढ़ रहा था।

लेकिन इसी बीच नासर ने सोव्हिएत रशिया के साथ इजिप्त के राजनैतिक संबंध स्थापित करने की कोशिशें शुरू की थीं और उसके लिए उसने, तब तक भड़क चुके चीन-तैवान संघर्ष में चीन को मान्यता दी। (माओ ने पदच्युत किये चीन के राष्ट्राध्यक्ष चँग-कै-शेक ने तैवान में पनाह ली होने के कारण यह चीन-तैवान संघर्ष अधिक भड़का था।)

इजिप्त सोव्हिएत के पक्ष में जा रहा है, यह देखने पर अमरीका और ब्रिटन ने अपनी – बाँध के निर्माण के लिए अर्थसहायता करने की जो ‘ऑफर’ दी थी, उसे पीछे ले लिया। ब्रिटन पहले से ही, पुराना हिसाब चुकता करने के लिए नासर के पीछे हाथ धोकर पड़ा था, लेकिन अमरीका ने फिलहाल ब्रिटन को रोके रखा था। लेकिन अब नासर यह सोव्हिएतपरस्त कदम उठाने के कारण अमरीका ने भी इस अर्थसहायता को रोक दिया। अमरीका की यह सोच थी कि अब नासर सोव्हिएत के पास अर्थसहायता की माँग करेगा और इतने बड़े स्केल पर होनेवाले प्रोजेक्ट को अर्थसहायता करने जितनी सोव्हिएत की क्षमता न होने के कारण अपने आप ही नासर-सोव्हिएत संबंध बिगड़ जायेंगे।

लेकिन हुआ उल्टा ही! अमरीका की इस चाल से खौल उठे नासर ने २६ जुलाई १९५६ को यह घोषणा की कि वह सुएज़ नहर का राष्ट्रीयीकरण कर रहा है।

….और सुएझ नहर जलने लगी!