समय की करवट (भाग ५५) – (कु)बुद्धिबल

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

‘दूसरा विश्‍वयुद्ध समाप्त हुआ और मानव शांति में रहने लगा….’

यह हुआ सर्वसाधारण कहानियों (स्टोरीज्) का अन्त….

….लेकिन प्रत्यक्ष रूप में यह होना नहीं था, क्योंकि ‘शीतयुद्ध’ – ‘कोल्ड वॉर’ जो शुरू हो चुका था – अमरीका एवं सोव्हिएत रशिया इन दो जागतिक महासत्ताओं के बीच।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान काफ़ी ताक़त खर्च हो चुके ब्रिटन ने, विश्‍वयुद्ध के बाद दुनिया में होनेवाला अपना अव्वल स्थान खो दिया था और विश्‍वयुद्ध के पश्‍चात्, दुनिया की ‘डि-फॅक्टो’ अव्वल नंबर की सत्ता के रूप में अमरीका का उदय हो चुका था। अपने इस स्थान का इस्तेमाल कर दुनियाभर में मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने का पूँजीवादी अमरीका का इरादा था। उसके इस इरादे के आड़े कम्युनिस्ट सोव्हिएत रशिया आ रहा था; वहीं, ‘श्रमिकों की सत्ता’ यह ध्येय होनेवाले सोव्हिएत रशिया को अमरीका एवं अन्य पश्‍चिमी देशों की पूँजीवादी नीति ही मंज़ूर नहीं थी।

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एकदूसरे को मात देने की कोशिश में अमरीका एवं सोव्हिएत रशिया ने दुनिया को कई बार नये विश्‍वयुद्ध की दहलीज़ पर लाकर खड़ा किया।

फिर अगले पैंतालीस सालों में ये दो महासत्ताएँ एक-दूसरे को मात देने की कोशिशों में कई बार दुनिया को तीसरे विश्‍वयुद्ध की कगार पर ले गयीं….लेकिन प्रत्यक्ष युद्ध होने नहीं दिया, क्योंकि दोनों के पास भी परमाणु अस्त्र होने के कारण, यदि एक उसका इस्तेमाल करता है, तो दूसरा भी करेगा और फिर इस जानलेवा प्रतिस्पर्धा में दुनिया का विनाश हो जायेगा, यह अक़्लमंदी दोनों के भी पास थी। लेकिन फिर भी दोनों ने भी अपने (कु)बुद्धिबल के द्वारा एक-दूसरे को परेशान करके शीतयुद्ध की दाहकता को क़ायम रखा था – फिर चाहे वह अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष ट्रुमन द्वारा प्रतिपादित ‘मार्शल प्लॅन’ हों (इस प्लॅन का घोषित हेतु – महायुद्ध की आग में झुलस रहे राष्ट्रों को सहायता का हाथ; लेकिनअंतस्थ हेतु – ये राष्ट्र सोव्हिएत के प्रभाव में न आयें यह था) या फिर सोव्हिएत रशिया द्वारा पूर्व जर्मनी एवं बर्लिन को पश्‍चिमियों के प्रभाव में से खींचकर लाने के लिए खेली गयी ‘बर्लिन ब्लॉकेड’ की चाल हों….हर बार कभी इस तरफ़ से, तो कभी उस तरफ़ से सारी दुनिया को दाँव पर लगाया गया।

दोनो पक्ष तुल्यबल थे; दरअसल विरुद्ध पक्ष की संपूर्ण ताकत का निश्‍चित अन्दाज़ा न होना और इस कारण अपनी ताकत को लगातार बढ़ाते रहना, यह एक ही बात दोनों पक्ष अविरत कर रहे थे। इसी कारण अमरीका के पीछे पीछे सोव्हिएत रशिया ने भी अपना परमाणुकार्यक्रम विकसित करने का कदम उठाया। क्योंकि इतना महाभयानक अस्त्र जिसके हाथ में होगा, ‘वह’ ज़ाहिर है, दुनिया पर राज करनेवाला था और वह ‘वह’ अमरीका हों यह बात सोव्हिएत रशिया को तात्त्विकदृष्टि से भी बन पानेवाली नहीं थी। पूँजीवाद का मानो मूर्तरूप ही होनेवाली अमरीका के पास दुनिया की बागड़ोर न जायें, इसलिए अमरीका को मात देने के पीछे सोव्हिएत लग गये।

लेकिन अमरीका ऐसा कुछ महासंहारक अस्त्र बनाने के पीछे पड़ी है, यह ख़बर रशियन गुप्तचरों ने दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान ही खोज निकाली थी। पश्‍चिमी एवं अमरिकी जर्नल्स में अणुकार्यक्रमों के बारे में, तब तक भरभरकर छपकर आनेवाली जानकारी अचानक बंद हो गयी है, ऐसा १९४० के दशक की शुरुआत में ही रशियन भौतिकशास्त्र संशोधक ‘जॉजी फ्लायोरोव्ह’ के ध्यान में आया और उसने स्टॅलिन को इस बारे में आगाह किया – वैज्ञानिक जर्नल्स में उस बारे में जानकारी छपकर नहीं आ रही है इसका मतलब, अब इस क्षेत्र को अमरीका ने ‘संवेदनशील’ इस श्रेणि में डाला था; अर्थात् वहाँ का संशोधन बहुत ही प्रगतिशील पड़ाव पर आ पहुँचा था।

तब तक गुप्तचरों के ज़रिये अमरीका के परमाणुकार्यक्रम के बारे में ‘ताज़ा’ ख़बर रखनेवाले स्टॅलिन ने तुरन्त ही हवा की दिशा को पहचानकर रशियन परमाणुकार्यक्रम तेज़ करने का निर्णय लिया। उसने शुरू में अपना एकछत्री अमल स्थापित होने के लिए विकसित की रशियन गुप्तचरयंत्रणा तब तक काफ़ी माहिर बन चुकी थी। उसे अब इस क्षेत्र में काम पर लगाया गया। उन्होंने अपना काम अचूकतापूर्वक किया और अमरिकी एवं पश्‍चिमी परमाणुकार्यक्रम के बारे में गोपनीय जानकारी प्राप्त करने में वे क़ामयाब हो गये। इतना ही नहीं, बल्कि आगे चलकर भविष्यकालीन रशियन परमाणुप्रकल्पों का आरेखन भी, रशियन गुप्तचरों ने हासिल किये अमरिकी परमाणुप्रकल्पों के एवं जर्मन परमाणुकार्यक्रम के आरेखनों पर आधारित था, ऐसी जानकारी आगे चलकर सोव्हिएत रशिया के विघटन के बाद ज़ाहिर हुई थी।

सोव्हिएत रशिया ने अपना पहला परमाणुपरीक्षण सन १९४९ में सफल रूप में कराया और वह अमरीका के पीछे पीछे दूसरी ‘आण्विक महासत्ता’ बन गया।

तब तक देशांतर्गत स्टॅलिन का स्थान मज़बूत बन चुका था और दूसरे विश्‍वयुद्ध में नाझियों के विरुद्ध विजय प्राप्त करने के कारण और पश्‍चिमियों को मात दे सकनेवाले औद्योगिकीकरण के कार्यक्रम के कारण स्टॅलिन सोव्हिएत रशिया की नयी पीढ़ी के लिए एकदम ‘देवता के समान हीरो’ बन चुकी था। लेकिन इसके पीछे सफल सोव्हिएत प्रचारतंत्र का भी अहम हिस्सा था ही।

लेकिन सोव्हिएत जनता को भले ही स्टॅलिन ‘ईश्‍वर के समान’ प्रतीत हुआ हो, वह ईश्‍वर तो यक़ीनन ही नहीं था। उसने भी बूढ़ापे में प्रवेश कर ही दिया था।

५ मार्च १९५३ को स्टॅलिन की मृत्यु हुई।

क्या अब तो यह ‘कोल्ड वॉर’ ख़त्म हुआ?

हरगिज़ नहीं। उल्टा विज्ञान-तंत्रज्ञान की प्रगति के कारण वह अधिक से अधिक भयानक बनता गया। कैसे?