समय की करवट (भाग ६८) – क्युबा

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-२८

सुएज़ नहर का क्रायसिस टल जाने तक दुनिया के अन्य भागों में भी यह पूँजीवाद-कम्युनिझम विवाद (अर्थात् ‘कोल्ड वॉर’) चरमसीमा तक पहुँचा था। कोल्ड वॉर अपनीं नयीं नयीं शेड्स दिखा रहा था। दोनों पक्ष अपने अपने सामर्थ्य को – यहाँ तक कि परमाणुअस्त्रों को भी – चुपचाप बढ़ा रहे थे; लेकिन ज़ाहिर रूप में परमाणुअस्त्रबंदी (न्यूक्लिअर डिसआर्मामेंट) के बारे में (अर्थात् खुद को छोड़कर अन्य सभी के लिए) आग्रही हो रहे थे, कभी सामोपचार से, तो कभी हाथ मरोड़कर!

लेकिन सोव्हिएत रशिया को धीरे धीरे अलग ही संकट का मुक़ाबला करना पड़नेवाला था। कम्युनिझम शासनप्रणाली का अंगिकार किये हुए चीन ने १९५० के दशक से ही सोव्हिएत रशिया से दूर जाने की शुरुआत की थी। उसके परिणाम दिखायी देने में बहुत समय लगा।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के अन्य में विभाजन हुए सोव्हिएतनियंत्रित पूर्व जर्मनी और दोस्तराष्ट्रनियंत्रित पश्चिम जर्मनी इनके बीच भी उनकी शासनप्रणालियों में रहनेवाले भेदों के कारण संघर्ष की आग भड़क जायेगी ऐसा माहौल तयार हुआ था। पूर्व जर्मनी के सोव्हिएतपरस्त ज़ुल्मी कम्युनिस्ट शासन से ऊबकर कई लोग पूर्व जर्मनी का त्याग कर, जो भी उपलब्ध हुआ उस ज़ाहिर या गोपनीय मार्ग से पश्‍चिमी देशों में पलायन करने लगे थे। इनमें विभिन्न क्षेत्रों के माहिर तंत्रज्ञों का भी समावेश था। उसका अंजाम ‘ब्रेन-ड्रेन’ में होने लगा। यह ध्यान में आ जाते ही सन १९६१ में ख्रुश्‍चेव्ह ने पूर्व जर्मनी के कब्ज़े में होनेवाले पूर्व बर्लिन के चहुँ ओर ऊँची प्रतिरोधक दीवार बाँधने का आदेश दिया। यही थी वह बर्लिन वॉल, जिसका अध्ययन हमने इससे पहले किया है। यह कुविख्यात बर्लिन वॉल ‘कम्युनिझम-पूँजीवाद’ इन शासनप्रणालियों के बीच के विवाद का जीवित प्रतीक ही माना गया। ‘कोल्ड वॉर’ विषय पर बनाये गए हर हॉलिवुड-सिनेमा में इसे दिखाया जाता ही था। सोव्हिएत युनियन अस्तित्व में होने तक तो यह ‘भाई-भाई के बीच की दीवार’ ढ़ह न सकी।

लेकिन सुएज़ क्रायसिस पश्‍चात् के समय में, तब तक ‘कोल्डवॉर’ में झुलसनेवाली दुनिया को कहीं परमाणुयुद्ध के प्रत्यक्ष धमाके तक ले तो नहीं जायेगा ऐसा डर लगनेवाला जो क्रायसिस माना गया, वह था – लॅटिन अमरिकी देश क्युबा में हुआ ‘मिसाईल क्रायसिस’!

इस क्रायसिस का अध्ययन करने से पहले अमरीका और क्युबा के पारंपरिक नातेसंबंधों के बारे में जान लेना आवश्यक है।

क्रिस्तोफर कोलंबस

पंद्रहवीं सदी में युरोप के ब्रिटीश, फ्रेंच, स्पॅनिश आदि विभिन्न साम्राज्यों की चल रही सत्तास्पर्धा में, अन्य साम्राज्यों पर हावी होने के उद्देश्य से स्पेन के राजा ने दर्यावर्दी कोलंबस की – अटलांटिक समुद्र पार जाकर ‘नयी दुनिया’ खोजने की कल्पना को समर्थन दिया और उसकी सफ़र के लिए भरपूर अर्थसहायता भी की। एशिया के आकर्षक मसालों के कारोबार पर उसकी नज़र थी। लेकिन उसी समय युरोप से एशिया तक आने के प्रस्थापित मार्गों पर अशान्ति निर्माण होने के कारण कोलंबस के मन में नयी कल्पना मँड़राने लगी और वह थी – पश्चिम दिशा में यदि अटलांटिक समुद्र में सफ़र की जाये, तो दूसरी और से एशिया में (जापान में) पहुँचा जा सकता है। उस समय तक अमरीका के बारे में युरोपियन नहीं जानते थे।

पूर्व दिशा की दुनिया को पश्‍चिम की ओर से खोजने चला कोलंबस जापान के बदले जा पहुँचा क्युबा के एक द्वीप पर। उसने तुरन्त ही उस द्वीप को ‘स्पॅनिश उपनिवेश’ घोषित किया। तब से क्युबा यह स्पॅनिश उपनिवेश बन गया। आगे चलकर १९वीं सदी के अन्त तक दुनिया के कई प्रदेशों में, स्थापित सत्ताओं के खिलाफ़ स्वतंत्रतासंग्राम शुरू हुए थे, वैसा ही स्वतंत्रतासंग्राम क्युबा में भी शुरू हुआ। उसे ज़ुल्म से कुचल देने की कोशिश स्पॅनिश सत्ता ने समय समय पर की। अमरीका की भूमि पर अपने अपने साम्राज्यों का विस्तार करनेवाले युरोपीय देशों के प्रति अमरीका ने १९वीं सदी के पूर्वार्ध से ही कड़ा रूख़ अपनाया था। उसीमें, क्युबा में चल रहे इस स्पॅनिश दमनतन्त्र के खिलाफ़ अमरीका में जनमत खौल उठा था। उसीके साथ, क्युबा की शुगर फॅक्टरियों में निवेश किये हुए अमरिकी उद्योगपती भी क्युबा में शान्ति चाहते थे; यदि संभव हों, तो क्युबा अमरिकी उपनिवेश बनें, ऐसा भी वे चाहते थे।

उसका दबाव अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष पर पड़ा और उन्होंने सन १८९८ में, क्युबा में निवास कर रहे अमरिकी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने के बहाने, अत्याधुनिक शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित ऐसा एक अमरिकी लड़ा़कू जहाज़ क्युबा के क़िनारे पर लाकर रख दिया। स्पॅनिश सरकार को यह अपने अन्दरूनी मामलों में अमरीका की दख़लअन्दाज़ी प्रतीत हुई और उन्होंने वह जहाज़ डुबा दिया। तब अमरीका ने स्पेन को कड़ी चेतावनी देते हुए क्युबा प्रदेश अपने हवाले करने के लिए कहा। स्पेन ने स्वाभाविक रूप से इन्कार कर, अमरीका के खिलाफ़ युद्ध का ऐलान किया। इस घमासान युद्ध में स्पेन की पराजय होकर समझौता हुआ। इस समझौते में, ज़ाहिर है, जेता अमरीका का पलड़ा भारी था। इस समझौते के अनुसार स्पेन ने क्युबा यह प्रदेश अमरीका के हवाले कर दिया। इस समझौते में स्पेन को क्युबा के साथ साथ, दुनिया के अन्य भागों में फैले स्पेन के साम्राज्य में होनेवाले पोर्टोरिको, ग्वाम और फिलिपाईन्स ये प्रदेश भी महज़ २ करोड़ डॉलर्स के बदले अमरीका के हवाले करने पड़े।

इस प्रकार क्युबा पर अमरीका का नियंत्रण स्थापित हुआ। आगे चलकर सन १९०१ में अमरीका के राष्ट्राध्यक्ष बने थिओडोर रूझवेल्ट को क्युबा के इन स्वतन्त्रतासैनिकों के प्रति हमदर्दी थी। उन्होंने सन १९०२ में क्युबा को मर्यादित स्वतन्त्रता देने की घोषणा की। ‘मर्यादित’ कहने का कारण, क्युबा हालाँकि सार्वभौम देश हुआ था, उसके आर्थिक क्षेत्र में और विदेशसंबंधों में अमरीका कभी भी हस्तक्षेप कर सकती है, ऐसा प्रावधान क्युबा के संविधान में ही रखा गया था।

क्युबा स्वतंत्र तो हुआ, लेकिन उसके बाद कई खुदगर्ज़ तानाशाहों ने, क्रान्ति के नाम पर, उनसे पहले होनेवाले तानाशाहों की सत्ताओं का त़ख्ता पलटते हुए, एक के बाद एक क्युबा पर पुनः पुनः तानाशाही ही थोंप दी। ये सारे तानाशाह, ज़ाहिर है अमरीकापरस्त थे और अमरीका के आशीर्वाद पर ही अपनी सत्ता बरक़रार रखते थे। यह सिलसिला सन १९५० तक चालू था।

आगे क्या हुआ?