समय की करवट (भाग ५४) – ‘कोल्ड़ वॉर’ – पूर्वपीठिका

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

‘कोल्ड वॉर’….

जिस प्रकार शीतगृह में – कोल्ड स्टोरेज में पदार्थ टिकने के लिए उन्हें ठण्डी एवं बन्द स्थिति में रखा जाता है; संक्षेप में, शीतगृह में रखा गया पदार्थ अधिक समय तक टिकें इसलिए सभी प्रकार का पोषक वातावरण निर्माण किया जाता है….

उसी प्रकार इस ‘कोल्ड वॉर’ के बारे में हुआ।

आधुनिक ज्ञात इतिहास के सबसे भयंकर ऐसे पहले दो विश्‍वयुद्धों में झुलसकर निकली दुनिया ज़रासी चैन की साँस ले रही थी कि तभी शुरू हुआ – दुनिया की पहले नंबर की दो महासत्ताओं के बीच का शीतयुद्ध – शीतगृह में रखे पदार्थ की तरह तापमान बहुत ही कम होनेवाला, यानी ऊपरि तौर पर देखनेवाले को युद्ध की दाहकता का अँदाज़ा भी नहीं आ सकता था, मग़र फिर भी वह जारी था। और मुख्य रूप में, शीतगृह में जिस तरह पदार्थ अधिक समय तक टिकते हैं, वैसा प्रदीर्घ कालावधि तक यानी तक़रीबन चार दशकों से भी अधिक समय तक खेला गया।

हालाँकि प्रत्यक्ष युद्ध नहीं खेला गया, मग़र फिर भी पहले दो विश्‍वयुद्धों से भी भयंकर माना गया ऐसा यह कोल्ड वॉर दरअसल था क्या?

समय की करवट, अध्ययन, युरोपीय महासंघ, विघटन की प्रक्रिया, महासत्ता, युरोप, भारत‘कोल्ड वॉर’ इस संज्ञा को सबसे पहले इस्तेमाल किया, वह विख्यात ब्रिटीश लेखक एवं पत्रकार जॉर्ज ऑरवेल ने, अक्तूबर १९४५ में लिखे अपने एक निबंध में! लेकिन यह निबंध लिखते समय ऑरवेल के मन में सोव्हिएत रशिया का विचार भी नहीं था। उसने इस निबंध में परमाणुबम जैसे महासंहारक शस्त्र की खोज हो चुकी दुनिया का भविष्यकालीन वर्णन शब्दांकित किया था। अब इसके आगे इस दुनिया में प्रत्यक्ष युद्ध हों या न हों, सारी दुनिया इस युद्ध के भय की छाया में ही रहेगी, यह अधोरेखित करते हुए उसने इस ‘कोल्ड वॉर’ संज्ञा का इस्तेमाल किया था।

‘परमाणुबम’ इस अस्त्र का जापान के खिलाफ़ इस्तेमाल कर जब अमरिका ने निर्णायक रूप में दक्षिण-पूर्व एशिया के विश्‍वयुद्ध को समेत लिया, तब एक महाभयानक, संपूर्ण मानवजाति का पूरी तरह निःपात करने की क्षमता होनेवाला हथियार ही मानव के हाथ लग गया है, इसपर दुनिया के लगभग सभी विचारवंतों का एकमत हुआ। ‘यू अँड अ‍ॅटमबाँब’ इस नाम से प्रकाशित हुए ऑरवेल के इस निबंध में ऐसा प्रतिपादित किया गया था कि प्रत्यक्ष युद्ध जितना ही, युद्ध की संभाव्यता का – ‘कोल्ड वॉर’ का ख़ौफ़ दुनिया को घेरे रखेगा। लेकिन उसमें कहीं पर भी, बाद में अमरिका-रशिया के बीच के, टूटने की कगार पर आये प्रक्षोभक राजनीतिक एवं लष्करी संबंधों को ‘कोल्ड वॉर’ ऐसी जो संज्ञा प्रचलित हुई, उस अर्थ से इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था।

लेकिन ऑरवेल के निबंध में जिस आशय से ‘कोल्ड वॉर’ इस शब्द का इस्तेमाल किया गया था, वैसी ही – युद्ध के ख़ौफ़ की छाया में दुनिया’ ऐसी परिस्थिति विश्‍वयुद्ध के पश्‍चात् के दौर में दुनिया में निर्माण हुई थी, यह बात सच है।

इन दो महाबलाढ्य राष्ट्रों के बीच के ‘कोल्ड वॉर’ की शुरुआत सन १९४५ में ख़त्म हुए दूसरे विश्‍वयुद्ध के पश्‍चात् तुरन्त ही हुई, यह मत ऐसा मत अधिकांश सर्वमान्य होने के बावजूद भी, सन १९१७ की रशियन राज्यक्रांति के बाद अस्तित्व में आये सोव्हिएत रशिया के जन्म के साथ ही यह ‘कोल्ड वॉर’ शुरू हुआ, ऐसा माननेवाला भी एक बहुत बड़ा वर्ग अभ्यासकों में है।

उस दौर में औद्योगिक क्रांति के फल चख रहे और जिसमे श्रमिकों को कुछ ख़ास क़ीमत न होनेवाली पूँजीवादी समाजव्यवस्था का अंगिकार कर रहे पश्चिमी देश रशियन राज्यक्रांति की ओर और सोव्हिएत रशिया के जन्म की ओर कुछ बेचैनी से ही देख रहे थे। ‘श्रमिकों की सरकार’ यह संकल्पना ही मूलतः ही उन्हें रास आनेवाली नहीं थी; क्योंकि यह संकल्पना, पूँजीवाद का मानो प्राण ही होनेवाले ‘मुनाफ़ा’, ‘मुक्त व्यापार’ आदि तत्त्वों को ही ध्वस्त करनवाली साबित होगी, यह डर इन राष्ट्रों को लगने लगा था। इस कारण सोव्हिएत रशिया के जन्म से ही वह अकेला पड़ता गया। लेनिन हमेशा यह शिक़ायत करता था कि सोव्हिएत रशिया चारों ओर से पश्चिमी पूँजीवादी देशों से घिरा हुआ है और इस पूँजीवाद के खिलाफ़ सोव्हिएत रशिया को सुरक्षित रखने की दृष्टि से उसने, कम्युनिस्ट शासनप्रणाली मान्य होनेवाले और सोव्हिएत रशिया के इशारों पर नाचनेवाले राष्ट्रों के ‘कॉमइन्टर्न’ जैसे आन्तर्राष्ट्रीय संगठन का निर्माण किया। कम्युनिझम को पूँजीवाद की घिन होने की बात जगज़ाहीर होने के कारण, पश्चिमी देश हमें उनके बीच स्थान नहीं देंगे, यह बात सोव्हिएत नेता जानते थे और इस कारण उन्होंने इस बात पर ख़ास ध्यान दिया कि रशिया पश्चिमी देशों पर निर्भर न रहते हुए सर्वसमर्थ कैसा होगा।

आगे चलकर देशांतर्गत विरोध को कुचल देकर स्टॅलिन का एकछत्री अंमल स्थापन हो जाने के बाद, उसने औद्योगिक उत्पादन और सेनाभर्ती पर और शस्त्रास्त्रविकास पर ही ज़ोर दिया, उसका यही कारण था। अर्थात् यह ‘कोल्ड वॉर’ दरअसल वहीं से शुरू हुआ था, ऐसा कहा जाये, तो वह ग़लत नहीं होगा।

यह थी ‘कोल्ड वॉर’ की पूर्वपीठिका। शुरुआती दौर में सोव्हिएत रशिया और पश्चिमी देश इनके बीच के परस्पर-शक्की वातावरण के चलते एक-दूसरे को मात देने के लिए दोनों पक्षों द्वारा जो चालें-प्रतिचालें खेलीं गयीं, उसमें अंतिम चाल चली गयी, दूसरा विश्‍वयुद्ध ख़त्म करने के लिए अमरिका ने जिस ‘परमाणुबम’ शस्त्र का इस्तेमाल किया, उसके कारण। इस घटना के कारण स्टॅलिन के दिल में अमरिका के बारे में अविश्‍वास की भावना एवं असुरक्षितता की भावना चरमसीमा तक पहुँची….पूरी दुनिया के गले में फाँसी का फंदा डालनेवाले ‘कोल्ड वॉर’ में रूपांतरित होकर!