समय की करवट (भाग ५७) – प्रॉक्सी वॉर्स

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

पूँजीवाद एवं कम्युनिझम इनके बीच के ‘तात्त्विक’ ‘मतभेदों में से’ निर्माण हुआ ‘कोल्ड वॉर’ धीरे धीरे गरम होने लगा था – लेकिन प्रत्यक्ष रूप में नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप में – ‘प्रॉक्सी वॉर्स’ के….‘लड़ाये गये’ युद्धों के रूप में!

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‘कोल्ड वॉर’ में हालाँकि प्रत्यक्ष युद्ध लड़ा नहीं गया, युद्ध ‘लड़ाये’ ज़रूर गये। (‘प्रॉक्सी वॉर्स’)

कोल्डवॉर के सिलसिले में कुछ बातें (उदा. ‘ईस्टर्न ब्लॉक’, ‘मार्शल प्लॅन’, ‘बर्लिन ब्लॉकेड’ आदि) हमने स्वतन्त्र रूप में इस लेखमाला में देखी ही हैं। लेकिन वे स्वतन्त्र बातें न होकर दीर्घ समय तक चल रहे कोल्ड वॉर का ही एक हिस्सा होने के कारण, अब कोल्ड वॉर के संदर्भ से उन्हें ज़रा याद करना आवश्यक है।

दूसरा विश्‍वयुद्ध ख़त्म होते होते ही सोव्हिएत रशिया ने अपनी सीमारेखाओं से सटे राष्ट्रों को ‘सोव्हिएत सोशालिस्ट रिपब्लिक्स’ इस श्रेणि के तहत सोव्हिएत रशिया में समाविष्ट करने की शुरुआत कर ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ का निर्माण किया। उसके लिए उन्होंने मूलतः – सन १९३९ में हिटलर की जर्मनी के साथ अनाक्रमण का समझौता करते समय युरोप का बँटवारा जिस प्रकार निर्धारित किया था, उसका आधार लिया। इस संपूर्ण ’ईस्टर्न ब्लॉक’ के देशों में कम्युनिस्ट राज्यप्रणाली लागू करके सोव्हिएत रशिया के इशारों पर नाचनेवालीं कम्युनिस्ट सरकारें स्थापित करने की स्टॅलिन की चाल थी। इन देशों की कार्यपद्धति हूबहू सोव्हिएत रशिया जैसी ही स्टॅलिन चाहता था; ज़ाहिर है, कम्युनिझमविरोधी आवाज़ें बन्द करने के लिए, कम्युनिस्टविरोधकों का दमन करने के लिए उसने रशिया की तरह ही इन देशों में भी गोपनीय पुलीस यंत्रणा का निर्माण किया।

सोव्हिएत रशिया ने निर्णायक रूप में जर्मनी को हराकर विश्‍वयुद्ध जीता देने के कारण, जागतिक मंच पर सोव्हिएत रशिया का स्थान बहुत ऊपर पहुँच गया था। इस कारण अमरीका तथा ब्रिटन ने भी स्टॅलिन का कुछ ख़ास विरोध नहीं किया। लेकिन अब अमरीका एवं ब्रिटन को ऊर्वरित युरोप को लेकर चिन्ता होने लगी। इस सोव्हिएत के अघोषित आक्रमण को कैसे रोका जाये, इसपर विचारविमर्श शुरू हुआ।

उसीके परिणामस्वरूप अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष ट्रुमन ने ‘विश्‍वयुद्ध में लगभग दिवालिये होने की कगार पर स्थित युरोप की सहायतास्वरूप’ ‘मार्शल प्लॅन’ यह योजना लागू की। लेकिन उसके पीछे का छिपा उद्देश्य, उन देशों को सोव्हिएत के कम्युनिझम के संभाव्य प्रभाव में आने से रोकना, यह था। यह ‘मार्शल प्लॅन’ यही उसके बाद के कोल्ड वॉर के समूचे कालखण्ड में सोव्हिएत रशिया को मात देने का अमरीका का प्रमुख अस्त्र रहा।

सोव्हिएत रशिया ने इस ‘मार्शल प्लॅन’ के पीछे के इस अंतःस्थ हेतु को पहचानकर ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ के देशों को ‘मार्शल प्लॅन’ को नकारने पर मजबूर किया। युद्ध के बाद के समझौते में जर्मनीविषयक नीति में जर्मनी के चार भाग कर दिये गये थे और एक-एक भाग अमरीका, ब्रिटन, फ्रान्स और सोव्हिएत रशिया की देखरेख में था। दोस्तराष्ट्रों ने जर्मनी का पुनः-औद्योगिकीकरण करने की योजना बनायी थी, जो सोव्हिएत रशिया को मंज़ूर नहीं था, क्योंकि जर्मन आक्रमण का घाव प्रायः सोव्हिएत रशिया ने ही सहा था। अतः सोव्हिएत रशिया की मिन्नतें करते रहने के बजाय, उनमें से अन्य तीन देशों ने अपने अपने?भाग एक कर दिये, जिसमें से पश्चिम जर्मनी का जन्म हुआ; वहीं, सोव्हिएत रशिया की देखरेख में होनेवाले भाग का पूर्व जर्मनी में रूपान्तरण हुआ। रणनीति की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होनेवाले बर्लिन शहर का भी – वह तीनों ओर से पूर्वी जर्मनी के भूभाग से घिरा रहने के बावजूद भी – पूर्व और पश्चिम बर्लिन में विभाजन कर दिया गया।

कोल्ड वॉर का पहला माना जानेवाला वार सोव्हिएत रशिया ने किया – ‘बर्लिन ब्लॉकेड’ के रूप में। बर्लिन पर का अपना वर्चस्व अबाधित रखने की दृष्टि से उन्होंने पश्चिम जर्मनी से बर्लिन आनेवाली अनाज एवं अन्य जीवनावश्यक चीज़ों की आपूर्ति को, ट्रेन आदि पर वहाँ आने से मना करते हुए बन्द कर लिया। यही है वह ‘बर्लिन ब्लॉकेड’।

उसके जवाब के रूप में दोस्तराष्ट्रों ने हवाई जहाज़ के माध्यम से बर्लिन को जीवनावश्यक चीज़ों की आपूर्ति करने की शुरुआत की। यह उपक्रम ‘बर्लिन एअरलिफ्ट’ इस नाम से जाना जाता है। दोस्तराष्ट्रों ने सोव्हिएत को मात देने के लिए ही सही, लेकिन जर्मनी के साथ का अपना पुराना बैर भूलकर जर्मन नागरिकों को जो सहायता की, उससे जर्मनी एवं दोस्तराष्ट्रों के बीच की बैरभावना कम होने में मदद हुई। इस बर्लिन ब्लॉकेड को लेकर आंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोव्हिएत रशिया के खिलाफ़ बड़ा होहल्ला मच गया। लगभग ग्यारह महीनों बाद स्टॅलिन ने पीछे हटते हुए बर्लिन ब्लॉकेड ख़त्म किया।

इस सारे मामले में प्रचार तो दोनों तरफ़ से जोरोंशोरों से हो रहा था। ईस्टर्न ब्लॉक के देशों के सभी रेडिओकेंद्रों पर सरकारी, अर्थात् स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टी का कब्ज़ा था और वे केवल कम्युनिझम का ही प्रचार करते थे। उसी के साथ, युद्धखोरी, श्रमिकों का शोषण ये बातें पूँजीवाद की मूलभूत विशेषता ही हैं, यह बात श्रोताओं के दिलों पर अंकित करने का प्रयास किया जाता था।

यह कोल्ड वॉर शस्त्रों न खेलते हुए राजनीतिक दृष्टि से भी असरदार खेला जा सकता है, ऐसी सोच होनेवाला भी विचारवन्तों को एक गुट पश्‍चिमी देशों में अस्तित्व में था। उनके प्रयासों से ‘बीबीसी’ के साथ ही ‘रेडिओ फ्री युरोप’ आदि, केवल इसी काम को समर्पित रेडिओ स्टेशन्स शुरू हुए। साथ ही, कम्युनिस्ट विचारप्रणाली से भारित युरोप के विचारवंतों पर होनेवाला कम्युनिझम का प्रभाव कम करने के उद्देश्य से अमरीका ने विशेष निधि का निर्माण कर और सीआयए के ज़रिये उसे खर्च कर विभिन्न प्रचारसाहित्य युरोप में लाया।

साथ ही, सन १९४९ में अस्तित्व में आये दो जर्मनियों में से पश्चिम जर्मनी का औद्योगिक विकास कराके अमरीका पश्चिम जर्मनी को मुख्य धारा में ले आयी और उसे ‘नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनायझेशन’ (नाटो) की सदस्यता भी दिला दी।

उसी दौरान चीन में राज्यक्रांति हुई। अमरीका के बलबूते पर अब तक टिकी रही चँग कै शेक की सरकार को, माओ झेडाँग के नेतृत्व में होनेवाली ‘पीपल्स लिबरेशन आर्मी’ ने परास्त किया। तभी चीन पर होनेवाले अमरीका के प्रभाव को कम करने के लिए और अपना प्रभाव बढ़ाने के मौके की तलाश में होनेवाले सोव्हिएत रशिया ने तुरन्त ही माओ झेडाँग के नेतृत्व में होनेवाले ‘पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चायना’ को समर्थन दिया।

उसीके साथ, अब सोव्हिएत रशिया ने अपने प्रभावी प्रचारतंत्र के ज़रिये एशिया, अफ्रिका और लॅटिन अमरीका के अधिक से अधिक देशों में कम्युनिस्ट विचारप्रणाली के बीज बोने की शुरुआत की। स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टियों को निधि की आपूर्ति कर ‘श्रमिकों का शोषण’ इस एक मुद्दे को लेकर देश-देश असन्तोष ़फैलाने की शुरुआत की।

सोव्हिएत रशिया के इस बढ़ते प्रभाव को मात देने के लिए अमरीका ने अपनी, कम्युनिझम का विरोध करनेवाली ‘कन्टेनमेंट पॉलिसी’ पर अधिक ही बड़े पैमाने पर अमल करना शुरू किया, मार्शल प्लॅन की निधि में बढ़ोतरी की और रक्षाखर्च में चार गुना बढ़ोतरी की।

लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी….

….फिर शुरू हुआ कोरियन युद्ध!