समय की करवट (भाग ४३) – सोव्हिएत युनियन का उदयास्त-३

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सन १९१७ के फ़रवरी की पहली क्रांति के ज़रिये रशिया में से झारशाही का नष्ट होना, यह लोगों की बड़ी ही विजय मानी जाने लगी। झार को पदच्युत करने के बाद वहाँ पर अस्थायी सरकार की स्थापनी की गयी थी। कर्मचारी प्रतिनिधिमंडल (सोव्हिएत) एवं झार के अधिकार में होनेवाला विधिमंडल (ड्युमा) इनके संयुक्त तत्त्वावधान में मार्च १९१७ में इस हंगामी सरकार की स्थापना हुई थी। रशियास्थित उच्चवर्ग पर ड्युमा का प्रभाव था; वहीं, श्रमिकवर्ग पर सोव्हिएत का!

सेंट पीटर्सबर्ग स्थित यह कर्मचारी प्रतिनिधिमंडल की स्थापना दरअसल सन १९०५ में ही हुई थी। लेकिन शुरुआती दौर में उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ा। जैसे जैसे विश्‍वयुद्ध आगे बढ़ने लगा और लोगों में असंतोष धधकने लगा, वैसे वैसे उसका प्रभाव बढ़ने लगा। सन १९१७ की क्रांति के बाद तो उसे बहुत ही महत्त्व प्राप्त हुआ। इतना कि अस्थायी सरकार में वे प्रबल होते गये, धीरे धीरे ड्युमा की बराबरी के हो गये और बाद में उनपर हावी भी हो गये।

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उस दौर में रशिया की लगभग सभी फॅक्टरियों में इस प्रकार के ‘रेड गार्ड’ के युनिट्स हुआ करते थे।

अपितु शुरू शुरू में तो सत्तासंपादन यह उनका ध्येय नहीं था, क्योंकि वे एक विशिष्ट वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर रहे होने के कारण उनकी ताकत उस समय उतनी नहीं थी। इस कारण शुरुआती दौर में वे अस्थायी सरकार में शामिल भी नहीं होनेवाले थे; केवल राजसत्ता ख़त्म होने के बाद, शेष बचे पूँजीवादी कर रहे जनतन्त्र के विरोध का विरोध करने के लिए, सारी जनता को समान मानवीय अधिकार देने की बात का जो विरोध ये पूँजीवादी कर रहे थे, उसका विरोध करने के लिए वे अस्थायी सरकार के साथ काम करनेवाले थे। श्रमिक जनता का शोषण करनेवाले प्रस्थापित धनी ज़मीनदार और सरदारों के तरफ़दार होनेवाले ड्युमा पर विभिन्न मुद्दों को लेकर दबाव डालना (यानी प्रस्थापित – ‘बुर्झ्वा’ विचारधारा का विरोध करना), इतना ही उनका मर्यादित उद्देश्य था।

इस गुट में प्रायः रशिया के श्रमिकवर्ग के जहालमतवादी प्रतिनिधियों का समावेश था, जिन्हें ‘बोल्शेविक’ इस संज्ञा से बुलाया जाता था और यह गुट व्लादिमिर लेनिन ने स्थापन किया था। इसी दौरान प्रायः श्रमिकवर्ग की और थोड़ीबहुत मात्रा में सैनिकों की और नाविकों की भरमार रहनेवाले ‘रेड गार्ड’ इस निमसैनिकी दल की भी स्थापना की गयी थी; जिसमें से ही आगे चलकर, सोव्हिएत रशिया का निर्माण होने के बाद, ‘लाल सेना’ (‘रेड आर्मी’) का निर्माण हुआ। इस रेड गार्ड को कामचलाऊ सैनिकी प्रशिक्षण दिया गया था। हर फ़ॅक्टरी में इस रेड गार्ड का युनिट होता ही था।

मूलतः वास्तव में असंतोष निर्माण हुआ था, वह झार ने रशिया को युद्ध में धकेल देने के कारण जो समस्याएँ, जो परेशानियाँ रशियन नागरिकों को भुगतनी पड़ रहीं थीं, उस वजह से। इस कारण, झार को पदच्युत कर देने के बाद स्थापित की गयी अस्थायी सरकार इन समस्याओं को सुलझाने के लिए प्राथमिकता देकर विचार करेगी, ऐसा लोग सोच रहे थे। लेकिन अब वह सोच ग़लत साबित हुई और अस्थायी सरकार जर्मनी के खिलाफ़ युद्ध के और नये नये मोरचे खोलने लगी। लोगों को अस्थायी सरकार के हेतुओं की प्रामाणिकता के प्रति अब सन्देह उत्पन्न हुआ और लोग पुनः बेचैन हुए। परिणामस्वरूप अस्थायी सरकारस्थित सोव्हिएत गुट में असंतोष बढ़ने लगा।

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रशिया की अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री अलेक्झांडर केरेन्स्की

हंगामी सरकार में शामिल नहीं होना है, केवल ड्युमा पर रौब जमाने का काम करना है, ऐसा प्रस्ताव सोव्हिएत ने शुरू में ही संमत किया था। लेकिन उसके खिलाफ़ जाकर केरेन्स्की अस्थायी सरकार में शामिल हुआ। अहम बात यानी उसका इतना प्रभाव सोविएत पर था उसने अपनी इस करतूत को – ‘मूल प्रस्ताव के लिए सम्माननीय अपवाद (एक्सेप्शन)’ के रूप में सोव्हिएत द्वारा स्वीकृत करा लिया। उसके बाद कुछ ही दिनों में, सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते वह प्रथम युद्धमंत्री और बाद में अस्थायी सरकार में प्रधानमंत्री बन गया।

प्रधानमंत्री बनने के बाद उसने सार्वत्रिक माफ़ी देकर कई क़ैदियों को रिहा किया और रशिया में अभिव्यक्तीस्वतंत्रता लाने की दिशा में अच्छे क़ानून बनाये, हालाँकि वह रशिया को युद्ध में सहभागी होने से रोक न सका। ब्रिटन और ङ्ग्रान्स के कन्धे से कन्धा मिलाकर ‘दोस्तराष्ट्र’ के तौर पर सहभागी हो रहा होने के कारण, रशिया इन देशों से अनाज तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की आयात कर सकता था। यदि वह युद्ध से बाहर हुआ, तो इन दोस्तराष्ट्रों से हो रही यह सहायता बंद कर दी जायेगी और फिर असंतोष अधिक ही बढ़ेगा, ऐसा डर केरेन्स्की को लग रहा था। युद्ध में सहभाग जारी रखने के कारण सोव्हिएत केरेन्स्की पर नाराज़ थे; वहीं, ज़बरदस्ती युद्ध के मोरचे पर भेजे जाने के कारण सैनिक उसपर नाराज़ थे।

उसीमें उसने एक और ग़लती की। अस्थायी सरकार द्वारा यह घोषित किया गया था कि युद्ध के ख़त्म होने के बाद रशिया में चुनाव होंगे और लोकनियुक्त प्रतिनिधि यह तय करेंगे कि राजेशाही ख़त्म हो चुके रशिया की नयी शासनप्रणाली कैसे होनी चाहिए। लेकिन केरेन्स्की ने उससे पहले ही रशिया को ‘संघराज्य’ घोषित किया और खुद को मिलाकर पाँच लोगों का संचालकमंडल नियुक्त किया। यह यानी सोव्हिएत को खुले आम बाजू में रखकर अपने पास सर्वोच्च अधिकार लेने की कोशिश थी। इस कारण अब सोव्हिएत में होनेवाले जहालमतवादी बोल्शेविक केरेन्स्की को नीचे खींचने का मौका ढूँढ़ने लगे।
वह मौका मिला अक्तूबर में।

सन १९१७ की दूसरी क्रांति के लिए – ऑक्टोबर क्रांति के लिए पोषक वातावरण तैयार हो चुका था।