समय की करवट (भाग २६)- ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’

– हेन्री किसिंजर

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द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद शुरू हुआ अमरीका और सोव्हिएत रशिया इन महासत्ताओं के बीच के ‘कोल्ड वॉर’ का कालखंड। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद दुबले बन चुके अधिकांश युरोपीय देश आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे। ऐसे समय सोव्हिएत रशिया इन देशों की सहायता करने के बहाने वहाँ घुसकर कहीं कम्युनिझम का प्रसार न कर लें, इसलिए अमरीका ने स्वयं ही इस ज़िम्मेदारी का स्वीकार किया। तत्कालीन अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष हॅरी ट्रुमन ने सोव्हिएत रशिया को मात देने के लिए युरोप के आर्थिक संकट में फ़ँसे देशों को सहायता की आपूर्ति कर उन्हें सोव्हिएत रशिया के प्रभाव से बाहर निकालने की दीर्घकालीन नीति बनायी। वह ‘ट्रुमन डॉक्ट्रिन’ के नाम से मशहूर हुई। युरोप में उसपर सफलता से अमल करने के बाद इस कार्यप्रणाली पर आगे चलकर दुनियाभर में अमल किया गया और एक के बाद एक देशों को आर्थिक सहायता के माध्यम से अंकित बनाकर, कई देशों में अमरीकापरस्त सरकारें बिठायी गयीं। (इन कुटिल कारनामों के कारण आगे चलकर दुनियाभर से आलोचना का विषय बना अमरिकी गुप्तचर संगठन सीआयए का जन्म भी सन १९४७-४८ में, अर्थात इन ट्रुमन के कार्यकाल में ही हुआ।)

अमरीका की इस रणनीति से बचने के लिए, अमरीका के टक्कर की अर्थव्यवस्था का निर्माण करने के लिए और मुख्य रूप में, युरोपीय देशों में भविष्यकालीन युद्ध टालने के लिए सन १९५२ में ‘युरोपीयन कोल अँड स्टील कम्युनिटी’ की स्थापना की गयी। उसके पश्‍चात् के २-३ वर्षों में ही, युरोपीय देशों के आपसी व्यापार में, इन दो क्षेत्रों में यानी कोयला और स्टील इन क्षेत्रों में होनेवाली व्यापारवृद्धि के आड़े आनेवाली अड़चनें दूर की गयीं।

इस संगठन के चार बुनियादी विभाग थे – १. ‘हाय ऑथॉरिटी’ – यह नौं-सदस्यीय सर्वोच्च अधिकार रहनेवाला विभाग था। ये नौं सदस्य हालाँकि सदस्य देशों में से चुने जाते थे, मग़र फिर भी काम स्वतंत्र रूप से करते थे और कोई भी फ़ैसला करते समय संगठन के हित को ही मद्देनज़र रखते थे और उनके द्वारा किये फ़ैसले पर किसी भी प्रकार से उनके मातृभूमि का प्रभाव नहीं पड़ें, इसका खयाल रखते थे। २. कौन्सिल ऑफ़ मिनिस्टर्स – इसमें हर एक सदस्य देश द्वारा भेजा गया एक एक सदस्य होता था और वह ‘हाय ऑथॉरिटी’ और अपना अपना देश इनके बीच की कड़ी के तौर पर काम करता था। ३. कॉमन असेंब्ली – इसमें विभिन्न सदस्य देशों द्वारा नियुक्त किये गये प्रतिनिधी रहते थे। जिनका काम केवल सलाह देने तक ही मर्यादित था; तथा ४. कोर्ट ऑफ़ जस्टिस – सदस्य देशों में कुछ झगड़ा उत्पन्न हुआ, तो कोर्ट ऑङ्ग जस्टिस के सामने अपना अपना पक्ष रखा जाता था।

इस प्रकार, किसी देश के प्रशासन का कामकाज़ जिस पद्धति से चलाया जाता है, उसी प्रकार मर्यादित रूप में ही सही, लेकिन इस युरोपीय देशों के संगठन का कामकाज़ चलाया जाने लगा था।

अब पूरा युरोप महाद्वीप यह राष्ट्रों का एक संघ बनने की दिशा में अगला कदम बढ़ाने की ज़रूरत युरोपीय राष्ट्रों को महसूस होने लगी थी। उसीमें से जन्म हुआ – ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ का।

२५ मार्च १९५७ को रोम में ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ इस संगठन का जन्म हुआ। (‘ट्रीटी ऑफ़ रोम’)

लेकिन उससे पहले कोयला और स्टील क्षेत्र में सफल हुए इस प्रयोग का रक्षाक्षेत्र में भी विस्तार किया जाये, इस दृष्टि से ‘युरोपियन डिफ़ेन्स कम्युनिटी’ (थोड़ीबहुत ‘नाटो’ की संकल्पना के अनुसार प्रस्तावित की गयी) और युरोप के देशों का ‘अमेरिकन-स्टाईल’ संघराज्य बनाने की दिशा में ‘युरोपियन पॉलिटिकल कम्युनिटी’; ऐसे दो संगठनों का प्रस्ताव सदस्य देशों के विचाराधीन था। लेकिन आपसी अविश्‍वास के कारण और इन संगठनों के, ख़ासकर ‘युरोपियन पॉलिटिकल कम्युनिटी’ के प्रावधानों के कारण अपनी संप्रभुता पर आँच आ रही होने की भूमिका फ्रान्स द्वारा अपनायी जाने के कारण उसने किये विरोध के कारण; इन कारणों से ये दोनों तत्त्वतः मंज़ूर होने के बावजूद भी आकार धारण नहीं कर सके।

ये प्रस्तावित संगठन हालाँकि अस्तित्व में नहीं आ सके, लेकिन उनके निर्माण के लिए सदस्य देशों के जो चर्चासत्र चल रहे थे, उनमें से सबको मान्य होंगे ऐसी कई मुद्दें एकत्रित करके, कुछ मुद्दों में फेरफार करके, केवल आर्थिक क्षेत्र के सहयोग पर ही ध्यान केंद्रित करने का तय किया गया और सदस्य देशों के और कुल मिलाकर संगठन के हितसंबंधों में संतुलन बनाये रखने की बात मान्य करते हुए, २५ मार्च १९५७ को रोम में ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ इस संगठन का जन्म हुआ। (‘ट्रीटी ऑफ़ रोम’)

उसीके साथ, हाल ही में परमाणुऊर्जा के भयानक ध्वंसकारी रूप का अनुभव किया होने के कारण, परमाणुऊर्जा क्षेत्र में सदस्य राष्ट्रों के बीच रचनात्मक सहयोग का वातावरण निर्माण होने के लिए ‘युरोपियन अ‍ॅटोमिक एनर्जी कम्युनिटी’ यह संगठन भी अस्तित्व में आया। इनमें से ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ यह संगठन सर्वप्रथम ‘कस्टम्स युनियन’ यानी सदस्य राष्ट्रों की आयात-निर्यात करपद्धतियों (सीमाशुल्क एवं एक्साईज़) में होनेवाली पुनरावृत्ति (रिपीटिशन) निकालकर उसे सरल बनाने का काम करनेवाला था। वहीं, ‘युरोपियन अ‍ॅटोमिक एनर्जी कम्युनिटी’ यह संगठन परमाणुऊर्जा क्षेत्र में सदस्य राष्ट्रों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने का कार्य करनेवाला था।

किसी भी देश में आयात-निर्यात हो रहे उत्पादों पर उस देश की कस्टम्स ड्युटीज् (आयात-निर्यात कर) लागू की हुईं होती हैं। लेकिन जब कई देश इस प्रकार एक संघ के रूप में काम करते हैं, तब उनमें से एक सदस्य राष्ट्र में बननेवाला उत्पादन यह प्रायः उस संघ का ही उत्पादन माना जाता है; और जब वे उत्पादन अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने तक जिन विभिन्न सदस्य देशों से गुज़रते हैं, तब उस हर एक देश की कस्टम्स ड्युटीज् उसपर लगायीं नहीं जातीं। बल्कि सभी सदस्य राष्ट्रों का एक संघ (युनियन) ही है, ऐसा मानकर, उस संघ में से उत्पादन इंपोर्ट या एक्स्पोर्ट होते हुए ही केवल उसपर उस देशों के संघ की सामायिक कस्टम्स ड्युटीज् लगायी जातीं हैं।

समय के अनुसार तथा सदस्य देशों की बदलतीं ज़रूरतों के अनुसार इसमें समय समय पर कई बदलाव होते गये और ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ अच्छीख़ासी सुस्थिर हुई। इसके लिए, इस प्रकार संघात्मक रूप में अपना अस्तित्व बनाये रखने की सदस्य राष्ट्रों को महसूस हुई ज़रूरत और उसके लिए उन्होंने आवश्यक होनेवाले समझौते करने के लिए समय समय पर दिखायी तैयारी, ये कारण थे।

आगे चलकर सन १९६७ में ‘युरोपीयन कोल अँड स्टील कम्युनिटी’ तथा ‘युरोपियन अ‍ॅटोमिक एनर्जी कम्युनिटी’ ये संगठन भी ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ में ही अंतर्भूत किये गये। इस समझौते को ‘मर्जर ट्रीटी’ कहा जाता है।

इस ‘युरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ में से ही आगे चलकर आज के युरोपीय महासंघ का जन्म हुआ।