समय की करवट (भाग ३४) – ‘ईस्टर्न ब्लॉक’

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।
इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’

हेन्री किसिंजर

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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

द्वितीय विश्‍वयुद्ध से पहले सोव्हिएत रशिया ने हिटलर के साथ मित्रता-समझौता किया था और उसके अंतर्गत, हिटलर की आक्रमणकारी मुहिमों में शुरू शुरू में तो अपनी भी रोटी सेक ली थी। इस मित्रता समझौते के अनुसार पूर्व युरोप के देशों का, जर्मनी तथा सोव्हिएत रशिया ने आपस में गुप्त रूप में बँटवारा किया था। उसके अनुसार, जब हिटलर ने पश्चिम पोलंड पर आक्रमण किया, तब सोव्हिएत सेनाएँ पूर्व पोलंड को निगल रहीं थीं। इसी तरह आगे चलकर भी, सोव्हिएत रशिया ने युरोप के कई देशों को अपना अंकित बना दिया। ब्रिटीश प्रधानमंत्री चर्चिल की नज़र में हिटलर तथा स्टॅलिन दोनों भी शत्रु ही थे; लेकिन उसे हिटलर अधिक भयानक प्रतीत हुआ होने के कारण चर्चिल ने हिटलर के खिला़फ़ स्टॅलिन की मदद करके हिटलर को रास्ते से हटाया था। लेकिन अब बचा स्टॅलिन और उसके – संपूर्ण युरोप में कम्युनिस्ट शासनप्रणाली लाने के सपने चर्चिल को भयावह प्रतीत हो रहे थे। लेकिन स्टॅलिन के बारे में उतनी बुरी राय न होनेवाले रूझवेल्ट के सामने चर्चिल को झुकना पड़ा।

पोलंड को पुनः पहले जैसा ही एकसंध स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की माँग पर इस परिषद में चर्चिल तथा रूझवेल्ट ने ज़ोर दिया। यह माँग स्टॅलिन को मंज़ूर नहीं थी। ‘युद्ध में जीता हुआ पोलंड हमारे ही पास रहेगा और बचेकुचे पोलंड में भी सोव्हिएतपरस्त सरकार ही कार्यरत रहेगी’ ऐसी शर्त स्टॅलिन ने रखी। बहुत चर्चा होने के बाद आख़िरकार, ‘पूर्व युरोप का ‘कम्युनाइझेशन’ नहीं करूँगा’ ऐसा अभिवचन स्टॅलिन ने उन दोनों को दिया और महायुद्ध से पहले जीते हुए पोलंड में भी ‘जल्द ही’ जनतंत्र स्थापित करने का आश्‍वासन दिया।

लेकिन सोव्हिएत रशिया यह हिटलर ने ठेंठ आक्रमण किया हुआ देश होने के कारण, ‘हमें हरज़ाना मिलना चाहिए’ ऐसी माँग स्टॅलिन ने की। उसके लिए, ‘जीते हुए देशों में स्थित कारखाने एवं कच्चा माल, फ़सल इतना ही नहीं, बल्कि कुशल मनुष्यबल आदि अन्य संसाधन भी हमें जैसे और जितने चाहे उतने प्रमाण में उठाकर सोव्हिएत रशिया में ले जाने की’ अनुमति चाही। थोड़ीबहुत पाबंदियाँ लगाकर यह माँग भी मजबूरन् मंज़ूर कर दी गयी।

इस परिषद के बाद जब सोव्हिएत विदेशमंत्री मोलोटोव्ह ने, ‘युद्ध में जीते हुए प्रदेश यदि इस तरह समझौते की चर्चा में हाथ से जाने लगे, तो पूर्व युरोप का कम्युनाइझेशन करने की अपनी योजना का क्या होगा’, ऐसी चिंता स्टॅलिन के पास ज़ाहिर की; तब ‘वह हम ‘अपनी पद्धति’ से करने ही वाले हैं’ ऐसा जवाब स्टॅलिन ने दिया।

सोव्हिएत रशिया
सोविएत रशिया की सरहद से सटे कई देशों में कम्युनिस्ट शासनप्रणाली अपनायीं हुईं सोव्हिएतपरस्त सरकारें स्थापित करके स्टॅलिन ने, पूर्व युरोप के कई देशों का ‘सोव्हिएटायझेशन’ किया। इसे ही ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ कहा जाता है।

यदि बाद का दौर देखा, तो स्टॅलिन ने यह साध्य किया हुआ भी दिखायी देता है। यह ‘अपनी पद्धति’ यानी देश प्रत्यक्ष रूप में जीतकर नहीं, बल्कि उन्हें नाममात्र स्वतंत्र रखकर, लेकिन उन देशों में कम्युनिस्ट शासनप्रणाली अपनायीं हुईं सोव्हिएतपरस्त सरकारें स्थापित करते हुए स्टॅलिन ने, पूर्व युरोप के कई देशों का ‘सोव्हिएटायझेशन’ किया। इसे ही ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ कहा जाता है।  यह हासिल करने के लिए, उस समय अधिकांश देशों में नगण्य (ना के बराबर) अस्तित्व रहनेवालीं कम्युनिस्ट पार्टियों को यह मशवरा दिया गया कि ‘वे उस उस देश में साधारणतः बायीं विचारधारा होनेवालीं, पूँजीवाद का विरोध करनेवालीं समविचारी पार्टियों के साथ गटबंधन करें’; और फिर एक बार जब उस देश की सत्ता हाथ आ गयी, तब गटबंधन के अन्य साझेदारों को नामशेष करने की नीति अपनायी गयी।

युरोप महाद्वीप का, सोव्हिएतपरस्त देश रहनेवाला पूर्व युरोप तथा पश्‍चिमी पूँजीवादी विचारधारा का स्वीकार किये हुए देश रहनेवाला पश्‍चिम युरोप, ऐसा अघोषित बँटवारा करनेवाली इस अदृश्य रेखा को चर्चिल ने भली-भाँति पहचाना था। उस अदृश्य रेखा के बारे में बात करते समय चर्चिल ने जब एक परिषद में उसे ‘आयर्न कर्टन’ (फ़ौलादी परदा) ऐसा संबोधित किया; साथ ही, ‘ये पूर्वी युरोप के देश यानी उस अदृश्य फ़ौलादी परदे के पीछे से (यानी मॉस्को द्वारा) दी जानेवालीं सूचनाओं के इशारों पर नाचनेवालीं कठपुतलियाँ हैं’ ऐसा वक्तव्य जब चर्चिल ने किया; तब कई विश्‍लेषकों ने ‘यह महज़ बात का बतंगड़ बनाने की कोशिश है’ ऐसी टिप्पणी की थी। लेकिन यह ‘आयर्न कर्टन’ भले ही अदृश्य हों, मग़र वह काल्पनिक यक़ीनन ही नहीं था, यह आगे चलकर साबित हुआ ही।

इसे साध्य करते समय ‘बर्लिन ब्लॉकेड’ जैसी कई चालें सोव्हिएत ने चलीं।

….और वही पूर्व जर्मनी में भी घटित हुआ। महायुद्ध जीतने के बाद सोव्हिएत के हिस्से में आये पूर्व जर्मनी स्थित कई कारखानें, खेतीमाल आदि चीज़ें वे सोव्हिएत रशिया ले गये। सन १९४९ में पूर्व जर्मनी यह देश के तौर पर अधिकृत रूप में अस्तित्व में आ जाने के बाद, पूर्व जर्मनी में बचेकुचे सभी, निजी मालिक़ियत होनेवाले कारखाने, खेती आदि उद्योग, इतना ही नहीं, बल्कि रहने के मकान तथा अन्य मालमत्ता पर भी सोव्हिएत ने पहले सरकारी मालिक़ियत की मुहर लगा दी। अर्थात्, अब कोई चाहे कितनी भी मेहनत करें, उसे उसका केवल नियत मेहनताना ही मिलनेवाला था। ‘अधिक मेहनत-अधिक मुना़फ़ा’ इस पश्‍चिमी पूँजीवादी पद्धति की आदत रहनेवाले पूर्वी  जर्मनी के लोगों के लिए यह माजरा नया था। मुख्य बात, ‘कल तक मैं जिस मेरे बापदादाओं के घर में रह रहा था, जो मेरी मालिक़ियत का था, वह अचानक एक ही रात में सरकारी मालिक़ियत का हुआ और मैं केवल इस सरकार द्वारा दिये गये घर में निवास कर रहा हूँ; और सरकार यदि इस जगह का दूसरे किसी काम के लिए इस्तेमाल करना चाहेगी, तो मुझे बिना किसी पूर्वसूचना के, अचानक कहीं पर भी स्थानांतरित किया जा सकता है, यह कल्पना ही दिल दहलानेवाली थी। इस थोंपी हुई जीवनशैली के कारण वहाँ के नागरिकों में असंतोष बढ़ने लगा।

उसके बाद सोव्हिएत ने अगला कदम यह उठाया – तब तक वहाँ पर केवल नाममात्र अस्तित्व रहनेवाली जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी में सोव्हिएत-स्टाईल पॉलिटब्यूरो, ‘केडर्स’ आदि संरचना का निर्माण कर, वहाँ के ‘सोशल डेमोक्रॅट्स’ के साथ उनका गटबंधन करवाकर, नयी ‘सोशालिस्ट युनिटी पार्टी’ प्रणित सरकार को सत्ता में लाया गया। लेकिन यह करते समय संभाव्य विरोधकों को जेल में डालना, प्रतिस्पर्धी साबित हो सकतीं हैं ऐसी पार्टियों को चुनाव लड़ने का मौका ही न देना आदि पद्धतियाँ अपनायीं गयीं थीं। इस नयी पार्टी में सभी अहम निर्णय (मॉस्को से आयीं सूचनाओं के अनुसार) कम्युनिस्ट सदस्यों द्वारा ही किये जाते थे। इसके अलावा, वहाँ पर एकछत्री कम्युनिस्ट शासन लाने के लिए, पार्टीअंतर्गत अनगिनत विरोधकों को, देशविरोधी कारनामें करने के तथा पश्‍चिमियों की जासूसी करने के आरोप लगाकर जेल में डाला जाने लगा। इसीके परिणास्वरूप पूर्वी जर्मनी के नागरिकों में अब असंतोष बड़े पैमाने पर बढ़ने लगा।

लेकिन यह सब करते समय सोव्हिएत ने पूर्वी जर्मनी के आर्थिक विकास के लिए कोशिशें कीं ही नहीं ऐसा नहीं है; लेकिन वह सब उन्होंने अपनी ‘सोव्हिएत-स्टाईल’ से किया। सन १९५१ से वहाँ पर पंचवार्षिक योजना शुरू करने का निर्णय घोषित किया गया। लेकिन उसमें तहत, वहाँ के ‘कन्झ्युमर गुड्स’ उद्योग को नामशेष करके, उसके स्थान पर भारी उद्योगों का विकास करने पर ज़ोर दिया गया था। इस सारे घटनाक्रम से निराश हो चुके पूर्वी जर्मनी के कई नागरिकों ने देशत्याग करके पश्चिम जर्मनी में पलायन करना पसन्द किया। सन १९५१ से १९५४ इस दौर में धीरे धीरे पूर्वी जर्मनी से पश्‍चिम जर्मनी में भागनेवालों की संख्या इतनी बढ़ गयी कि पंचवार्षिक योजना को सफल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर आवश्यक रहनेवाला कुशल कर्मचारीबल तेज़ी से घटने लगा।

इन कुशल तंत्रज्ञों को पश्चिम जर्मनी जाने से कैसे रोकें, इसपर सोचविचार करते करते ‘बर्लिन वॉल’ संकल्पना का जन्म हुआ।