श्‍वसनसंस्था- ८

हमारे श्‍वसन का मुख्य आधार हैं, हमारे फ़ेफ़ड़े । हम इस बारे में अध्ययन कर रहे हैं। प्रत्येक फ़ेफ़ड़े में ब्रोंकोपलमनरी सेगमेंटस् होते हैं, यह हमने देखा। प्रत्येक ब्रोंकोपलमनरी सेगमेंट स्वतंत्र रूप से श्‍वसन का कार्य कर सकती हैं। ऐसे प्रत्येक सेंगमेंट को एक-एक सेगमेंटल ब्रोंकस हवा की आपूर्ति करता रहता है। फ़ेफ़ड़े में प्रवेश करने के बाद सेंगमेंटल ब्रोंकस अनेक पतली नलिकाओं में विभाजित हो जाता है। ये नलिकायें १ मिमी से भी कम मोटी होती हैं। इन्हें ‘ब्रोंकिओल्स’ कहते हैं। फ़ेफ़ड़ों के छोटे-छोटे भागों में फ़ैली इन नलिकाओं को लोब्युलर ब्रोंकिओल्स कहते हैं। इस नलिका से उससे भी पतली शाखाएँ निकलती हैं। इन्हें टर्मिनल अथवा सिरे की ब्रोंकिओल्स कहते हैं। फ़ेफ़ड़ों के इस भाग को ये टर्मिनल ब्रोंकिओल्स हवा की आपूर्ति करती हैं। उस भाग के ‘एलविओल्स’ कहते हैं। एक टर्मिनल ब्रोंकिओल अनेक एलविओल्स को हवा की आपूर्ति करते हैं। जिस प्रकार से अंगूर की बेल में अनेकों अंगूर लटके होते हैं उसी प्रकार का यह चित्र दिखायी देता है। प्रत्येक एलविओल्स श्‍वसन का केन्द्र होता है। हमारे शरीर में रक्त के साथ वायु का आदान-प्रदान यहीं पर होता है। श्‍वास के दौरान नाक के रास्ते से अंदर ली गयी हवा टर्मिनल ब्रोंकिओल तक आती है और वहाँ से एलविओल्स में प्रवेश करती है। एलविओल्स अत्यंत पतली हवा की थैलियां ही होती हैं। इनका आवरण अत्यंत पतला होता है। इस आवरण की पेशियाँ लगातार एक प्रकार का द्रव स्रवित करती रहती हैं, जिसे म्युकस कहा जाता है। इसे ही हम ‘कङ्ग’ भी कहते हैं। यह द्राव हवा को स्निग्धता यानी गीलापन देता है। शुष्क हवा अथवा शुष्क प्राणवायु (Dry oxygen) पेशियों के लिए मारक साबित होता है। एलविओल्स के आवरण के बाहर फ़ेफ़ड़ों की छोटी रक्तवाहनियाँ होती हैं। यहाँ पर ही श्‍वास के माध्यम से आयी हुई प्राणवायु रक्त में शोषित की जाती है तथा रक्त की कार्बन डायऑक्साइड वायु रक्त से निकलकर एलविओल्स की थैली में चली जाती है। इसके साथ-साथ रक्त में कोई भी ज़हरीली घटक-वायु हो तो वो भी रक्त से एलविओल्स में छोड़ दी जाती है। यहाँ पर जमा होनेवाली यह सारी वायु उच्छ्वास के दौरान हवा के मार्ग से उलटी दिशा से प्रवास करके नाक के मार्ग से बाहर निकल जाती है।

एलविओल्स का़फ़ी छोटे होते हैं। रिक्तस्थान छोटे और उनके पृष्ठभाग पास-पास होते हैं। भौतिक शास्त्र के नियमों के अनुसार दोनों पृष्ठभागों में एक प्रकार का तनाव बन जाता है। इसे सरफ़ेस टेन्शन कहते हैं। इस Surface Tention को हम पृष्ठीय तनाव कहेंगे। यह तनाव दोनों पृष्ठभागों को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करता है। फ़लस्वरूप ये दोनों पृष्ठभाग एक-दूसरे के पास खिसकते हैं। उन्हें एक-दूसरे से दूर करने के लिए ज्यादा शक्ती लगानी पड़ती है।

यह पृष्ठीय तनाव एलविओल्स के पृष्ठभागों पर भी होता है। इसके दो दुष्परिणाम संभव हैं –

१) श्‍वास लेने के दौरान खींची गयी हवा पर्याप्त मात्रा में एलविओल्स में नही आती क्योंकि एलविओल्स ठीक से नहीं फ़ूलते।
२) उच्छ्वास के दौरान इसके अंदर की संपूर्ण हवा के बाहर निकल जाने से एलविओल्स समाप्त हो जायेंगे। यदि ऐसा हुआ तो हमारे लिए श्‍वास लेना ही कठिन हो जायेगा और वायु का आदान-प्रदान भी व्यवस्थित नहीं होगा।

परमेश्‍वर की कृपा से ऐसा नहीं होता। हमारे फ़ेफ़ड़ों में एक पदार्थ होता है, जो इस पृष्ठीय तनाव को कम करता है। इस पदार्थ को Surfactant (सरफ़ॅक्टंट)कहते हैं। यह द्रव पदार्थ का आवरण एलविओल्स के अंदरूनी पृष्ठभाग पर होता है। पृष्ठीय तनाव कम हो जाने से श्‍वास के दौरान एलविओल्स का आकुंचन-प्रसरण व्यवस्थित रूप से होता है।

कुछ नवजात शिशुओं को जन्म लेते ही श्‍वास लेने में कठिनाई होने लगती है। इससे नवजात शिशुओं में श्‍वासावरोध अथवा Neonatal Respiratory Distress Syndrome कहते हैं। ऐसे अर्भकों के फ़ेफ़ड़ों में सरफ़ॅक्टंट की कमी होती है, जिसके कारण एलविओल्स के कार्य व्यवस्थित नहीं होते। गर्भ की वृद्धि के अंतिम महीने में इस सरफ़ॅक्टंट का आच्छादन एलविओल्स पर तैयार होता है। कम दिनों के यानी ६वें, ७वें, ८वें महीनों में जन्मे अर्भक (Premature Babies) इस बीमारी के शिकार होते हैं, क्योंकि इस उम्र में फ़ेफ़ड़ों के सरफ़ॅक्टंट की मात्रा कम होती है। कुछ अर्भकों में तो सरफ़ॅक्टंट बिलकुल तैयार ही नहीं होता। ऐसे शिशुओं को जन्म से ही श्‍वासोच्छ्वास करना कठिन होता है। ऐसे शिशुओं के फ़ेफ़ड़े आंकुचित ही रहते हैं। वे हवा से नहीं ङ्गूलते। इसे वैद्यकीय भाषा में फ़ेफ़ड़ों का अ‍ॅटलेक्टसिस (atalectasis) कहते हैं। फ़ेफ़ड़ों में सरफ़ॅक्टंट का तैयार ही ना होने के कारण अथवा उसकी कमी होने के कारण जो बीमारियाँ होती हैं, वे बहुत ही गंभीर स्वरूप की होती हैं और कभी कभी जानलेवा भी बन सकती हैं।

उपरोक्त विवेचन से हमें फ़ेफ़ड़ों के सरफ़ॅक्टंट के महत्त्व का पता चलता है। फ़ेफ़ड़ों की रचना से संबंधित अन्य कुछ बातों की जानकारी हम अगले लेख में प्राप्त करेंगे।(क्रमश:)