श्‍वसनसंस्था- ३

हम अपनी श्वसनसंस्था के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। रचना को समझने में आसानी हो इसलिए श्वसनसंस्था को दो भागों में बांटा गया है। नाक से लेकर स्वरयंत्र तक के भाग को ऊपरी श्वसन संस्था अथवा upper Respiratory Tract कहते हैं। स्वरयंत्र से नीचे के भाग को निचली श्वसनसंस्था अथवा Lower Respriatory Tract कहते हैं। सर्वप्रथम हम ऊपरी श्वसनसंस्था की जानकारी प्राप्त करेंगे। इसकी शुरुआत नाक से ही होती हैं।

श्वसनसंस्था

नाक हमारे चेहरे का एक अविभाज्य अंग है। श्वसन के व्यतिरिक्त नाक की एक aesthetic value भी हैं। हमारे चेहरे का सौंदर्य बढ़ाना या कम करना नाक पर निर्भर करता है। किसी की नाक सीधी तो किसी की चपटी होती है। किसी की मटक लम्बी तो किसी की छोटी होती है। किसी की नाक के नथुनें बड़े तो किसी के चपटे होते हैं। किसी की नाक नुकीली होती है। इस तरह नाक के अनेकों प्रकार होते हैं। जो चेहरे का सौंदर्य निश्‍चित करते हैं। श्‍वास लेना/ श्‍वास छोड़ना और गंधज्ञान ये ही इसके कार्य हैं और ये ही इसकी वास्तविक पहचान है।

श्वसनसंस्था की शुरुआत नाक (Nastrils) से होती है। हम सभी को दो नथुनें होते हैं। दोनों नथुनों को एक दूसरे से अलग करनेवाला द्विभाजक परदा (Septum) बीचों बीच में होता है। बाहर से देखने पर नाक एक पिरामिड़ जैसी दिखायी देती हैं। नाक की ऊपरी बाजू यह इस पिरामिड़ की नुकीली बाजू है। नाक और चेहरे की हड्डियां सामने के छिद्र को खुला रखने में मददगार साबित हो गए हैं। इन छिद्रों द्वारा अंदर ली गयी हवा को नथुनों में थोड़ा उष्ण और गीला (स्निग्ध) किया जाता है। साथ ही हवा में मौजूद कुछ बड़े कण भी यहाँ पर ही अटक जाते हैं यानी यहाँ पर हवा को छाना जाता है। इसके अलावा हवा से आने वाली गंध का ज्ञान भी होता है।

ऊपर हमने देखा है कि नाक का खाली हिस्सा बीच के द्विभाजक परदे के कारण दो नथुनों में बाँटा जाता है। इसके सामने का छेद सामने से डेढ़ से दो सेमी होता है और आधे से एक सेमी चौड़ा होता है। नाक का खाली हिस्सा पीछे की ओर नेसोफ़ॅरिन्क्स यानी गले का नाक के साथ जुड़ा हुआ भाग, उसमें खुलता है। नाक के खाली भाग का पिछला हिस्सा गोलाकार होता है। इसकी ऊंचाई साधारणत: २.५ सेंमी और चौड़ाई १.३ सेंमी होती है।

पॅरानेसल सायनसेस :
नाक के बाजू में चेहरे की हड्डियों में रिक्तस्थान होते हैं। ऐसे रिक्तस्थान को सायनस कहते हैं। हड्डियों के नाम के अनुसार इन रिक्तस्थानों को नाम दिये जाते हैं। नाक की रिक्तियों के दोनों ओर हवा की रिक्तियां होती हैं। फ्रंटल, इथमॉयडल, स्फ़िनॉइडल और मॅक्सिलरी ऐसे इन रिक्तियों के नाम हैं। नाक की बाहरी दीवार में ये सब रिक्तियां खुलती हैं। अंतत: इन रिक्तियों में से निकला हुआ स्त्राव नाक के रिक्तस्थान में ही जमा होता है। जन्म के समय ये रिक्तियां बिलकुल बाल्यावस्था में ही होती है। प्रौढ़ावस्था में इनकी वृद्धि शुरु होती है और इस दौरान इन रिक्तियों के कारण चेहरे का आकार भी बदल जाता है।

पॅरानेसल सायनेस के कार्य :
इसके निश्‍चित रूप से क्या कार्य है, यह आज भी संदिग्ध ही है। कुछ संभावनायें जतायी गयी हैं। वे हैं – आवाज के कंपनो में वृद्धि करना, खोपड़ी का वजन ना बढ़ाते हुए उसका आकार बढ़ाना और सिर को एक विशिष्ट आकार देना। जिसके आधार पर उस व्यक्ति का लिंग, साधारण उम्र की जानकरी प्राप्त हो सकती है।

स्वरयंत्र अथवा Larynx :
हमारी जीभ के पिछले सिरे से लेकर श्‍वसननलिका के शुरुआती भाग को लॅरिन्कस अथवा स्वरयंत्र कहते हैं। मुख्यत: यह हवा का मार्ग है। परन्तु नाद, स्वर, आवाज की निर्मिति भी यहीं पर होती हैं। स्त्री और पुरुषों में इसका आकार विभिन्न होता है। उसकी संक्षिप्त जानकारी एक छोटी तालिका में दी गयी है।

स्वरयंत्र का नाप :
इसीके आधार पर स्त्री-पुरुषों में अंतर समझ में आता है। तरुणावस्था तक स्त्री और पुरुष के स्वरयंत्रों में कोई फ़र्क नहीं होता। आया हुआ फ़र्क इसके बाद के जीवन में आता है। हम सब की गर्दन में सामने की ओर मध्यभाग में हड्डी उभरी हुई दिखायी देती है। इस हड्डी के पीछे हमारा स्वरयंत्र होता है। स्वरयंत्र की बायी/दाहिनी बगल में सामने की ओर कूर्चा अथवा कार्टिलेज होती है।

स्वरयंत्र की रिक्तिका के ऊपरी भाग में म्युकस परतों के दो फ़ोल्ड्स होते हैं। इन्हें वेस्टोब्युलर परदा कहते हैं। मध्यभाग में भी ऐसे दो फ़ोल्डस् होते हैं, जिन्हें व्होकल फ़ोल्डस् कहते हैं। व्होकल फ़ोल्डस् ध्वनी निर्माण करते हैं। ध्वनि किस तरह निर्मित होती हैं, इसका एक अलग शास्त्र है। इसे Phonetics कहते हैं या ध्वनि शास्त्र कहते हैं। उसका अपना एक अलग शास्त्र है।