श्‍वसनसंस्था – २०

हम अपने फेफड़ों के रक्ताभिसरण के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। अब हम देखेंगे कि फेफड़ों में रक्त का प्रवाह कैसे होता है। कौन-कौन से घटक इस प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

श्‍वसन का मुख्य ध्येय है, श्‍वास का आदान-प्रदान करना और यही ध्येय फेफड़ों के रक्ताभिसरण का भी है। इसी लिये एकसमान सूत्र इस रक्ताभिसरण में दिखायी देता है। फेफड़ों के जिस भाग में हवा की उचित मात्रा होती है, वहाँ पर रक्त का प्रवाह ज्यादा होता है। फेफड़ों का जो भाग हवा से वंचित होता है, वहाँ पर रक्त प्रवाह कम होता है। शरीर के रक्ताभिसरण से बिल्कुल विपरित क्रिया यहाँ पर होती है।

शरीर के रक्ताभिसरण का अध्ययन करते समय अगली महत्त्वपूर्ण बात हमने देखी थी। पेशी अथवा पेशी समूह में प्राणवायु की मात्रा आवश्यकता से कम होने पर (इसे Hypoxia कहते हैं) उन पेशियों को रक्त की आपूर्ति करनेवाली रक्तवाहनियाँ प्रसारित हो जाती हैं। परन्तु फेफड़ों में इसके विपरित क्रिया होती है। अ‍ॅलविओलाय में प्राणवायु की मात्रा कम हो जाने पर (इस स्थिति में होने वालीं अ‍ॅलविओलाय श्‍वसन के कार्य में सहभागी नहीं होती) उस अ‍ॅलविओलाय को रक्त की आपूर्ति करनेवाली रक्तवाहनियाँ आंकुचित हो जाती है। उस भाग में रक्त की आपूर्ति कम करके उसे फेफड़ों के अन्य भागों की ओर मोड़ दिया जाता है। ऐसा क्यों होता है, यह समझना कठिन नहीं है।

जब शरीर की पेशियों को प्राणवायु की आवश्यकता होती है तब उन्हें प्राणवायु की आपूर्ति करने का काम रक्त करता है। पेशी तक रक्त पहुंचाने के लिये रक्तवाहनियाँ प्रसारित होती हैं। फेफड़ों में उपस्थित रक्त को प्राणवायु की आवश्यकता होती है। अ‍ॅलविओलाय की थैली में उपस्थित प्राणवायु को रक्त में मिलाना होता है। अ‍ॅलविओलाय की पेशियों का प्राणवायु की आपूर्ति करना यह मुख्य कार्य नहीं होता। अत: जिन अ‍ॅलविओलाय से प्राणवायु नहीं मिलती वहाँ पर जानेवाले रक्तप्रवाह को रोक दिया जाता है। मॅनेजमेंट मंत्र की याद आती है- unproductive work कम करना या रोक देना।

उपरोक्त विवेचन यह पता चलता है कि फेफड़ों के सभी हिस्सों में रक्त की आपूर्ति समान नहीं होती। फेफड़ों के विविध हिस्सों में से घटक इसपर नियंत्रण रखते हैं। अब हम इसका अध्ययन करेंगे।

हैड्रोस्टॅटिक प्रेशर और फेफड़ों में रक्तप्रवाह :
पीछे रक्त दबाव की जानकारी लेते समय हमने देखा कि शांति से खड़े व्यक्ति के तलवों का रक्तदाब, हृदय के स्तर के रक्त दबाव की तुलना में ज्यादा होता है। इसका कारण है कि हृदय से लेकर पैंरों तक की रक्तवाहनियों में जो रक्त रहता है, उसका उतना ही वजन होता है। रक्त के इसी वजन का असर फेफड़ों पर भी होता है।

फेफड़ों का सबसे ऊपरी सिरा और सबसे निचला सिरा इनके बीच ३० सें.मी. का अंतर होता है। इस अंतर में हैड्रोस्टॅटिक प्रेशर भी बदलता है। इस प्रेशर से साधारणत: २३ मि.मि of Hg का फ़र्क अथवा अंतर होता है। फेफड़ों के सर्वोच्च सिरे पर हैड्रोस्टॅटिक दबाव, हृदय के दबाव से १५ मि.मि of Hg कम होता है। फेफड़ों के सबसे निचले सिरे पर दबाव, हृदय के दाबाव की अपेक्षा ८ मि.मि of Hg ज्यादा होता है। तात्पर्य यह है कि फेफड़ों के दोनों सिरों में दबाव का अंतर २३ मि.मि of Hg होता है। दबाव में इस अंतर को प्रेशर ग्रेडिअंट कहा जाता है। इसका प्रभाव रक्त के प्रवाह पर होता है। फेफड़ों के विभिन्न हिस्सों में होनेवाले रक्त के प्रवाह में फ़र्क होता है। इस फ़र्क के आधार पर फेफड़ों को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है।

फेफड़ों की रक्तवाहनियों का खुलना (disleaded) अथवा बंद होना (collapsed या compressed) ये दो बातों पर निर्भर करता है- १) रक्तवाहनियों में रक्त का दबाव, जो रक्त वाहनियों को खुला रखता है। २) अ‍ॅलविओलाय में हवा का दबाव, जो रक्त वाहनियों को सिकुड़ देता (compress) है। जब हवा का दबाव, रक्त के दबाव की तुलना में ज्यादा होता है तो रक्तवाहनियाँ बंद हो जाती हैं। जब रक्त का दबाव हवा के दबाव से ज्यादा होता है तो रक्तवाहनियाँ खुली रहती हैं। इसी आधार पर फेफड़े को तीन भागों में बांटा जाता है।

विभाग १ : इस भाग की रक्तवाहनियों का दबाव कभी भी हवा के दबाव की तुलना में ज्यादा नहीं होता है। इस विभाग में रक्तप्रवाह सदैव बंद रहता है।

विभाग २ : इस भाग में रक्तप्रवाह कुछ समय तक शुरु रहता है तथा कुछ समय तक बंद रहता है। हृदय के सिस्टोल में रक्तवाहनियों में दबाव अलविलोय में हवा के दबाव की तुलना में ज्यादा होता है और इस दौरान फेफड़े के इस भाग में रक्तप्रवाह शुरु होता है। हृदय के डायस्टोल में रक्तवाहनियों में दबाव कम हो जाता है और इस दौरान रक्तप्रवाह बंद हो जाता है।

विभाग ३ : इस विभाग में रक्तप्रवाह निरंतर शुरु रहता है। क्योंकि यहाँ पर रक्त का दबाव, अलविलोस में हवा के दबाव की तुलना में ज्यादा होता है। नॉर्मल फेफड़े में उपरोक्त तीन में से दूसरा एवं तीसरा यानी कुल दो ही भाग होते हैं। अर्थात फेफड़ों का कोई भी हिस्सा रक्तप्रवाह से वंचित नहीं रहता।

फेफड़ों का ऊपरी सिरा, जिसे उपरोक्त कहते हैं, दूसरे विभाग में आता है। फेफड़ों के शेष भाग में रक्त प्रवाह सतत शुरु रहता है।

सर्वसाधारणत: फेफड़ों का कोई भी हिस्से का रक्तप्रवाह कुंठित नहीं होता। परन्तु असाधारण परिस्थिति में ऐसा होता है। असाधारण परिस्थिति का तात्पर्य है कि या तो अ‍ॅलविओलाय में हवा का दबाव बढ़ जाना चाहिए अथवा पलमनरी रक्तवाहनियों में सिस्टोलिक दबाव कम हो जाना चाहिए। ऐसी परिस्थिति फेफड़ों के एवं हृदय के रोगों में ही निर्माण होती है।

व्यायाम के दौरान इसके विपरित परिस्थिति होती है। व्यायाम के दौरान फेफड़ों में होनेवाली रक्तवाहनियों में दबाव बढ़ जाता है। इससे फेफड़ों के अपेक्स में भी निरंतर रक्तप्रवाह होते रहता है। (क्रमश:)