पुणे (भाग-१)

Old Pune - पुणे

महाराष्ट्र का ‘पुणे’ यह महत्त्वपूर्ण शहर ‘पुण्यनगरी’, ‘विद्या का नैहर’ इन विशेषणों से विख्यात है। पुणे इस शहर की पहचान जिस तरह विद्या का नैहर इस रूप में है, उसी तरह वह ‘महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी’ के रूप में भी जाना जाता है।

फिलहाल हम जिस गणेशोत्सव (बुद्धिदाता गणेशजी का गणपतिउत्सव) को मना रहे हैं, उस गणेशोत्सव के साथ पुणे इस शहर का अटूट नाता है।

मुळा और मुठा इन नदियों के संगम पर यह शहर बसा हुआ है। ‘पुण्यनगरी’ इस नाम से पुणे यह नाम प्रचलित हुआ है, ऐसा कुछ लोगों का मानना है। तळेगांव में प्राप्त हुए इसवी ७६८ के एक ताम्रपट में ‘पुनक’ इस नाम का उल्लेख किया हुआ है। वह पुनक ही आज का पुणे है, ऐसी कुछ लोगों की राय है। इसवी ९३७ में यहाँ पर खेती की शुरुआत हुई और तब यह स्थान ‘पुण्यविषय’ या ‘पुनकविषय’ इस नाम से जाना जाता था।

इसवी ७६८ में प्राप्त हुए ताम्रपट के द्वारा यह विदित होता है कि उस समय इस प्रदेश पर राष्ट्रकूटों का राज था। उसके पश्चात् इस प्रदेश पर कईं राजघरानों का शासन रहा; लेकिन यादवों के कार्यकाल के पश्चात् इस प्रदेश पर निजाम और मुघलों की सत्ता प्रस्थापित हुई। १७वी और १८वी सदी में निजाम और मुघलों की इस पुण्यनगरी पर हुकूमत थी। छत्रपति शिवाजी महाराज के कार्यकाल में यह सारा मुल्क हिन्दवी स्वराज्य का एक हिस्सा बन गया। शिवाजी महाराज के बाद जब सत्ता पेशवा के पास आयी, तब पुणे को मराठी साम्राज्य की राजधानी का दर्जा प्राप्त हुआ। मगर पेशवा और अंग्रे़ज इनके बीच हुए युद्ध में हुई पेशवों की हार के कारण यह शहर अंग्रे़जों के कब्जे में चला गया। भारत के अन्य शहरों की तरह इस शहर पर भी अंग्रे़जों की हुकूमत स्थापित हो गयी। अंग्रेजों ने भारत के कईं शहर और गाँवों के नाम उनके अपने उच्चारण की सहुलियत के हिसाब से बदल दिए और फिर उसके बाद कईं वर्षों तक उन शहर और गाँवों को उन्हीं नामों से पहचाना जाता था। अपनी इसी नीति के अनुसार अंग्रे़जों ने पुणे का उच्चारण ‘पूना’ इस तरह से करना शुरू किया।

जब तक पुणे पर यादवों की हुकूमत थी, तब तक पुणे का स्वरूप एक गाँव की तरह ही था। लेकिन आगे चलकर शिवाजी महाराज और पेशवाओं के कार्यकाल में यह गाँव ते़जी से विकसित होता गया और आज तो आसपास के कईं छोटे-छोटे गाँव पुणे इस शहर का ही एक हिस्सा बन चुके हैं। आज के पुणे में खडकी,दापोडी, औंध, येरवडा, कोथरूड, पाषाण, धनकवडी, बिबवेवाडी आदि कईं गाँवों का समावेश हो चुका है।
कुछ लोगों का मन्तव्य यह भी है कि मुळा-मुठा इन नदियों के संगम पर पुण्येश्‍वर का मन्दिर था। और उस मन्दिर के कारण ही इस प्रदेश को ‘पुण्यक’ यह नाम प्राप्त हुआ, जिसका अपभ्रंश होकर ‘पुणे’ बन गया।

राष्ट्रकूट, यादव इन जैसे राजघरानों ने पुणे पर शासन किया, लेकिन उनके बारे में इतिहास में कुछ अधिक जानकारी नहीं है। इतिहास में शिवाजी महाराज के समय से इस स्थान के बारे में उल्लेख प्राप्त होते हैं। पुणे और उसके आसपास का प्रदेश यह भोसले घराने की जागीर थी। शिवाजी महाराज के पिताजी ने इस प्रदेश को उनके नाम किया था। बचपन में राजा शिवाजी का अपनी माँ के साथ पुणे के लालमहल में वास्तव्य था। लगातार होनेवाले शत्रुओं के आक्रमण, लूट, स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार इनके कारण यहाँ की जनता बेहद परेशान हुई थी तथा अत्यधिक पीड़ा को सह रही थी। बचपन में ही शिवाजीमहाराज ने जनता की इस दुःस्थिति को पूर्णविराम देने का निश्‍चय किया। और इस निश्‍चय के अनुसार स्वराज्य की स्थापना की नींव उन्होंने पुणे और आसपास के मावळ मुल्क से ही रखी।

शिवाजी महाराज के चरित्र में पुणे का नाम एक और घटना के साथ जुड़ा हुआ है। शायिस्तेखान नाम का मुगल सरदार पुणे के लालमहल में अपना डेरा जमाकर आसपास के मुल्क में तबाही मचा रहा था। इस शायिस्तेखान का बन्दोबस्त करने के लिए शिवाजीमहाराज थेंट लालमहल पहुँच गएँ और शायिस्तेखान के शयनकक्ष में दाखिल हुएँ। उस समय अपनी जान बचाने के लिए भागते हुए शायिस्तेखान के हाथ की ऊँगलियाँ कट गयीं और जहाँ जान पर बन आयी थी, वहाँ शायिस्तेखान को केवल अपनी ऊँगलियाँ गँवानी पड़ीं।

शिवाजी महाराज के बाद पेशवों के कार्यकाल में, फिर एक बार पुणे इस शहर को ऊर्जितावस्था प्राप्त हुई।

छत्रपती शाहुजी के प्रधानमन्त्री पेशवे बाजीराव-१ ने शाहुजी की अनुमति से पुणे को अपना आवासस्थल बना लिया। बाजीराव पेशवे-१ और उनके बाद के कुछ पेशवाओं ने मराठा साम्राज्य का अटक इस शहर तक विस्तार किया। उनके कार्यकाल में फिर एक बार पुणे समृद्धता के शिखर पर था और उसे राजधानी का दर्जा भी प्राप्त हुआ था। साम्राज्यविस्तार के कार्य में व्यस्त रहने के कारण पेशवा पुणे में भव्य-दिव्य कला के प्रतीक होनेवालीं वास्तुओं का निर्माण बड़े पैमाने पर नहीं कर सके। लेकिन पेशवाओं ने उनके अपने निवास के लिए शनिवारवाडा इस वास्तु का निर्माण किया था, जो आज पेशवाओं के गतसाम्राज्य के गवाह के रूप में, मात्र अवशेषस्वरूप में विद्यमान है।

पेशवे बाजीराव-१ को ‘थोरला बाजीराव’ भी कहा जाता था। इन्होंने इसवी १७२८ में शासकीय राजधानी के तौर पर पुणे शहर का चयन किया और पेशवाई के विस्तार साथ-साथ पुणे का भी विस्तार होता रहा।

इन्हीं थोरले बाजीरावजी ने शनिवारवाडे का निर्माण किया। पेशवा की हार के कारण पुणे पर अंग्रेज़ों की हुकूमत स्थापित होने तक अर्थात् इसवी १८१८ तक शनिवारवाडा यह पेशवाओं के शासन का केन्द्रस्थान था।

Shanivarwada Pune - Baajirao
शनिवार वाडा

१० जनवरी १७३० को थोरले बाजीरावजी ने शनिवारवाडे की नींव रखी। उस दिन शनिवार था। इस वाडे के निर्माण के लिए जुन्नर से साग की लकड़ी, चिंचवड से पत्थर तथा जेजुरी से खड़िया मिट्टी इन्हें मँगाया गया। इसवी १७३० को शुरू हुआ यह निर्माणकार्य इसवी १७३२ में पूरा हुआ और पेशवा ने शनिवार को ही इस वाड़े में प्रवेश किया।

थोरले बाजीरावजी के बाद के पेशवाओं ने इस वाडे की रचना में कईं नईं संरचनाओं का निर्माण किया। इस वाडे के चहुँ ओर मजबूत चहारदीवारी का निर्माण किया गया। साथ ही, बु़र्ज, प्रवेशद्वार, फुहारा, हौद इनके अलावा अन्य वास्तुओं का भी निर्माण किया गया।
इस वाडे की उत्तरी दिशा में दो, पूर्वी दिशा में दो और दक्षिणी दिशा में एक इस तरह से कुल पॉंच प्रवेशद्वार थें।

इनमें से मुख्य प्रवेशद्वार को ‘दिल्ली दरवाजा’ कहते थें और वह इतना बड़ा था कि उस दरवाजे से हौदे के साथ हाथी प्रवेश कर सकता था। इन प्रवेशद्वारों की विशेषता यह थी कि यदि शत्रु के सैन्य ने वाडे पर आक्रमण किया और यदि उनके हाथी प्रवेशद्वार पर आक्रमण करने आएँ, तो उन हाथियों के आक्रमण को नेस्तनाबूद करने के लिए प्रवेशद्वारों पर नुक़ीले कीलों का इस्तेमाल किया गया था। इन कीलों की ऊँचाई कुछ इस कदर थी कि वे सीधे प्रवेशद्वार पर आघात करनेवाले हाथी के मस्तक में ही धस जाते थें। हर एक प्रवेशद्वार को अलग-अलग नाम दिया गया था।

शनिवारवाडे में स्थित इमारतों में से एक इमारत ७ मंजिला थी और ऐसा कहा जाता था कि पुणे से १७ किमी की दूरी पर स्थित आलंदी के सन्त ज्ञानेश्वरजी के समाधिमन्दिर का शिखर इस इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल की अटारी से दिखाई देता था।
विभिन्न प्रकार से रंगाये गए चित्र, लकड़ी पर की हुई नक़्क़ाशी, विभिन्न प्रकार के झाड़-फानूस (झुंबर), शीशमहल, संगेमर्मर के फर्श आदि चीजें इस वास्तु की सुन्दरता में चार चाँद लगाती गईं।

जब पेशवा सवाई माधवराव छोटे थें, तब उनके मनोरंजन के लिए शनिवारवाडे में फुहारे का निर्माण किया गया। यह फुहारा सोलह दलोंवाले कमल के आकार का था और हर एक दल में से पानी की कईं नन्हें-नन्हें बूँदों की झड़ी लगने की व्यवस्था की गई थी। इस प्रकार इस फुहारे से पानी के अनगिनत फव्वारें उछलते रहते थें।

थोरले बाजीरावजी के पश्चात् शनिवारवाडे में बाळाजी बाजीराव, माधवराव पेशवे इन कर्तृत्वशाली पेशवाओं ने राज किया। लेकिन इसी शनिवारवाडे ने पेशवाई में एक-दूसरे के खिलाफ़ रचे गए घिनौने षड्यन्त्रों को भी देखा है और नारायणराव पेशवा के वध का भी वह गवाह रहा है।

हिन्दुस्थान में जैसे-जैसे अंग्रेज़ों की हुकूमत बढ़ती गयी, वैसे-वैसे पेशवा की शक्ति क्षीण होती गयी। और आखिरकार जून १८१८ में पेशवा की पुणे पर की हुकूमत खत्म हो गई। जून १८१८ में पुणे की सत्ता पेशवे बाजीराव-२ से अंग्रेज़ों के पास आ गई और पेशवा राजकीय अज्ञातवास में बिठूर चल पड़े।

सत्ता हासिल करते ही अंग्रेज़ों ने पुणे को भी फ़ौजी दृष्टिकोन से महत्त्वपूर्ण दर्जा दिया। पुणे के नजदीक खडकी में अंग्रे़जों ने अपनी एक बहुत बड़ी फ़ौजी छावनी का निर्माण किया।

यहीं से शनिवारवाडे की सम्पन्नता को ग्रहण लग गया। उसी में, १७ फेब्रुवारी १८२८ को शनिवारवाडा बहुत बड़ी आग का शिकार हो गया। यह आग लगभग सात दिनों तक झुलसती रही। इस आग ने वाडे का भारी पैमाने पर नुकसान कर दिया। उसका पूर्वस्वरूप नष्ट होकर सिर्फ़ अत्यल्प हिस्सा ही आग से बच पाया।

मराठी साम्राज्य में जब पुणे का विस्तार हो रहा था, तब पुणे में वाडें एवं पेठों की एक अनोखी संस्कृति का उदय हुआ। इन पेठों के बारे में दिलचस्प बात यह है कि इनमें से ७ पेठों के नाम हफ़्ते के सात दिनों पर आधारित हैं (जैसे कि सोमवार पेठ, मंगलवार पेठ, बुधवार पेठ, गुरुवार पेठ, शुक्रवार पेठ, शनिवार पेठ, रविवार पेठ)। कुछ पेठें उनके नजदीक स्थित मंदिरों के नामों से जानी जाती हैं, तो कुछ व्यक्तिविशेषों के नामों से जानी जाती हैं।

आज के पुणे में पेठें जरूर हैं, लेकिन पुणे का अविभाज्य हिस्सा बनें वाडें अब बदलते समय के अनुसार अस्तंगत होते जा रहे हैं। आधुनिकीकरण हर शहर के रूप को बदल जरूर देता है। सच बात तो यह है कि पुरानी चीजों की जगह नईं चीजें ले लेती हैं।
जब अंग्रेज़ों की पुणे पर हुकूमत थी, तब पुणे भारतीय स्वतन्त्रतासंग्राम का एक प्रमुख शहर बन गया। जनसामान्यों में वैचारिक एवं सामाजिक क्रान्ति लानेवाला पुणे यह अग्रगण्य शहर था।

कईं महान समाजसुधारकों तथा क्रान्तिकारकों ने स्वतन्त्रता को पूरी तरह से भूल चुकी जनता को अपने अधिकारों तथा स्वतन्त्रता का एहसास दिलाया। इसके लिए उन समाजसुधारकों ने केवल सार्वजनिक उत्सव, वृत्तपत्र, व्याख्यान ही नहीं, बल्कि विभिन्न स्वदेशी शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना कर समाज में जागृति करने का कार्य किया।

समाजसुधारकों के इन प्रयासों के कारण ही सामूहिक जनशक्ति सक्रिय हो गई और स्वतन्त्रता संग्राम भड़क उठा। लेकिन इस संग्राम के, ‘स्वतन्त्रता’ इस सुन्दर फल को प्राप्त करने के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष को इसवी १९४७ तक राह तकनी पड़ी।