३६. डेव्हिड का वनवास

इस प्रकार उस महाकाय, महाताकतवर एवं शस्त्रसुसज्ज गोलाएथ को डेव्हिड ने केवल गोफन एवं पत्थर जैसे नाममात्र शस्त्र की सहायता से, ख़ासकर ईश्‍वर पर का अटूट विश्‍वास ज़रा भी न टूटने देते हुए उसे मार दिया था। लेकिन उसीने गोलाएथ का सिर काटकर ले जाने की जो प्रतिज्ञा गोलाएथ के सामने ही की थी, उसे पूरी करने के लिए उसके पास तलवार नहीं थी। उसने सीधे, नीचे गिरे गोलाएथ की ही प्रचंड वज़न की तलवार को सहजता से म्यान से बाहर निकालकर एक ही घाव में गोलाएथ का सिर काट दिया और उसे वह अपने साथ ले गया।

जिसपर फिलिस्तिनियों की सारी दारोमदार थी, उस महाकाय गोलाएथ की ही ऐसी हालत हुई देखकर फिलिस्तिनी सेना का धीरज टूट गया और उनमें भागंभाग शुरू हुई। सौल की सेना ने कॅनान प्रान्त की सरहद तक उनका पीछा किया, कई फिलिस्तिनियों को बीच रास्ते में ही मार दिया।

डेव्हिड
गोलाएथ की ही तलवार से एक ही घाव में गोलाएथ का सिर काटकर डेव्हिड ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

डेव्हिड का पराक्रम और उसकी ईश्‍वर पर की यह दृढ़ निष्ठा ज्यूधर्मियों में चर्चा का विषय बन चुकी थी। डेव्हिड का महत्त्व ज्यूधर्मियों में बढ़ता हुआ देखकर सौल के मन में अब उसके बारे में मत्सर की भावना बढ़ने लगी थी। वह इतनी बढ़ गयी कि सौल नेदो बार तो डेव्हिड की जान लेने की भी कोशिश की। सौल को निराशा ने ग्रसित करने के बाद उसे उसमें से बाहर निकालने के लिए जब डेव्हिड हमेशा की तरह हार्पसंगीत सुनाने आया था, तब मत्सर से अपना आपा खो चुके सौल ने उनकी दिशा में भाला फेंका था। ऐसा दो बार हुआ। लेकिन भगवान की दया से दोनों बार डेव्हिड बच गया था और सौल की उस समय की मनःस्थिति के चलते सौल की आँखों के सामने न रहना ही बेहतर है, ऐसा सोचकर उस दालान से बाहर निकला था।

लेकिन अचरज की बात यह थी कि सौल का बेटा जोनाथन और डेव्हिड में अकृत्रिम मित्रता के धागें निर्माण होने लगे थे और जोनाथन यह डेव्हिड का मानो भक्त ही बन गया था। अपने पिता के – सौल के दिल में अपने प्रिय मित्र डेव्हिड के प्रति नफ़रत की भावना है, यह बात जोनाथन जानता था और उसे यदि किसी साज़िश की भनक लग जाती थी, तब वह समय समय पर डेव्हिड को अगाऊ चेतावनी देकर चौकन्ना कर देता था।

लेकिन पहले घोषित कियेनुसार, सौलने अपनी छोटी बेटी का – मिशल का हाथ डेव्हिड के हाथ में देकर उसे अपना दामाद बना लिया। लेकिन उसे मार देने की कोशिशें दो बार नाक़ाम हो जाने के बाद, ‘इसपर भगवान की कृपा है’ इस सत्य का आंकलन हो चुका सौल यह भली-भाँति जानता था कि मैं इसे नहीं मार सकूँगा। अतः डेव्हिड को हालाँकि अपना दामाद बना लिया था, मग़र फिर भी उसे घर में आँखों के सामने न रखते हुए सौल ने उसे अपना सेनापति बनाकर, विभिन्न मुहिमों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर रखी थी। किसी भयंकर लड़ाई में उसकी जान चली जायेगी, ऐसी आशा सौल को थी। लेकिन वैसा कुछ भी घटित न होते हुए, उल्टा हर मुहिम में विजयी होने के कारण डेव्हिड का सिर अधिक ही ऊँचा हो जाता था और उसे इस्रायली लोगों से अधिकाधिक सम्मान तथा सराहना प्राप्त होती थी और सौल का मत्सर और भी बढ़ जाता था।

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डेव्हिड के प्रति सौल के मन में बढ़ने लगी मत्सर की भावना इतनी प्रबल हो गयी कि सौल ने डेव्हिड की दिशा में भाला फेंककर उसकी जान लेने की कोशिश भी की।

लेकिन ऐसा कहाँ तक चलेगा, ऐसा विचार कर डेव्हिड राजधानी छोड़कर भाग गया; वह पहले अपने खुद के घर गया, लेकिन सौल ने अपने सैनिकों को उसे पकड़कर ले आने के लिए भेजा। उसकी पत्नी ने भाग जाने में उसकी सहायता की। डेव्हिड वहाँ से निकला, वह ठेंठ सॅम्युएल के पास गया। लेकिन वहाँ उसने थोड़ा ही समय व्यतीत किया।

लेकिन उसने अब सौल से संभवतः दूर ही रहने का निश्‍चय किया। वह सौल की पारंपरिक वार्षिक दरबारी दावत के लिए भी उपस्थित नहीं रहा। सौल को यह अच्छाख़ासा बहाना मिला और उसने डेव्हिड को पकड़कर उसे देहदंड देने की सज़ा फ़रमायी।

डेव्हिड अब जान बचाने के लिए अधिक ही पूर्व की दिशा में निकल पड़ा। ज्युडाह ज्ञाति के प्रदेश में उसने कई ख़ुफ़िया जगहों पर थोड़ी थोड़ी देर निवास किया। बतौर पवित्र धर्मस्थान विख्यात हुई नॉब नगरी में उसने वहाँ की मुख्य धर्मोपदेशक के पास खाना और तलवार माँगी। उसके पास तलवार तो नहीं थी, लेकिन डेव्हिड ने गोलाएथ को मारकर जो उसकी तलवार हस्तगत की थी, उसे इसी स्थान में जतन करके रखा गया था। उसे लेकर डेव्हिड आगे निकला। लेकिन यह खबर वहीं के एक विघ्नसंतोषी पूर्व धर्मोपदेशक ने सौल तक पहुँचायी। सौल ने खौलकर नॉब स्थान के सभी धर्मोपदेशकों को – जब कि उसके सहकर्मी उसे ‘ऐसा मत करना’ ऐसा मशवरा दे रहे होने के बावजूद भी, डेव्हिड की सहायता करने पर मार दिया।

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डेव्हिड के साथ सौल का बेटा जोनाथन

सौल के लोग अब कभी भी उस तक पहुँच सकते हैं, इस डर से डेव्हिड इतना चकरा गया था कि कब वह ज्यूधर्मियों के जानी दुश्मन होनेवाले फिलिस्तिनियों की गाथ नगरी में पहुँच गया, उसे पता ही नहीं चला। लेकिन उसे वहाँ के कुछ फिलिस्तिनियों ने पहचान लिया होने का शक़ होने पर वह फिर से चौकन्ना हो गया और पागल होने का अभिनय करके वह उनके चंगुल से छूट गया।

वहाँ से आगे अ‍ॅड्युलम नगरी में उसका आगमन हुआ। उसे यहाँ के पर्वतो-गुफ़ाओं में छिपने के लिए मह़फूज़ जगह मिली। यहाँ से उसका घर नज़दीक ही था। इस कारण उसके परिजन उसे वहाँ आकर मिलने लगे। लेकिन इस्रायलियों का वीर लड़ाकू रणनायक डेव्हिड यहाँ पर आया होने की ख़बर धीरे धीरे फैलती जा रही थी। लेकिन इस बार यह ख़बर फैलने से नुकसान न होते हुए उसका फ़ायदा ही हुआ। सौल के सनकी शासनतन्त्र से ऊब चुके कई ज्यूधर्मीयों ने उससे पनाह माँगी। धीरे धीरे उसपर विश्‍वास होनेवाले लगभग चारसौ निष्ठावान ज्यूधर्मियों की फ़ौज़ उसके पास इकट्ठा हुआ था और यह संख्या बढ़ती ही जा रही थी।

इसी दौरान, फिलिस्तिनी लोग ज्युडाह के प्रान्त पर हमला करने के लिए सेना इकट्ठा कर रहे होने की ख़बर डेव्हिड तक पहुँची। तब किलाह नगरी में ठहरे डेव्हिड ने अपने निष्ठावान सहकर्मियों के साथ फिलिस्तिनियों पर धावा बोल दिया और प्रचंड पराक्रम कर उन्हें खदेड़ दिया। लेकिन जब डेव्हिड के इस करतूत की ख़बर सौल तक पहुँची, तब उसे डेव्हिड का अतापता ज्ञात हो जाने के कारण वह डेव्हिड को ढूँढ़ते हुए आने लगा। लेकिन इसकी भनक डेव्हिड को लग जाते ही उसने किलाह नगरी में से पलायन कर झिप के रेगिस्तान में सहारा लिया।

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नॉब नगरस्थित पवित्र धर्मस्थान के मुख्य धर्मोपदेशक ने, वहाँ जतन कर रखी, डेव्हिड ने गोलाएथ को मारकर हस्तगत की उसकी तलवार डेव्हिड के हवाले की।

सौल ने हालाँकि इतनी बेरहमी से डेव्हिड का पीछा करना जारी रखा था, मग़र डेव्हिड के दिल में उसके प्रति दुश्मनी की भावना न होकर, वह केवल अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहा था। इतना ही नहीं, बल्कि एक बार दरअसल सौल की जान लेना डेव्हिड के लिए बहुत ही आसान होने के बावजूद भी उसने सौल को ज़िन्दा वापस जाने दिया था।

इसी दौरान सॅम्युएल का निधन हुआ। डेव्हिड का एक बड़ा ही आधार ख़त्म हुआ था। सर्वोच्च धर्मोपदेशक होनेवाला सॅम्युएल, जिसके द्वारा इस्रायल के पहले दो राजाओं का चयन हुआ था, वह सभी इस्रायलियों के आदर का स्थान होने के कारण इस्रायली लोग दारुण शोक में डूब गये।

अब सौल की इस निर्दयी वृत्ति से ऊब चुके और लगातार भागते रहने से थक चुके डेव्हिड ने एक आत्यंतिक कदम उठाया। उसने अपने छः सौ निष्ठावान सहकर्मियों के साथ ठेंठ जाकर फिलिस्तिनियों के प्रान्त में पनाह ली। गाथ प्रान्त का फिलिस्तिनी राजा एकिथ ने डेव्हिड को पनाह भी दी और अपने प्रान्त की झिकलॅग नगरी में डेव्हिड और उसके सहकर्मियों के उदरनिर्वाह का प्रबन्ध भी करा दिया।

इस प्रकार एक विचित्र दैवगति के कारण, इस्रायल का भविष्यकालीन राजा डेव्हिड, इस्रायलियों के जानी दुश्मन होनेवाले फिलिस्तिनियों की पनाह में पहुँच चुका था!(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर