रक्त एवं रक्तघटक – ५५

सफ़ेद पेशियों की जानकारी लेते समय हमने शरीर की प्रतिकारशक्ति, इम्युनिटी, अ‍ॅलर्जी इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त की।

शरीर पर आक्रमण करनेवाले विभिन्न जीवाणु एवं अन्य विषैले पदार्थ, जो पेशी एवं अवयवों को नुकसान करते हैं, उनसे लड़ने की क्षमता हमारे शरीर में होती हैं। इस क्षमता को ही ‘इम्युनिटी’ कहते हैं। इस क्षमता में से ज्यादा तर क्षमता यह Acquired अथवा कमाई हुयी होती है। उदाहरणार्थ किसी जीवाणु की बाधा होने पर उस जीवाणु के विरुद्ध लड़ने की क्षमता यानी अँटिबॉडीज शरीर में तैयार होती है। इस क्रिया को कुछ सप्ताह से कुछ महीने लगते हैं। यह क्षमता उन जीवाणुओं तक ही सीमित होती है। ये अँटिबॉडीज उन विशिष्ट जीवाणुओं को ही मार सकते हैं। अन्य जीवाणुओं को नहीं मार सकते। परन्तु शरीर की एक ‘मूल’ प्रतिकार क्षमता भी होती है। इस क्षमता को Innate immunity कहते हैं। यह क्षमता सर्वसमावेशक होती है यानी किसी भी प्रकार के जीवाणुओं और विषाणुओं के विरुद्ध भी कार्य करती हैं।

मूलरूप से उपस्थित यह प्रतिकार शक्ती (Innate immunity) चार प्रकार से कार्य करती है।

१) फ़ॅगोसायटोसिस – जीवाणु, विषाणु और तत्सम घातक पदार्थ सफ़ेद रक्तपेशियाँ और मॅक्रोफ़ाजेस निगलती हैं।
२) अन्न और पानी के माध्यम से पेट में गये जीवाणु पेट के आम्ल एवं अन्य पाचक द्रावों द्वारा नष्ट किये जाते हैं।
३) हमारी त्वचा इन जीवजंतुओं को शरीर में प्रवेश करने से रोकती हैं।
४) रक्त के विशिष्ट रासायनिक संयुग, जो इन घातक घटकों से चिपकते हैं, जुड़ जाते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं।

कमाई हुयी प्रतिकारशक्ति अथवा Acquired immunity– यह एक शरीर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतिकारशक्ति होती है। यह प्रतिकारशक्ति स्पेसिफ़ीक यानी जीवाणु साक्षेप होती हैं। प्रत्येक घातक, जीवाणु, विषाणु, विषैले पदार्थ के विरुद्ध शरीर में विभिन्न प्रतिकारशक्ति का निर्माण होता है। इस प्रतिक्रिया में अँटिबॉडीज का निर्माण होता है। इस माध्यम से निर्माण होनेवाली प्रतिकार शक्ती की क्षमता का़फ़ी ज्यादा होती है। उदाहरणार्थ धनुर्वात के अथवा बोट्युलिझम के जीवाणु घातक विष का निर्माण करते हैं। हमारे रक्त में इस विष की मात्रा एक निश्‍चित प्रमाण से बाहर जाने पर जान को खतरा होने का संभव होता है। यदि इस विष के विरोध में हमारे शरीर में अँटिबॉडिज तैयार हो जाए तो इस विष का शरीर पर कोई परिणाम नहीं होता। शरीर के लिए मारक साबित होनेवाले विष की मात्रा यदि सीमा से एक लाख गुना विष भी रक्त में मिल जाए तो भी हमारे शरीर की प्रतिकारशक्ति उसका मुकाबला करती है। इसे ही उस विष के विरोध में हमारे शरीर की इम्यूनशक्ति कहते हैं। छोटे बच्चों को और किसी बीमारी में हम लसीकरण करते हैं। ये टिकें हमारा शरीर, उन-उन बीमारियों के विरुद्ध ऐसी ही प्रतिकारशक्ति निर्माण करता है। यही लसीकरण का महत्त्व है।

Acquired immunity यह मूलत: दो प्रकार की होती है। पहले प्रकार में शरीर रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में घूमनेवाली अ‍ॅँटिबॉडिज बनाता है। इसे ह्युमोरल अथवा ‘बी’ सेल इम्युनिटी कहते हैं। दूसरे प्रकार में शरीर में जीवाणुओं के विरुद्ध लड़नेवाले अ‍ॅक्टीवेटेड ‘टी’ लिंफ़ोसाइटस् तैयार होते है। इसे ‘सेल मिडिएटेड’ अथवा ‘टी’ सेल इम्युनिटी कहते हैं।

अँटिबॉडीज तैयार होने के लिये शरीर में सर्वप्रथम ‘अ‍ॅँटिजेन’ का होना आवश्यक होता है। विविध प्रकार के जीवाणु, विषाणु, उनमें स्त्रवित होनेवाले विविध विषैले पदार्थ ही अँटिजेन का काम करते हैं। यह सभी पदर्थ प्रथिनमय होते हैं और शरीर इन्हें ‘ऊपरी’ यानी बाहर से आया हुआ माना जाता है। ऐसे ‘ऊपरी’ प्रथिन मॉलेक्युल्स के विरुद्ध में अँटिबॉड़ीज का निर्माण होता है।

शरीर की लिंफ़ोसाइट पेशी संस्था ही Acquired immunity तैयार करती है। इसीलिए लिंफ़नोड्स्, प्लीहा, थायमसग्रंथी, टॉन्सिल्स इत्यादि जगहों पर ऐसी अँटिबॉडिज तैयार होती है। ‘बी’ लिंफ़ोसाइट और ‘टी’ लिंफ़ोसाइट दो प्रकार की लिंफ़ोसाइट पेशियां हमारे शरीर में होती हैं। ‘बी’ पेशी ह्युमोरल तथा ‘टी’ पेशी सेल मिडिएटेड इम्युनिटी तैयार करती हैं।

कुछ अर्भकों में जन्म से ही लिंफ़ोसाइट का अभाव होता है, ऐसे बच्चे जन्म के कुछ दिनों बाद ही जीवाणु-बाधा के शिकार हो जाते हैं।
(क्रमश:)

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