६८. वुडहेड कमिशन चर्चापरिषद का निमंत्रण

‘पील कमिशन’ का अहवाल हालाँकि अरब और ज्यूधर्मीय दोनों ने भी ठुकरा दिया था, मग़र ब्रिटीश सरकार ने इस अहवाल का स्वागत किया। साथ ही, उसमें की गयी पॅलेस्टाईन के विभाजन की सूचना तत्त्वतः मान्य की और उसमें सिफ़ारिश की गयी सूचनाओं का सविस्तार अध्ययन कर, उनमें से पॅलेस्टाईन का विभाजन करने की मुख्य सूचना पर व्यवहारिक रूप में प्रत्यक्ष अमल कैसे किया जा सकता है इसका विचार शुरू किया। इसके लिए सन १९३८ में ‘सर जॉन वुडहेड’ इस भारत में काम किये हुए पूर्व नागरी प्रशासकीय अधिकारी के नेतृत्व में एक और कमिशन का गठन किया। यह ‘वुडहेड कमिशन’ अधिकृत रूप में ‘पॅलेस्टाईन पार्टिशन कमिशन’ के नाम से जाना जाता है।

वुडहेड कमिशन ने पॅलेस्टाईन में लगभग ३ महीनों से अधिक समय काम किया और इस अवधि में सैंकड़ों संबंधितों के जबाब दर्ज़ करते हुए ५५ बैठकें कीं।

ज्यूधर्मियों ने स्व-रक्षा के लिए तैयार की गयीं स्व-सुरक्षा टुकड़ियाँ ‘हॅगाना’ को इन दंगों के उपलक्ष्य में शस्त्रसज्जित होने का अवसर मिला

पॅलेस्टाईन के अरब नेताओं का पॅलेस्टाईन-विभाजन को विरोध होने के कारण उन्होंने पील कमिशन की तरह ही इस वुडहेड कमिशन का भी बहिष्कार किया। वे पॅलेस्टाईन अखंडित रूप में ही चाहते थे और उसमें ज्यूधर्मियों का अस्तित्व ही नहीं चाहते थे।

लेकिन मूलतः जिन अरब-ज्यू दंगों की तहकिक़ात के लिए पील कमिशन नियुक्त किया गया था, उन दंगों के कारण अरबों का ही अधिक नुकसान हुआ दिखायी दे रहा था। अरब दंगेखोरों ने ज्यूधर्मियों पर हमलें करने के साथ साथ ब्रिटिशों पर भी हमले शुरू किये होने के कारण वे ब्रिटिशों के ग़ुस्से का कारण बन चुके थे। उसीमें तत्कालीन ग्रँड मुफ्ती अल-हुसैनी ने खुद के महत्त्व को बरक़रार रखने के लिए अपने अंतर्गत विरोधकों पर भी अरब दंगेखोरों को छोड़ा था। इस कारण भी कई अरबों की जानें चली गयीं। साथ ही, ब्रिटिशों के खिलाफ़ के संघर्ष में अरबों के कई स्थानिक नेता या तो मारे गये थे, जेल में डाले गये थे या फिर उन्हें पॅलेस्टाईन छोड़कर भाग जाना पड़ा था। इस कारण वहाँ का अरब समाज अब नेतृत्वहीन, निरुत्साहित और विभिन्न जमातियों में विभाजित ऐसा बचा था।

हॅगानाने जिस ‘इरगन झ्वाई ल्युमी’ इस सशस्त्र संगठन से सहयोग करते हुए दंगों में अरबों के खिलाफ़ ब्रिटिशों की सहायता की, उस इरगन का प्रचारकी पँफ्लेट

उल्टे, ज्यूधर्मियों में, डेव्हिड बेन-गुरियन के मज़बूत और दूरंदेशी नेतृत्व में, एकजुटता की और ‘अब चाहे जो भी हो, हमारे हक़ की भूमि को पाकर ही रहेंगे’ यह भावना अधिक ही प्रबल हुई थी। साथ ही, ज्यूधर्मियों ने निर्माण कीं हुईं स्व-रक्षा टुकड़ियाँ (‘सेल्फ-डिफेन्स युनिट्स’) ‘हॅगाना’ को इन दंगों के उपलक्ष्य में शस्त्रसज्जित होने का अवसर प्राप्त हुआ था। इन दंगों के दौरान हॅगाना ने, तब तक स्थापन हुए ‘इरगन झ्वाई ल्युमी’ इस सशस्त्र विद्रोहियों के गुट के साथ सहयोग करते हुए, इन दंगों में अरबों के खिलाफ़ ब्रिटीश सेना की सहायता की।

फिर भी ब्रिटीश पॅलेस्टाईनस्थित अरबों को, यानी कुल मिलाकर पूरे अरब जगत को ही दुखाने के लिए तैयार नहीं थे; क्योंकि तब तक जर्मनी में अपनी जड़ें मज़बूत किये हिटलर ने साम्राज्यविस्तार के कदम उठाने की शुरुआत की थी और इस कारण युरोप पर दूसरे विश्‍वयुद्ध के बादल मँडरा रहे थे। ऐसे हालातों में, पॅलेस्टाईन और पड़ोसी देशों के अरबों के ग़ुस्से का कारण बनना ब्रिटिशों के लिए बहुत ही महँगा साबित हो जाता। साथ ही, युद्ध के शुरू होने पर, पॅलेस्टाईन में अब निरन्तर ही चल रहे संघर्ष पर का प्रचंड खर्चा उठाना ब्रिटन के बस की बात नहीं थी, इस कारण भी ब्रिटिशों को कुछ भी करके वहाँ से जल्द से जल्द बाहर निकलना था।

वुडहेड कमिशन द्वारा सुझाये गए पॅलेस्टाईन के विभाजन की एक योजना

वुडहेड कमिशन ने हालाँकि पील कमिशन ने दिये हुए विभाजन के प्रस्ताव का तत्त्वतः स्वीकार किया था, लेकिन जिस पद्धति से वह पील कमिशन द्वारा सुझाया गया था, उस पद्धति को वुडहेड कमिशन ने ख़ारिज़ कर दिया। पील कमिशन ने जिस पद्धति से विभाजन सुझाया था, उसमें ज्यू-राज्यस्थित अरबों का स्थलांतरण बहुत बड़े पैमाने पर करना पड़नेवाला था। साथ ही, विभाजन होने से पहले ज्यूधर्मीय जो उद्योगव्यवसाय कर रहे थे, उसके जो फ़ायदे अरब नागरिकों को भी अपने आप ही मिल रहे थे, वे भी बन्द होनेवाले थे। इसलिए इस सुझाव को खारिज़ करते हुए यह आबादी के स्थलान्तरण का बहाना आगे किया गया।

अब वुडहेड कमिशन ने अपना हल घोषित किया; जिसमें ज्यू-राष्ट्र का आकार तत्कालीन कुल पॅलेस्टाईन प्रान्त के ५% इतना कम कर दिया गया और उसमें भी, ज्यू उद्योगधंधों के फ़ायदें अरब जनसंख्या को मिलते रहें इसलिए इन दो प्रस्तावित राष्ट्रों का, ब्रिटन के नेतृत्व में एकत्रित आर्थिक संघ (‘कॉमन इकॉनॉमिक युनियन’) बनाया जायें, ऐसी सूचना की गयी।

पील कमिशन ने अपने विभाजन-हल में ज्यूधर्मियों के लिए कम से कम २०% तो सुझाये थे; वुडहेड कमिशन ने तो वह संख्या ठेंठ ५% पर लायी। यानी पील कमिशन ने दिये हल से भी यह हल अन्याय्य होने के कारण ज्यूधर्मियों ने उसे ठुकरा दिया।

पॅलेस्टिनी अरबों को भी पॅलेस्टाईन विभाजन का कोई भी हल मान्य न होने के कारण और मुख्य रूप से, ‘स्वतंत्र ज्यू-राष्ट्र’ इस संकल्पना को ही मूलतः उनका विरोध होने के कारण उन्होंने भी उसे ठुकरा दिया।

ब्रिटीश सरकार ने भी, विभाजन का कोई भी प्रस्ताव दोनों पक्षों को मंज़ूर नहीं है, ऐसा घोषित कर, किसी भी प्रस्ताव पर अमल करने के आड़े कई राजकीय, प्रशासकीय और आर्थिक मुश्किलें आ रही हैं, ऐसा कहते हुए विभाजन को स्थगित कर दिया।

अब यह गतिरोध हटने का नाम ही नहीं ले रहा होने के कारण ब्रिटीश सरकार ने नवम्बर १९३८ में एक निवेदन जारी किया। ‘ब्रिटीश सरकार यह पॅलेस्टाईन का ब्रिटीश मँडेट जल्द से जल्द ख़त्म करना चाहती है और पॅलेस्टाईन में नयी स्थानिक सरकार सत्ता सँभालने तक ही ब्रिटन पॅलेस्टाईन पर नियंत्रण रखेगा’ ऐसा इस निवेदन में कहा गया था।

ब्रिटीश उपनिवेश-सचिव माल्कम मॅकडोनाल्ड ने १९३९ के फ़रवरी में अरब और ज्यूधर्मियों को लंडन में चर्चापरिषद के लिए आमंत्रित किया।

ब्रिटीश उपनिवेश-सचिव माल्कम मॅकडोनाल्ड ने तुरन्त ही एक मसौदा तयार कर, अरब तथा ज्यू प्रतिनिधिमंडलों को लंडन में चर्चापरिषद के लिए आमंत्रित किया। उसीके साथ ब्रिटीश सरकार ने यह भी अंतिम चेतावनी दी कि ‘यदि इस परिषद में सर्वमान्य हल नहीं निकला, तो ब्रिटीश सरकार स्वयं ही, उसे जो उचित लगें वह प्रस्ताव सामने रखकर उसपर अमल करना शुरू करेगी, जो दोनों पक्षों के लिए बंधनकारक होगा।’

‘लंडन कॉन्फरन्स ऑफ १९३९’ इस नाम से आगे जानी गयी यह चर्चापरिषद ७ फ़रवरी १९३९ को लंडनस्थित ‘सेंट जेम्स पॅलेस’ में शुरू होनेवाली थी।

अरब प्रतिनिधिमंडल में पॅलेस्टिनी अरबों के साथ ही – इजिप्त, इराक, सौदी अरेबिया, येमेन और ट्रान्सजॉर्डन इन, ब्रिटिशपरस्त पाँच अरब देशों के प्रतिनिधि भी होनेवाले थे; वहीं, ज्यूधर्मियों ने अपनी माँगों को आंतर्राष्ट्रीय वज़न प्राप्त हो इसलिए, ज्युईश एजन्सी ने चुने हुए स्थानिक ज्यूधर्मीय प्रतिनिधियों के साथ ही, विदेशों में रहनेवाले कुछ प्रभावशाली ज्यूधर्मियों को भी आमंत्रित किया था।

लेकिन सन १९३८ तक जर्मनी के साथ युद्ध होने की संभावना बढ़ी होने के कारण, ब्रिटीश सरकार उस दृष्टि से ही अपनी रणनीति निश्‍चित कर रही थी। अतः वे अरबों को दुखाने की संभावना बहुत ही कम थी।(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर