श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६३

‘मद्भक्ता यत्र गायंति’। तिष्ठें तेथे मी उन्निद्र स्थितीं।
सत्य करावया हे भगवदुक्ति। ऐसी प्रतीति दाविली।
(जहाँ पर मेरे भक्त नाम का गायन करते हैं, नाम का सदैव स्मरण करते हैं, वहाँ पर मैं सदैव रहता ही हूँ, यह भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है। साई रूप में अवतार धारण करने पर उस परमात्माने स्वयं की उक्ति पुन: एक बार अपने आचरण द्वारा सिद्ध कर दिखलायी।)

परमात्मा का नाम लेनेवाला चाहे फिर वह कोई भी क्यों न हो, कैसा भी हो, वह गरीब है कि धनवान, छोटा है या बड़ा इस प्रकार का कोई भी भेद उस परमात्मा को मान्य नहीं होता और हर एक मनुष्य के लिए वे इस बात को बारंबार सिद्ध करते रहते हैं। इसीलिए प्रल्हाद के सामने उम्र में छोटे रहनेवाले भक्त की खातिर भी वे परमात्मा नरसिंह स्वरूप में प्रकट होते ही हैं तथा हिरण्यकश्यपू जैसे उस राक्षस पिता का सर्वनाश कर देते हैं।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईजिस तरह परमात्मा के एवं किसी भी जीवात्मा के बीच उम्र, जात-पात इस प्रकार की कोई भी बात बाधा नही बनती बिलकुल वैसे ही किसी भी जीव की पहचान भी उसके बीच आने का मुद्दा कभी भी नहीं होता। क्योंकि वे एकमेव परमात्मा ही ऐसे हैं कि जो इस संपूर्ण विश्‍व के कारोबार का बिलकुल रत्ती-रत्ती (कण न कण) तक जानते हैं। ऐसी पहचान की ज़रूरत होती है मात्र हम मनुष्यों को ही। एक मनुष्य की दूसरे मनुष्य से पहचान उसका नाम, गाँव, रंगरूप से होते रहती है। मात्र वह परमेश्‍वर को नहीं पहचान पाता है। इसीलिए उसे परमात्मा की पहचान के लिए नामरूपी आसान साधन दिया गया होता है। क्योंकि मनुष्य परमात्मा की जो पहचान है, जो उसे करायी गई होती है, उसे अकसर भूलते रहता है। केवल एक परमात्मा ही ऐसे होते हैं जो कभी भी किसी की भी पहचान को नहीं भूलते हैं। श्रीसाईसच्चरित में बाबा बारंबार यही जताते रहते हैं। विस्मृति का शाप होनेवाले मानव योनि में जन्म लेकर आनेवाले मानवों के लिए मात्र यह अत्यन्त आवश्यक है कि जिस पल भी उस परमात्मा की पहचान होगी उसी क्षण असे परमात्मा के प्रति होनेवाली अपनी निष्ठा दृढ़ होने की दृष्टी से प्रयास आरंभ कर देना चाहिए। नाम एवं परमात्मा के प्रति होनेवाला प्रेम जिस तरह से समानरूप से होनेवाला प्रवास है, बिलकुल वैसे ही नाम एवं परमात्मा पर होनेवाली दृढ़ निष्ठा यह भी समानरूप में होनेवाला प्रवास है। मनुष्य जितना अधिकाधिक नाम लेता हैं उतने ही प्रमाण में उसका परमात्मा के प्रति होनेवाला प्रेम एवं दृढ़ निष्ठा की वृद्धि होने लगती है। इसीलिए हमें पता चलता हैं कि बाबा निरंतर नाम लेने के विषय में क्यों कहते हैं, परमात्मा के प्रति वृद्धिगत होनेवाला प्रेम एवं दृढ़ होते जानेवाली निष्ठा ये अनुभवजन्य बातें हैं। और यह अनुभव हर किसी को स्वयं ही लेना होता है। मात्र जैसे-जैसे यह अनुभव आने लगता है वैसे ही परमात्मा के प्रति यह अनन्य भाव भी दृढ़ होने लगता है कि ‘इस परमात्मा के अलावा और किसी का भी आधार नहीं है।’

अर्थात केवल मुख से लिया जानेवाला परमात्मा का नाम मनुष्य के लिए क्या कुछ नहीं करता है? बिलकुल हर एक मनुष्य का प्रवास ‘अनन्यता’ तक होता रहता है।

रोहिला यहाँ पर मनुष्य में होनेवाली भक्ति एवं श्रद्धा का प्रतीक है और उसकी पत्नी मनुष्य में होनेवाली विकल्पात्मक वृत्ति (विकल्प वृत्ति) का प्रतीक है। क्योंकि मनुष्य में उसके मन के कारण ही संकल्प एवं विकल्प इस प्रकार की दो वृत्तियाँ होती हैं। श्रद्धा एवं भक्ति अकसर मनुष्य का संकल्प होता है। वही तर्क-कुतर्क ये उसके विकल्प होते हैं।

इसीलिए श्रीसाईनाथ जैसे परमात्मा के मिलते ही भक्ति एवं श्रद्धा का संकल्प उसके समीप ही रहता है। वह परमात्मा के मिलने पर भी तर्क-कुतर्क का विकल्प पुन: पुन: उसके करीब जाकर उसे परखने की कोशिश करते हैं। भक्ति एवं श्रद्धा की भी परवाह नहीं करते और फिर भक्ति एवं श्रद्धा का संकल्प उसके सिर पर चढ़कर चिल्लाने लगता है। जिससे ये कार्यरत हो चुका विकल्प अपना यह कार्य छोड़ देगा।

विकल्प एवं संकल्प एक ही मन की दो वृत्तियाँ हैं। जैसे-जैसे संकल्प दृढ़ होने लगता है वैसे-वैसे ही विकल्प अभिभूत हो जाता है अर्थात दबने लगता है। इसीलिए बाबा कहते हैं कि रोहिला जब चिल्लाता है तब वह रोहिली भाग जाती है, बाबा के पास आने की उसकी कोशिश को रोक देती है। इसीलिए बाबा उसे दुर्बुद्धी कहते हैं। क्योंकि एक बार यदि विकल्प मनुष्य के जीवन में अपना घर बना लेता है फिर वह विकल्प जैसे-जैसे बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे वह मनुष्य को बर्बादी की ओर घसीटता चला जाता है (रसातळाला नेत राहतो)।

मनुष्य के शरीर का उसके मन पर एवं उसके मन का शरीर पर प्रभाव पड़ता ही है। इसीलिए अधिकतर मनुष्य को होनेवाला रोग चाहे वह कोई भी हो वह शरीर एवं मन दोनों को भी प्रभावित करता ही है। इसीलिए फिर मन की विकल्पवृत्ति मन तक ही मर्यादित न रहकर प्राण (शरीर) एवं बद्धी को भी प्रभावित करती है। अर्थात इन तीनों पुरों में अशुद्धि निर्माण करती है। इसीलिए बाबा कहते हैं –

उसके चिल्लाने पर वह दूर भाग जाती है और त्रिशुद्ध होती है। (तो ओरडतां ती पळे त्रिशुद्धी।)

जब मन की संकल्पवृत्ति इतनी प्रबल हो जाती है, यहाँ पर रोहिले का उच्च स्वर में चिल्लाना अर्थात मन के संकल्पवृत्ति का प्रबल होना और जैसे ही यह संकल्पवृत्ति प्रबल होती है। वैसे-वैसे ही यह विकल्पवृत्ति अधिकाधिक दुर्बल होने लगती है। अर्थात वह रोहिली भागना शुरु कर देती है। अर्थात विकल्प के विनाश के साथ ही अशुद्ध हो चुके ये तीनों पुर पुन: शुद्ध हो जाते हैं।

ऐसी इस श्रद्धा एवं भक्ति की, मनुष्य की संकल्पवृत्ति बाबा को अति प्रिय होती है। और उससे संबंधित शिकायत की और बाबा अनसुना कर देते हैं।

कहते व्यर्थ ही क्यों रोहिले की शिकायत। भजन की चाह जिसके मन में।
(म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा। भजनीं चाळा जयातें।)

मनुष्य की यह भक्ति कभी-कभी उलटी-सीधी, भोली-भाली ही होती है। उसका स्वरूप चाहे जैसा भी हो परन्तु उसमें आदर होता है केवल परमात्मा के प्रति ही।

दिखने में रोहिला पागल फकीर। परन्तु बाबा के प्रति आदर भाव अति।
(दिसाया रोहिला वेडा पीर। परी बाबांवरी अत्यंत आदर।)

भक्ति चाहे उलटी सीधी हो अथवा भोली-भाली परन्तु उसके पिछा छिपा भाव मात्र शुद्ध होना चाहिए। जो बाबा को सदैव प्रिय ही होता है और इसीलिए बाबा को रोहिला प्रिय था।