श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५७

तृतीय अध्याय में हेमाडपंत अब रोहिले की कथा के बारे में बताना आरंभ करते हैं। आरंभ में वे कहते हैं,

शिरडी में आया एक रोहिला। वह भी बाबा के गुणों से मोहित हुआ।
वहीं पर काफ़ी दिनों तक रह। प्रेम लुटाता रहा बाबा पर॥
(शिरडीस आला एक रोहिला। तोही बाबांचे गुणांसी मोहिला। तेथेंचि बहुत दिन राहिला। प्रेमें वाहिला बाबांसी॥)

शिरडी में एक रोहिला आया और वह बाबा के गुणों से मोहित होकर वहीं शिरडी में ही काफ़ी अर्से तक स्थिर हो गया। यह रोहिला देखने में कैसा था, इस बात का वर्णन भी आगे हेमाडपंत करते हैं,

शरीर से दृष्ट-पुष्ट। स्वैरवृत्ति, नहीं मानता था किसी को।
बदन पर केवल ढीली-ढीली लम्बी कफनी। सीधे मस्जीद में ही आकर रहने लगा॥
(शरीरें पुष्ट जैसा हेला। स्वैरवर्ती न जुमानी कोणाला। फक्त कफनी पायघोळ अंगाला। येऊनि राहिला मशिदींत।)

साँड के समान पुष्ट, इस प्रकार से हेमाडपंत रोहिला का वर्णन करते हैं। संक्षेप में देखा जाए तो बिलकुल मजबूत शरीरयष्टि का यह रोहिला था और उसकी वृत्ति कैसी थी तो अत्यंत स्वैर। इस प्रकार से उसका वर्णन किया गयाथा। इसी स्वैराचारीवृत्ति के कारण एवं पुष्ट शरीर रचना के कारण उसे किसी की भी परवाह नहीं थी। उसने अपने बदन पर केवल एक लंबी कफनी पहन रखी थी और उसने सीधे मस्जीद में आकर अपना ठाव-ठिकाणा कर लिया था।

अब आगे हेमाडपंत उस रोहिले की मुखवृत्ति का वर्णन करते हैं । –

दिवस हो अथवा निशाकाल। मस्जिद में हो या चावड़ी में।
कलम पढ़ता था उच्च स्वर में। अत्यन्त आवेशपूर्ण स्वच्छंद आवाज में॥
निसर्गप्रदत्त रोबदार आवाज। ‘अल्ल हो अकबर’ नामगजर।
कलमें पढ़ता था आनंदनिर्भर। नित्य निरंतर रोहिला॥
(दिवस असो वा निशी। मशिदीसी वा चावडीसी। कलमें पढे उंच स्वरेंसीं। अति आवेशीं स्वच्छंद॥ निसर्गदत्त घर्घर स्वर। ‘अल्ला हो अकबर’ नामगजर। कलमे पढे आनंदनिर्भर। नित्य निरंतर रोहिला॥)

दिन हो अथवा रात, मस्जीद में अथवा चावड़ी में यह रोहिला ऊँची जोरदार आवाज़ में अत्यन्त आवेश में आकर बिलकुल स्वच्छंद रूप में यह रोहिला कलमों का पठन करता था। उसकी आवाज मूलत: जोरदार ही थी और ऐसी ही जोरदार आवाज में वह निरंतर नाम गजर करता रहता था। इसी तरह दिन अथवा रात्रि के बेला में रोहिला मस्जिद में या चावड़ी में आनंदपूर्वक कलमें पढ़ता रहता था।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईमात्र उसके इस वर्तन से शिरडी गाँव के लोग मात्र त्रस्त हो गए थे। मुख्य तौर पर उस रोहिले को किसी की भी परवाह नहीं थी। लोग दिनभर खेतों में, बनों में कष्ट करते थे और थक जाने पर रात्रि में सुख की (निद्रा) निंद मिल जाए यहीं उनकी अपेक्षा थी। परन्तु रोहिले के इस वर्तन के कारण लोगों को सुख की शांत निंद (निद्रा) नहीं मिल पाती थी। क्योंकि रात हो या किसी भी प्रहर में जोरदार आवाज में नामगजर करने लगता था। इससे लोगों की निंद टूट जाती थी अंतत: उसके इस वर्तन से लोग परेशान हो गए, ऊब गए, क्योंकि इस तरह से निंद (निद्रा) न मिल पाने के कारण इसका परिणाम उनके कामों पर भी होने लगा। परन्तु इतना सब हो जाने पर भी बाबा रोहिले से कुछ भी नहीं कहते थे। लोगों ने यह अनुमान लगाया कि बाबा को रोहिले की आवाज से कोई फर्क नहीं पड़ता होगा परन्तु हमें तो फर्क पड़ता है। हमें तकलीफ होती है, इसीलिए लोग उस रोहिले पर कुपित हो गए। बाबा भी रोहिले से कुछ भी नहीं बोलते और हम भी कुछ नहीं कुछ कर सकते हैं इस असमंजस में लोग फँसे हुए थे। अब मात्र और अधिक वे बर्दाश्त भी नहीं कर सकते थे पर करे भी तों क्या यही परेशानी उन्हें सता रही थी।

पहले हीस्वच्छंद एवं स्वैर वृत्ति का रोहिला अपने मन में आये वैसा व्यवहार करता था। बाबा भी उससे कुछ नहीं कहते थे इसीलिए वह और भी अधिक मनमानी हो गया था। और तो और बाबा भी मुझसे कुछ नहीं कहते हैं इसीलिए उसमें घमंड, गर्व, अहंकार भर गया था। उसमें उत्पन्न हुए इस गर्व, अहंकार से रोहिला इतना अधिक मनमानी हो गया (एवढा चढला) कि वह उडंदता से (बेफामपणे) पेश आने लगा, लोगों को भी जो मन में आए वह बोलने लगा। उसके इस वर्तन (बर्ताव) से पहले तो गाँव के कुछ लोग ही परेशान थे पर अब पूरा शिरडी गाँव ही उसके विरोध में खड़ा हो गया।

आख़िर इस तरह लोग कब तक बर्दाश्त करते। फिर थक-हारकर वे सभी अपने रक्षणकर्ता अर्थात श्रीसाईनाथ की शरण में गए। आखिर बाबा को भले ही उसके इस वर्तन से कोई फर्क न पड़ता हो पर हमें बताना ही होगा। ऐसा उन गाँव के लोगों ने निश्‍चय किया और साईनाथ की शरण में जाकर, उनके समक्ष अपनी व्यथा व्यक्त की। जिससे बाबा इस रोहिले के बारे में कुछ ना कुछ बंदोबस्त तो ज़रूर करेंगे।

साईनाथ ये अपने एकमेव रक्षक है यह जाननेवाले ग्रामवासियोंने बाबा के समक्ष जाकर उसके वर्तन के बारे में शिकायत की परन्तु बाबा ने उनकी शिकायत की ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिय उलटे ग्रामवासियों से ही कहा कि तुम लोग उस रोहिले को तकलीफ मत दो। वह मुझे काफ़ी प्रिय लगता है। यह कहकर बाबा ने ग्रामवासियों की शिकायत को अनदेखा कर दिया।