श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१३)

काल के भी जबड़े में से।
निजभक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा।
करते ही केवल मत्कथाश्रवण
(मेरी कथा का श्रवण)।
रोगनिरसन भी हो जायेगा॥

इस गवाही में यह विदित होता है कि साईबाबा की काल पर भी सत्ता है। काल की सत्ता तो सभी पर होती है, फिर भी काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप साईनाथ हमें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि काल के जबड़े में फँसे हुए अपने भक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा अर्थात उसकी रक्षा करूँगा। मृत्यु के जबड़े में फँसे हुए श्रद्धावान को छुड़ाने का सामर्थ्य केवल एकमात्र सद्गुरुतत्त्व के पास ही होता है, अन्य किसी के भी पास नहीं होता।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई शिवात्मा भी काल के अधिपत्य में ही रहते हैं और उनके लिए भी जन्म-मृत्यु का बंधन तो होता ही है। तो फिर अन्य देवताओं की क्या कथा? केवल एकमात्र ये परमात्मा ही काल एवं दिशा से परे हैं। काल एवं दिशा पर केवल उन्हीं की सत्ता चलती है। ये साईनाथ हमारी रक्षा करने के लिए सर्वथा समर्थ तो हैं ही, परन्तु यह हमारे जीवन में सच होने के लिए, ‘क्या हम साईनाथ के ‘निजभक्त’ हैं’, इस बात का हमें विचार करना आवश्यक है।

निजभक्त अर्थात श्रद्धावान, निष्ठावान। प्रेम, सेवा, शरण की सहायता से साईनाथ की अनन्य भक्ति करनेवाला निष्ठावान अर्थात निजभक्त।

गुरुचरित्र ग्रन्थ के चौदहवे अध्याय में सायंदेव की कथा पढ़ते समय हमें, ‘निजभक्त यानी क्या’ इस बात का पता चलता है। सायंदेव को सद्गुरुनाथ सच में मौत के जबड़े में से बाहर खींच लेते हैं, अपमृत्यु से उनकी रक्षा करते हैं। सायंदेव जब यवन के पास से वापस आकर सद्गुरु से मिलते हैं, उस समय सद्गुरु उसे कहते हैं कि अब हम दक्षिण की ओर तीर्थयात्रा के लिए जा रहे हैं। यह सुनते ही सायंदेव गुरु के विरह से व्याकुल होकर उनसे कहता है –

सुनकर श्रीगुरु के वचन।
विनति करते कर जोड़।
मैं अब आपके चरणों को नहीं छोडूँगा।
मैं भी आपके साथ चलूँगा॥

आपके चरणों को देखे बगैर।
रह न सकूँगा पल भर भी।
हे संसारसागर तारणहार।
आप ही हैं कृपासिंधु॥

सद्गुरु के मुख से दक्षिण की ओर प्रस्थान करने की बात सुनकर सायंदेव सद्गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर विनति करते हुए कहते हैं, ‘‘अब मैं आपके चरणों को नहीं छोडूँगा, मैं भी आपके साथ आऊँ गा। आपके चरणों के बगैर मैं एक पल भी नहीं रह सकता हूँ। हे सद्गुरुनाथ, मैं जान चुका हूँ कि इस भवसागर से भक्तों को तारकर पार लगानेवाले कृपासिंधु आप ही हैं।’’

सायंदेव केवल इतना ही कहकर चुप नहीं रहा, बल्कि –

साथ आऊँ गा निश्‍चित ही।
यह कहकर चरणों में लेट गया॥

सायंदेव ने सद्गुरु के चरण मजबूती के साथ पकड़ लिये। यहीं पर हमें इस बात का पता चल जाता है कि निजभक्त कैसा होता है। सायंदेव का उच्चारण, कृति एवं आकृति कैसी होती है यह जानने से ‘निजभक्त कैसा होता है’ इस बात का पता हमें चल जाता है। ‘चाहे जो भी हो जाए परन्तु सद्गुरु-चरण न छोड़ना, एक पल के लिए भी सद्गुरु-चरणों के बगैर न रहना, ‘केवल यही एक सद्गुरु मुझे भवसागर के पार ले जानेवाले हैं, मेरा समुद्धार करनेवाले हैं’, इस बात का पूरा विश्‍वास होना, सदैव सद्गुरु के सामीप्य का आकर्षण बना रहना और साथ ही सदैव सद्गुरु सेवा हेतु सक्रिय रहना‘ यही निजभक्त की आकृति है।

केवल मुख से बड़ी-बड़ी बातें करनेवाला निजभक्त हो ही नहीं सकता, बल्कि इसके लिए कृति करना भी उतना ही अधिक महत्त्व रखता है। सायंदेव ‘निजभक्त’ हैं इस बात की गवाही स्वयं सद्गुरु ही सायंदेव को देते हैं, वह भी केवल इसी जन्म के लिए ही नहीं, बल्कि जन्मजन्मांतर के लिए।

निजभक्त मेरे तुम रहोगे।
निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी।
अखिल अभीष्ट तुम पाओगे।
बढ़ेगा वंश तुम्हारा बहुत आगे॥

गुरुचरित्र के चौदहवें अध्याय को ‘मेरुमणि’ कहने का तात्पर्य यही है कि इस अध्याय में निजभक्त कैसा होता है, इस बात का सुस्पष्ट बोध किया गया है। सायंदेव का उच्चारण, कृति एवं आकृति का अध्ययन करने पर हमें भी सद्गुरु दत्तात्रेय का निजभक्त बनने की दिशा प्राप्त होती है। इस अध्याय के सायंदेव के आचरण का हमें बारिकी के साथ अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि इसी से हमें इस बात का ज्ञान सहज ही हो जाता है कि निजभक्त को कैसा होना चाहिए।

इसीलिए साईनाथ यहाँ पर इस पंक्ति में ‘निजभक्त’ इस शब्द का उपयोग करते हैं। हमें काल के जबड़े में से भी खींचकर निकालने के लिए हमारे ये साईनाथ समर्थ हैं ही। पर क्या हम उनके निजभक्त हैं? यह प्रश्‍न स्वयं हमें ही अपने-आप से पूछना चाहिए। आगे चलकर बाबा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं।

करते ही केवल मत्कथाश्रवण।
रोगनिरसन हो जायेगा॥

करते ही ‘केवल’ मत्कथाश्रवण इसके दो अर्थ हैं –

१) बाबा की कथाओं का महज़ यदि श्रवण भी किया जाए, तब भी केवल श्रवण करने से भी रोग का निरसन हो जायेगा।

२) ‘केवल’ बाबा की ही कथाओं का श्रवण करने से रोगनिरसन हो जायेगा।

यहाँ पर दोनों ही अर्थ हमारे लिए काफी महत्त्व रखते हैं। प्रथम पंक्ति के अर्थ के अनुसार हमें यह विश्‍वास हो जाता है कि बाबा की कथाओं का केवल श्रवण भी कितना अमोघ है। इस साईनाथ की कथाओं का केवल श्रवण भी यदि हम करते हैं, तब भी रोगनिरसन हो जाता है।

इसका अर्थ बिलकुल भी यह नहीं है कि यदि बुखार आ जाता है तब डॉक्टर से दवा न लेकर केवल बाबा की कथाओं का श्रवण ही करूँगा। डॉक्टर की दवा के साथ-साथ हमें बाबा की कथाओं का श्रवण भी करना है। हमारी भक्ति यदि संत मीराबाई, संत तुलसीदाजी के समान है तो बात और है। फिर हम यह मानकर चल सकते हैं कि हम बाबा के कथाश्रवण से ही ठीक हो जायेंगे। परन्तु क्या हमारी भक्ति में इतनी सच्चाई और गहराई है? नहीं। हम सामान्य मानव हैं। फिर हमें व्यर्थ ही बड़ी-बड़ी बातें करने की आवश्यकता नहीं है।

दूसरा अर्थ हमें यह बतलाता है कि हमें केवल साईनाथ की ही कथाओं का श्रवण करना चाहिए, अन्य किसी की भी कथाओं का नहीं करना चाहिए। हमें तो बस स्वयं अपनी ही ‘कथाओं’ को सुनने में ‘रस’ रहता है कि मैं कितना ‘ग्रेट’ हूँ, ‘मैंने कितना बड़ा काम चुटकी बजाते ही कर दिखलाया, जो कोई भी कर नहीं सकता था’, ‘मैं था तभी यह सब हो सका’ आदि बातें। स्वयं के बड़प्पन की कथा सुनने में हमारी रुचि होती है। परन्तु यहाँ पर हमें यह जानना चाहिए कि केवल साईनाथ की कथाओं का श्रवण ही रोगनिरसन करनेवाला है; ‘मैं’ पन की कथाओं से रोग बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं।

यहाँ पर, ‘रोगनिरसन होगा’ यह बाबा की गवाही ‘त्रिविध रोगनिरसन होगा’ यह बता रही है।

१) शारीरिक बीमारी
२) मानसिक बीमारी
३) आध्यात्मिक बीमारी

बाबा की कथाओं के श्रवण से शारीरिक बीमारी तो ठीक होगी ही, परन्तु इसके साथ ही ‘मैं’ पन की यानी अहंकार की बीमारी, प्रारब्धरूपी बीमारी, षड्रिपुरूपी बीमारी इस प्रकार की सभी बीमारियाँ ठीक होती ही हैं और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि भवरोग का भी निरसन होता है। इस भवरोग का निरसन केवल इस साईनाथ की कथाओं के श्रवण से ही होता है, इस बात का ध्यान हमें सदैव रखना चाहिए।