श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-२ (भाग-५७)

‘हेमाडपंत’ इस नामकरण के द्वारा वाद-विवाद से बाबा ने जिस तरह हेमाडपंत को दूर किया उसी तरह जिस विषय पर विवाद उठ खड़ा हुआ था, उसका भी समाधान बाबा ने किया। ‘गुरु की आवश्यकता ही क्या है? गुरु की आवश्यकता है या नहीं?’ इस विषय पर उनका भाटे के साथ वाद-विवाद छिड़ा हुआ था।

आते ही शिरडी में पहले ही दिन। बालासाहेब भाटे के साथ।
छिड़ गया वाद-विवाद। गुरु आखिर क्यों चाहिए॥

किसी वृक्ष के नीचे उसकी छाया में लेटकर उस वृक्ष के फल खाना और कुछ ही पल में ‘वृक्ष की क्या आवश्यकता है’ इस विषय पर किसी के साथ वाद-विवाद करने लगना, यह अनुचित है। मानों ऐसा ही कुछ यहाँ पर घटित हुआ था। हेमाडपंत ने शिरडी में प्रवेश करते ही, पहली मुलाकात में ही साई की चरणधूलि में लोटांगण किया, साई का इतना सुंदर दर्शन उन्हें हुआ। इसके पश्‍चात् कुछ ही समय में ‘गुरु की आवश्यकता ही क्या’ इस विषय पर हेमाडपंत की श्री. भाटे के साथ बहस छिड़ गयी। हेमाडपंत के मन में इससे पहले साईनाथ के प्रति ज़रा सी भी शंका नहीं थी, पहली मुलाकात में ही साईचरणों में उनकी श्रद्धा दृढ़ हो चुकी थी। ‘साईनाथ ही साक्षात् ईश्‍वर हैं, सद्गुरुतत्व हैं’ इस बारे में उन्हें पूरा विश्‍वास हो चुका था। उनका केवल यहीं मानना था कि भक्त हाथ पर हाथ रखे बैठा रहे और सद्गुरु ही सब कुछ करते रहेंगे, ऐसा नहीं होता है। सब कुछ गुरु पर छोड़कर निष्क्रिय रूप में बैठे रहना उन्हें ठीक नहीं लग रहा था।

वाद-विवाद

हर एक मनुष्य स्वयं ही स्वयं के उद्धार और विनाश का कारण बनते रहता है, इस स्मृतिवचन को दृढ़तापूर्वक हेमाडपंत प्रस्तुत कर रहे थे। भाटे भी ‘सद्गुरु के बिना देवयान पथ पर एक कदम तक चलना आसान नहीं है’ यह कह रहे थे यानी वे दोनों अपने-अपने तरीके से ठीक ही कह रहे थे। अंतर था तो बस उसे भली-भाँति समझाने का। परन्तु वे दोनों जैसे सिक्के के एक ही पहलू पर विचार कर रहे थे और वे दोनों ही अपने पक्ष पर ज़ोर दे रहे थे। बिलकुल सिक्के के दोनों पहलुओं की तरह एक का कहना था छापा ही सिक्का है, वहीं, दूसरा कह रहा था कि काँटा ही सिक्का है। एक ने छापे के दूसरे पहलू को नहीं देखा तो दूसरे ने काँटे के पहलू को। यदि वे दोनों अपने अहंकार को छोड़कर दोनों पहलुओं को समझकर देखते तो शायद वाद-विवाद की नौबत ही नहीं आती, क्योंकि सच्चाई समझ लेने पर बात अपने आप ही स्पष्ट हो जाती।

पूरे के पूरे सिक्के को देखे बिना ही बगैर सोचे-समझे कदम उ़ठाना यानी वाद-विवाद के झमेले में फँस जाना, यह अकसर हमारे जीवन में भी यही होता है, यही हेमाडपंत का कहना है। आधे-अधूरे ज्ञान के अहंकार में आकर हम भी इसी प्रकार के वाद-विवाद में फँस जाते हैं और होता भी यही है कि ‘मैं जो कहता हूँ वही सच है’ इस पक्ष को लेकर हम बहस करते हैं।

होकर व्यर्थ ही घमंड से चूर। बहस करना है सरासर गलत।
यह बताकर साई ने मेरी आँखें खोल दीं। समय पर मुझे सावधान करके॥

हेमाडपंत यहाँ पर हमसे यह कह रहे हैं कि व्यर्थ ही घमंड से चूर होकर यानी सिक्के के एक पहलू को ही देखकर यह मान लेना कि मैं सब कुछ जान चुका हूँ, सिक्के के उसी एक ही पहलू के आधार पर उसे ही पूरा सिक्का समझ कर मैं फनफनाने लगता हूँ, वाद-विवाद छेड़ देता हूँ। मेरा ज्ञान यदि अधूरा है, तो मेरा निरीक्षण भी अधूरा ही होगा और इसी कारण मेरा निर्णय भी गलत ही है। आधे ज्ञान को पूरा ज्ञान मानकर यदि हम वाद-विवाद करते हैं तो वह सर्वथा गलत ही है।

मूलत: देखा जाये तो मैंने अपनी निरीक्षण करनेवाली दृष्टि को आधे पर ही बंद कर दी है और इसी कारण मैं पूर्णत: निरीक्षण नहीं कर सकता हूँ। इसीलिए हेमाडपंत यहाँ पर कहते हैं – उन्होंने मेरी आँखें खोल दीं। समय पर सावधान करके आँखें खोल देना अर्थात मेरी दृष्टि का, समझ का विकास किया, जिससे मैं पूर्ण विकसित दृष्टि से समग्र निरीक्षण कर सकूँ। समग्र निरीक्षण से समग्र ज्ञान प्राप्त होगा, पूरा का पूरा सिक्का हम देख सकेंगे और इससे होगा यह कि हम भली-भाँति निर्णय कर पायेंगे। इसके पश्‍चात् सिक्के के दोनों पहलुओं पर विचार करने पर वाद-विवाद का सवाल ही कहाँ पैदा होगा!

बहुत बार वाद-विवाद का कारण रहता है – कर्म के अटल सिद्धांत के बारे में रहनेवाला अधूरा ज्ञान। यही कारण होता है हमारे बहस करने का। कर्म का अटल सिद्धांत पूर्ण सत्य है और इसके अनुसार हर किसी को अपना भोग तो भुगतना ही है, यह तो इस सिद्धांत का एक पहलू हो गया। जिस परमपिता परमेश्‍वर ने इस कर्म के अटल सिद्धांत को विश्‍व-संचालन के हेतु बनाया है, वे जिस तरह न्यायी हैं, उसी तरह वे अकारण कारुण्य के निधि एवं क्षमाशीलता के महामेरू हैं। जो अपनी गलती को, गुनाह को कबूल करता है और इसके प्रति जो पश्‍चात्ताप करता है, अपनी गलती का प्रायश्‍चित करने की तैयारी रखता है, अपने आप को सुधारने की इच्छा रखता है और इसी इच्छा के साथ वह यदि परमात्मा के भक्तिमार्ग पर चलने की इच्छा रखता है, उसके लिए वे न्यायी ईश्‍वर, वे क्षमासागर क्षमावान हैं। ये साईनाथ तो इतने दयालु हैं कि समय आने पर वे अपने भक्तों के प्रारब्ध के भोग को अपने पर ले लेते हैं। इसीलिए परमात्मा के न्यायी एवं क्षमावान इन दोनों स्वरूपों को जानना यही सिक्के के दोनों पहलुओं पर भली-भाँति विचार करना है। कर्म के अटल सिद्धांत के साथ साथ परमात्मा के क्षमाशील स्वरूप को जानना यह पूर्ण रूप से जानना है।

मनुष्य चाहे कितना भी सोच ले कि वह सदैव पवित्र शुद्ध भाव, निर्दोष बना रहेगा परन्तु कर्म में कहीं न कहीं, कोई न कोई त्रुटि रह ही है। हर एक बात की उचितता-अनुचितता का लेखा-जोखा मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार निश्‍चित नहीं कर सकता है। कई बार किसी संदर्भ को सही मानकर लिया गया निर्णय कुछ समय पश्‍चात् अनुचित भी सिद्ध होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मस्वातंत्र्य हर किसी के पास होता है, फिर भी कर्मस्वातंत्र्य का उचित उपयोग कैसे करना है, इस बात का निर्णय लेने के लिए मानवी बुद्धि कभी-कभी कम पड़ जाती है। इसीलिए जो मार्ग हम ठीक से नहीं जानते हैं, उस मार्ग पर हमें प्रेमप्रवास करने के लिए संगी-साथी की ज़रूरत पड़ती ही है। और ईश्‍वर हमारे लिए परिश्रम करने को तैयार ही रहते हैं। ऐसे में यदि हम कहें कि हमें उनकी ज़रूरत ही क्या है? तो यह सर्वथा गलत ही है।

सद्गुरु की हमें ज़रूरत है, वह इसी क्षमा के लिए, इस प्रेमप्रवास के लिए, उचित आचरण के अनुसार सुख प्राप्ति के लिए और साथ ही अपना स्वयं का समग्र विकास करने के लिए।

हेमाडपंत का ‘हेमाडपंत’ यह नामकरण करके साईनाथ ने यह साबित कर दिया कि मनुष्य की क्षमता की एक सीमा होती है और वह स्वयं की इस शक्ति के बल पर एक विशिष्ट परीधि तक ही प्रगति कर सकता है, ज्ञान हासिल कर सकता है, लेकिन मनुष्य के द्वारा प्राप्त किये गये इस ज्ञान का प्रान्त बहुत ही अल्प होता है। साठे वाडा में होनेवाला वाद-विवाद मस्ज़ीद में बैठा कोई मनुष्य भला कैसे सुन सकता है? क्योंकि यह बात उसकी क्षमता के बाहर की बात है। इसी तरह मनुष्य के ज्ञान का प्रान्त काफ़ी सीमित है। परन्तु परमात्मा सर्वज्ञानी एवं हर किसी को समय-समय पर सहकार्य एवं मार्गदर्शन करते हैं और इसीलिए मुझे उनकी आवश्यकता है। परमात्मा को मेरी कोई ज़रूरत नहीं है, मुझे उनकी ज़रूरत है। हमें यहाँ पर यही बात ध्यान में रखनी चाहिए कि मुझे ही सद्गुरु श्रीसाईनाथ की ज़रूरत है; उन्हें मेरी तो क्या किसी की भी ज़रूरत नहीं है, वे स्वयंपूर्ण, सर्वसमर्थ हैं।