श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-१२)

मेरा नाम मेरी ही भक्ति। मेरा बस्ता मेरी ही पोथी।
मेरा ध्यान अक्षय चित्त में। विषयस्फूर्ति कैसे वहाँ॥

श्रद्धावान की इच्छा यही रहती है कि ‘साई मेरे और मैं साई का हो जाऊँ’। लेकिन यह होने के लिए जो पाँच बातें महत्त्व रखती हैं, उन्हीं से संबंधित अध्ययन हम कर रहे हैं। हमने भगवान का नाम एवं भगवान की उपासना एवं सेवा इन दो मुद्दों पर विचार किया। इसके साथ ही सामूहिक उपासना एवं सेवा का महत्त्व भी हमने जान लिया। ये विठ्ठल उन वारकरियों (नियमित रूप से भजन-कीर्तन करते हुए पंढरपुर की पैदल यात्रा करनेवाले और विठ्ठल ही जिनके जीवन का केन्द्र हैं ऐसे यात्रियों) के साथ ही रम जाते हैं, वह इस सामूहिक उपासना के ही कारण।

‘यात्रा’ (वारी) यह विठ्ठलभक्त यात्रियों की सामूहिक उपासना ही है और इस सामूहिक उपासना का महत्त्व जानकर ही संतों ने इस यात्रा का आरंभ किया। प्रारब्ध को मात देने वाले, अहंकार पर वार करनेवाली यह ‘वारी’ है और यही इस यात्रा की यानी वारी की व्याख्या है। जब हम सामूहिक उपासना करते हैं, सेवा करते हैं, इससे हमारे प्रारब्ध पर, अहंकार पर, दुर्गुणों पर, असुरों पर सहज ही वार होते रहता है और फिर ऐसी अवस्था में प्रतिदिन ‘गुरुवार’ ही होता है, सद्गुरु साईनाथ का ही ‘वार’ होता है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई व्यक्तिगत उपासना एवं सेवा मार्ग का अवलंबन कर प्रारब्ध पर मात करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है और समय भी अधिक लगता है, इसके अलावा इस एकाकी राह में का़ङ्गी संकटों का भी सामना करना पड़ता है। हम सामान्य मनुष्य हैं, हमें अपनी क्षमता का भी पता होता ही है और इसीलिए अपने प्रारब्ध को मात देने के लिए सामूहिक उपासना एवं सेवा करना यही हमारे लिए सही मायने में ‘गुरुवार’ होता है। गुरुगुणों का, गुरुतेज़ का वार हम हमारे प्रारब्ध पर, हमारे अहंकार पर करते हैं। गुरुतेज़ का दुष्प्रारब्ध पर किया गया वार ही ‘गुरुवार’ है और यह सामूहिक उपासना एवं सेवा के साथ ही हमारे जीवन में आता है और इसके आने से हमारे जीवन का हर दिन गुरुवार ही बन जाता है।

हम जब सामूहिक उपासना एवं सेवा करते हैं, तब हम सब के प्रारब्ध पर वार होते ही रहता है और उतनी ही मात्रा में हमारे दु:ख-भोग नष्ट होते रहते हैं, फिर चाहे मैं कितना भी पापी क्यों न रहूँ, परन्तु सामूहिक उपासना एवं सेवा में जब मैं सहभागी होता हूँ, उस वक्त ‘मैं’ अपने प्रारब्ध पर वार नहीं करता हूँ बल्कि मेरे भगवान ही मेरे प्रारब्ध का नाश करते रहते हैं। मैं जब अधिक से अधिक, सामूहिक उपासना एवं सेवा में सहभागी होता हूँ, उतनी ही अधिक से अधिक उत्कटता के साथ में सक्रिय रहूँगा। इससे मैं अधिकाधिक हरिकृपा का स्वीकार करके अपने प्रारब्ध भोग को नष्ट करता रहता हूँ।

वैसे देखा जाए तो मैं यदि अकेले ही उपासना एवं सेवामार्ग से जाने लगता हूँ तो मैं अकेले ही अपनी क्षमता के अनुसार उपासना सेवा करते रहने से मेरे प्रारब्ध का भोग हलका होने की क्रिया धीरे-धीरे होते रहती है, परन्तु वहीं जब मैं सामूहिक उपासना एवं सेवा में सहभागी होता हूँ तो उस समय हम सभी लोगों के प्रारब्ध का नाश होने की क्रिया द्रुतगति (काफ़ी तेज़ी) से होती रहती है। वारीयात्रा करनेवाला यात्री जिस तरह बगैर थके अपने भगवान का सामीप्य प्राप्त कर ही लेता है बिलकुल वैसे ही सामूहिक उपासना एवं सेवा में हमें भी कभी भी थकावट अथवा ऊब महसूस नहीं होती। इसके साथ ही भगवान का सामीप्य भी हमें जल्द से जल्द प्राप्त हो जाता है। व्यक्तिगत उपासना में हमारा मन भटकता रहता है। सामूहिक उपासना में मेरा मन भले ही भटकता क्यों न रहें लेकिन दूसरे श्रद्धावानों के द्वारा किया जा रहा नामस्मरण, स्तोत्रपाठ मैं सुनते रहता हूँ और इससे मुझे लाभ मिलता ही है।

सामूहिक उपासना का अध्ययन जितना किया जाए उतना कम ही है। पर्वत कोई एक मनुष्य नहीं उठा पाता है। वहाँ पर सामूहिक प्रयास को ही सफलता मिलती है। हमारे भगवान श्रीकृष्ण ने पहले ही हमारे लिए अपनी ऊंगली पर गोवर्धन उठाया है, हमें तो केवल अपनी क्षमतानुसार अपनी-अपनी लकड़ी का सहारा देना है। गोवर्धन को लकड़ी का सहारा देना अर्थात सामूहिक उपासना एवं सेवा करना। जिसने यह किया वही श्रीकृष्ण का सखा बन गया। उसी को गोकुल में श्रीकृष्ण का निरंतर सामीप्य प्राप्त हुआ। परन्तु सामूहिक उपासना-सेवा रूपी लकड़ी गोवर्धन को लगाते समय समूह के हर किसी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गोवर्धन उठा रखा है, अकेले श्रीकृष्ण ने ही। हमें जो उन्होंने लकड़ी का सहारा देने का अवसर प्रदान किया है, यह उनकी ही कृपा है। इसी लिए हमें इस बात का अहंकार नहीं करना है कि गोवर्धन हम ने उठाया है। हमें अपने जीवनविकास के लिए सामूहिक उपासना-सेवा की लकड़ी गोवर्धन में लगानी है। इस बात का ध्यान रहें।

इसके पश्‍चात् –

३) मेरा बस्ता – बाबा का बस्ता अर्थात बाबा ने मुझे जो किरदार दिया है वह। इस बात का अहसास रखकर मुझे अपना काम ईमानदारी के साथ करना है। इस पिपिलिका पथ पर चलते समय मेरे हिस्से में जो भूमिका मुझे मिली है, उसे पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पूरा करना, यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात है। द्वारकामाई में यदि मुझे झाडू मारने का काम दिया गया है तो वही मेरा बस्ता हैं। बाबा के कार्य की जो भी ज़िम्मेदारी मुझ पर है, उसे भली-भाँति पूरा करना अर्थात् बस्ता संभालना। जो हमसे होगी वही सेवा मैं करूँगा। हम घर बैठे गुदड़ी सी सकते हैं, स्वेटर बुन सकते हैं और ज़रूरतमंद लोगों को योजनानुसार दे सकते है, मोमबत्ती, माचिस, अनाज, पुराने कपड़े, आदि इस प्रकार की अन्य चीजें भी हम सहजता से दे सकते हैं और इसी के अनुसार सेवाकार्य में सहभागी हो सकते हैं। मैं बहुत अधिक सेवा नहीं कर सकता हूँ परन्तु जितना भी मैं कर सकता हूँ, उतना भी करते रहना चाहिए। यह काफी महत्त्व रखता है।

४) मेरी पोथी – श्रीसाईसच्चरित श्रीमद्ग्रंथराज पुरुषार्थ, सुंदरकांड, श्रीरामरसायन ये ग्रंथ हम सहज ही पढ़ सकते हैं और उन्हें समझना भी काफ़ी आसान है। हम इन ग्रंथों का पठन एवं नित्य अध्ययन तो करेंगे ही परन्तु इसके साथ ही उनमें दिए गए मार्गदर्शन के अनुसार ही हमें अपने वर्तन में उचित बदलाव करना ही है। मेरे साईनाथ मुझसे जो अपेक्षा रखते है, वैसा मुझे बनना ही है। इसके साथ ही इन ग्रंथों से सद्गुरु साईनाथ की लीलाओं का वर्णन हमें दूसरों के समक्ष करना ही है। ‘मेरी पोथी’ इस शब्द के माध्यम से बाबा हमें स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि गुणसंकीर्तन, अनुभवसंकीर्तन यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस भगवान का गुणसंकीर्तन, जो हमारे जीवन में रामरसायन प्रवाहित कराता है।

५) मेरा ध्यान अक्षय चित्त में – बाबा के सगुण साकार स्वरूप का ध्यान करना। फिर चाहे वह मेरे घर पर होने वाली बाबा की तसवीर हो अथवा मूर्ति भी क्यों न हो, ‘यह साक्षात् मेरे साईनाथ ही हैं’ इस विश्‍वास के साथ बाबा का ध्यान करनाचाहिए। सर्वप्रथम आँखें खुली रखकर प्रतिदिन बाबा को निहारते रहना चाहिए और फिर आँखें बंद करके भी बाबा को ध्यान में लाना चाहिए। यही प्रयास निरंतर बढ़ाते रहना चाहिए। इससे होगा यह कि चाहे आँखें खुली रहें या बंद निरंतर बाबा का ध्यान बना ही रहेगा।

‘मेरा ध्यान अक्षय चित्त में’ इस वाक्य का यही भावार्थ है। श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रन्थराज में बतायी गयी ‘रससाधना’ यह हर किसी के लिए धारणा-ध्यान का सहज सुंदर एवं आसान मार्ग है। रससाधना के इस मार्ग का क्रमण निरंतर करते रहना चाहिए। और यदि हमें इसके संबंध में कुछ भी जानकारी नहीं है, तब हमें ग्रंथराज में दिए गए रससाधना के पाँच पदों का अभ्यास निरंतर करते रहना चाहिए। साईनाथ हमारे मन में हमेशा के लिए समा जायें इसके लिए, ‘रसराज’ को हमारे जीवन का कर्ता बनाने के लिए श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रन्थराज के ‘आनंदसाधना’ इस तृतीय खण्ड में यह अत्यन्त आसान एवं सुंदर मार्ग बताया गया है।

इन पाँचों मुद्दों का अध्ययन करने पर हमें यही पता चलता है कि यह मार्ग बिलकुल भी कठिन नहीं है। हर कोई इस मार्ग पर आसानी से चल सकता है। केवल मन में वैसी प्रबल इच्छा एवं दृढ़ निश्‍चय का होना आवश्यक है।