श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३८)

साईनाथ की इन कथाओं की मधुरता के सामने अमृत कुछ भी नहीं है।
भवसागर के दुष्कर पथ पर भी अपने आप ही इन से सहजता आ जाती है॥

साईनाथ की कथाएँ इतनी अधिक मधुर हैं कि उनके माधुर्य के सामने अमृत भी फीका पड़ जाता है। ये कथायें अमृत को भी पछाड़ देनेवाली हैं। अमृत की अपेक्षा भी अनंत गुना साईनाथ की कथाएँ श्रेष्ठ हैं, यह बात हेमाडपंत हमें बता रहे हैं। अमृत हमें अमरत्व प्रदान कर सकता है, परन्तु केवल अमर होकर भी क्या लाभ? जर्जर अवस्था में कुढ़-कुढ़कर जीने का क्या मतलब है! वैसे भी इस अमृत का अमरत्व कब तक टिक पायेगा? कल्पान्त तक। जिसे यह प्राप्त होगा उसे भी आखिरकार जाना ही है। अमृत का नाम लेते ही हमें अमृतमंथन की कथा याद आती है। उस अमृत को प्राप्त करने हेतु देव एवं दानवों की कितनी कोशिशें चल रही थीं, इस बात की याद भी हमें हैं ही। परन्तु इस प्रकार से अमृत को प्राप्त करने का क्या लाभ? क्योंकि यदि उस जीवन में ‘राम’ नहीं होंगे तो फिर उस जीवन का मतलब ही क्या?

हमें सर्वप्रथम यही विचार करना चाहिए। अमरत्व की प्राप्ति करने की अपेक्षा महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि साईनाथ के सामीप्य की प्राप्ति कर लें। मैं कितना जी सकूँगा, मेरी मृत्यु कब होगी इसकी अपेक्षा मैं साईनाथ का सामीप्य, साईनाथ के चरण कैसे प्राप्त कर सकूँगा, इस बात का विचार करना चाहिए। साईनाथ की कथाएँ अमृत को भी शर्मिंदा कर दें ऐसी हैं, इसका कारण यह है कि ये कथाएँ मुझे मेरे साईनाथ का सामीप्य प्रदान करवानेवाली हैं। सभी कुछ यदि प्राप्त कर भी लिया, परन्तु साईनाथ के चरण प्राप्त न हुए तो जो कुछ भी प्राप्त किया है, वह सब कुछ व्यर्थ ही है। ‘नरजन्म दुर्लभ है’ ऐसा हम अकसर कहते हैं। इसका कारण यह है कि नरदेह में ही हम सदसद्विवेक बुद्धि के द्वारा सोच-समझकर इस बात का निर्णय ले सकते हैं कि मुझे आख़िर क्या प्राप्त करना है। सबसे बड़ी चीज़ कर्मस्वातंत्र्य यह केवल मनुष्ययोनि में ही हैं। मानवदेह प्राप्त होने पर हमें अमृत के पीछे भागने की अपेक्षा साईचरणामृत, जो सच्चा अमृत है, उसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

‘अमृतातें ही पैजा जिंके’ (अमृत भी जिस से हार जाता है ऐसी) इन शब्दों में ज्ञानेश्‍वर महाराज जिस भाषा की महिमा का वर्णन करते हैं, वह भाषा भक्ति की भाषा है। ‘अमृत से भी मीठा है नाम तुम्हारा भगवन्’ यही सच्चे श्रद्धावान का दृढ़ विश्‍वास होता है। अमृत की अपेक्षा साईनाथ का प्रेमामृत ही हमारी सच्ची ज़रूरत है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि भवसागर से उस पार ले जाने के लिए अमृत किसी काम का नहीं है। हम अमर हो भी गए, परन्तु जितना जीवन जी लिया उसमें किसी भी प्रकार का पुरुषार्थ न करते हुए उलटे पाप का पलड़ा ही भारी करते रहे तो उस अमरत्व का क्या उपयोग? हम तो अकसर यह भी पढ़ते रहते हैं कि अमरत्व का वरदान प्राप्त राक्षस, असुर आदि किस तरह से उन्मत्त हो गए थे। मुझे अमरत्व प्राप्त हुआ है, मुझे कोई भी मार नहीं सकता है, इसी शेखी में हमारा अहंकार बढ़ने लगता है और हम अधिकाधिक स्वैराचारी बनते चले जाते हैं। प्राय: ऐसा ही होने की पूरी संभावना होती है। इसीलिए अमृत प्राप्त करने की अपेक्षा श्रीसाईनाथ की भक्ति करते रहना ही सर्वथा उचित है। जिसे साईनाथ के गोकुल में रहने के लिए स्थान प्राप्त करने की अपेक्षा स्वयं ही ‘अमृत’ बनना अधिक महत्त्वपूर्ण है।

मेरे पास होनेवाला, साईनाथ से किया जानेवाला प्रेम, मेरे पास होनेवाला शुद्ध भाव, मेरा सद्गुण इन सब की मृत्यु न होने देना यह अमरत्व मुझे प्राप्त करना चाहिए। मेरे यश की, कीर्ति की, चरित्र की, शील की, नीति की मृत्यु न होने पाये इसके लिए मर्यादाशील भक्ति का अमृत प्राप्त करना यही अधिक महत्त्वपूर्ण है। सच्चा अमरत्व है- मेरे भक्तत्व की, अंबज्ञत्व की मृत्यु न होने देना, श्रद्धा-सबुरी का अंत न होने देना। श्रीमद्पुरुषार्थ तृतीय खंड ‘आनंदसाधना’ में मृत्युंजयत्व कैसे प्राप्त होता है, इसका वर्णन सुस्पष्ट शब्दों में किया गया हैं। मनुष्य के सभी स्तरों पर की अपमृत्यु से मुक्ति प्रदान करनेवाली साईनाथ की भक्ति यही सच्चा अमृत है।

साईनाथ की कथाएँ हमें अमृतत्व प्रदान करनेवाली ही हैं, जितना सेवन करने से भक्त स्वयं ही अमृत बन जाता है। साईनाथ की ये कथाएँ ही हमारी जीवननौका को सुखरूप, निर्भयता से, किसी भी प्रकार की अपमृत्यु हुए बगैर भवसागर से उस पार तक ले जानेवाली हैं। साईनाथ की कथाएँ दीपस्तंभ के समान तो हैं ही, हमारे प्रारब्ध को चकनाचूर करनेवाली तो हैं ही, परन्तु इसके साथ ही वे श्रद्धा एवं सबुरी को अमृतत्व प्रदान करके हमारे भवसागर के प्रवास में सहजता ले आनेवाली हैं। जो इस साईनाथ की कथाओं की प्रेमपूर्वक अपने हृदय में धारण करता है, उसकी नौका कभी भी किसी भी प्रकार के भँवर में नहीं फँसती है। न तो कोई भी चट्टान उसे फोड़ सकती है और न ही कोई उसे डूबो सकता है।

केवल बाह्य आघातों से ही भवसागर के प्रवास में धोखा होता है, ऐसी बात नहीं है; बल्कि आंतरिक बातों का धोखा भी होता ही है। मान लो जहाज़ का पाल ङ्गट गया, इंजन बंद पड़ गया, रसद खत्म हो गई इस प्रकार की अनेक बातों का भी भय बना रहता है। उसी तरह बुद्धिरूपी कैप्टन (कप्तान) की आज्ञा न सुनते हुए देहरूपी नौका को चलानेवाला मन और इन्द्रियरूपी खलासी मिलकर हरताल कर दें तो? हमारी नौका भटक जाती है, बंद पड़ जाती है या उसके काम में अवरोध उत्पन्न हो जाता है, वह इसी प्रकार की बातों से ही। साईनाथ की कथाएँ हमें इस तरह के खतरों से भी बाहर निकालती हैं।

साईनाथ की कथाओं को सुनकर उन्हें बारंबार मन में उतारते रहने से देह में उत्पन्न होनेवाले अहंकार का, घमंड का खात्मा हो जाता है। स्वयं ही अपनी नौका में पानी भरते रहकर उसे डूबोनेवाली दिशा में प्रवास करते रहना यही अहंकार है। नौका पर जितना अधिक पानी बढ़ता रहेगा, उतना ही अधिक उसके डूबने की संभावना बढ़ती रहेगी। साईनाथ की कथाएँ हमारी जीवनरूपी नौका पर जमा होनेवाले, नौका का भार बढ़ानेवाले देह-अहंकार के पानी का तुरंत ही निवारण कर देती हैं। इसके साथ ही ‘द्वंद्व’ हमारे दिशादर्शक यंत्र को खराब कर देता है। हमें यही समझ में नहीं आता हैं कि हमें किस दिशा में प्रवास करना है। साईनाथ की कथाएँ ही इन द्वंद्वों का नाश करके केवल एकमात्र साईनाथ की ही दिशा हमारी जीवन नौका को प्रदान करती हैं और वे हमारे दिशादर्शक यंत्र के काम में बाधा नहीं आने देती हैं।

तीसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि विकल्प, संदेह ये हमारी जीवननौका में छिद्र करते रहते हैं। तो फिर नौका में छिद्र पड़ जाने पर समुद्र का पानी अंदर जाकर नौका को डूबोयेगा ही। साईनाथ की कथाएँ इन संदेह आदि विकल्पों जैसे नौका में छिद्र बनानेवाली वृत्तियों का नामोंनिशान मिटा देती हैं और हमारी नौका में छिद्र नहीं पड़ने देती हैं। हमारी नौका का विवेकबुद्धि नामक कप्तान प्रबल बनता रहता है और उसके आदेश का पालन मन नामक चालक एवं इन्द्रियरूपी खलासी करते हैं।

हमारे जीवन में भी अहंकार, द्वंद्व, विकल्प एवं संदेह ये वृत्तियाँ बडे पैमाने पर उत्पात मचाती रहती हैं। इन तीनों दुष्ट वृत्तियों से अपने आप को कैसे बचाना है, यह प्रश्‍न हमें अकसर परेशान करता रहता है। हमारा अहंकार हमारी नौका में पानी डालता रहता है, द्वंद्व हमारे दिशादर्शक यंत्र में खराबी कर देता है और विकल्प-संदेह हमारी नौका में छिद्र करने में जुटे रहते हैं। इन तीनों का ही खात्मा केवल एक ही अमोघ रामबाण से होता है और वह रामबाण उपाय है, श्रीसाईनाथ की कथाएँ।