समय की करवट (भाग ६५) – ‘सुएझ नहर’ का इस्रायली पहलू

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-२५

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इस सुएझ नहर क्रायसिस के घटनाक्रम में महत्त्वपूर्ण स्थान होनेवाला नाईल नदी पर का आस्वान बाँध

सोव्हिएत रशिया की ओर रूझान रहनेवाले नासर पर लग़ाम कसने हेतु, इजिप्त के प्रस्तावित आस्वान बाँध के लिए होनेवाली अर्थसहायता अमरीका एवं ब्रिटन ने रोकी होने के कारण, उसके जवाबस्वरूप नासर ने सुएझ नहर का राष्ट्रीयीकरण कर दिया।

उसमें जिस तरह, इजिप्त को मानकर चलनेवाले (‘टेकन फॉर ग्रान्टेड’) पश्‍चिमी राष्ट्रों को सबक सिखाना यह प्रमुख उद्देश्य खा, उसी तरह यह सुएझ नहर इजिप्त की भूमि पर होने के बावजूद भी उसपर होनेवाली ब्रिटन-फ्रान्स की मोनोपॉली को ख़त्म कर देना, यह भी उद्देश्य था। साथ ही, आन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होनेवाली इस सुएझ नहर में से आनेवाली आय इजिप्त को न मिलते हुए वह इन बाहरी देशों की जेबों में जा रही थी; उसका इस तरह अन्य किसी को फ़ायदा न मिलते हुए, उसे इजिप्त के विकास के लिए ही इस्तेमाल किया जाये, यह उद्देश्य भी था।

इस विवाद का एक और पहलू था – अरब-इस्रायल विवाद! यह सदियों से शुरू ही है। इस सुएझ के राष्ट्रीयीकरण के चलते ‘लगे हाथ’ इस्रायल को भी सबक सिखायें और हमेशा ही इस्रायल का साथ देनेवाली अमरीका तथा अन्य पश्‍चिमी देशों को भी सबक सिखायें, इस उद्देश्य से नासर ने इस सुएझ नहर के साथ ही, इजिप्त हे संबंधित होनेवाले अन्य भी कुछ रणनीति की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ऐसे सागरी मार्गों पर आवागमन करने के लिए इस्रायली जहाज़ों पर पाबंदी लगायी। इनमें तिरान की जलसंधि (‘स्ट्रेट्स ऑफ तिरान’) और आकाबा की खाड़ी (‘गल्फ ऑफ आकाबा’) इन कारोबार की दृष्टि से अतिमहत्त्वपूर्ण समुद्री स्थानों का समावेश था।

यह नहर कारोबार की दृष्टि से अतिमहत्त्वपूर्ण होने के कारण, इसपर किसी एक राष्ट्र की मोनोपली होना किसी भी राष्ट्र को मंज़ूर नहीं था। इस कारण इस नहर के बनने के कुछ ही सालों में यानी सन १८८८ में ब्रिटन, जर्मनी, ऑस्ट्रो-हंगेरी, स्पेन, फ्रान्स, इटली, नेदरलँड्स, रशिया और ऑटोमन साम्राज्य इनके बीच एक समझौता होकर, यह नहर सभी देशों को, सभी समयों में – शांतिकाल में तथा युद्धकाल में भी खुला रहेगा, ऐसा मान्य किया गया था। यह ‘कॉन्स्टॅन्टीनोपल कन्व्हेन्शन ऑफ १८८८’ के नाम से जाना जाता है।

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राष्ट्रीयीकरण से पहले सुएझ नहर पर ब्रिटीश सेना का ही नियंत्रण था।

इजिप्त आज़ाद होने से पहले हालाँकि ब्रिटन के पास इस नहर का प्रत्यक्ष कब्ज़ा था, मग़र फिर भी इस नहर की देखभाल करनेवाले ‘सुएझ कॅनाल कंपनी’ के शेअर्स में सर्वाधिक हिस्सा फ्रान्स के पास था और और ये दोनों ़सत्ताएँ एक-दूसरे की जानी दुश्मन होने के कारण यहाँ भी एक-दूसरे को मात देने की कोशिशें करती रहती थीं। इस नहर पर केवल ब्रिटन का नियंत्रण न रहें इसके लिए फ्रान्स पहले से ही प्रयासशील होता और उसीके अंजाम के रूप में यह ‘कॉन्स्टॅन्टीनोपल कन्व्हेन्शन ऑफ १८८८’ का जन्म हुआ था।

इस कारण, इस तरह इजिप्त द्वारा इकतरफ़ा इस नहर का राष्ट्रीयीकरण किया जाना, यह इस समझौते का भंग होने की आलोचना की जाने लगी।

इस राष्ट्रीयीकरण द्वारा ‘सुएझ कॅनाल कंपनी’ की सारी जायदाद ‘फ्रीज़’ की जा रही है, ऐसा नासर ने घोषित किया। उसीके साथ, उस दिन पॅरिस स्टॉक एक्स्चेंज पर होनेवाली शेअर्स की क़ीमत के अनुसार सभी शेअरधारकों को मुआवज़ा दिया जायेगा, ऐसा भी घोषित किया।

इस विवाद में कइयों के अनेकस्तरीय स्वार्थ उलझे हुए थे। सुएज नहर यानी सर्वदूर एशिया में फैले हुए अपने साम्राज्य के साथ संपर्क में रहने का सर्वाधिक प्रभावी मार्ग होने के कारण ब्रिटन सुएझ नहर अपने हाथों से गँवाना नहीं चाहता था और इसी कारण नहर का राष्ट्रीयीकरण करनेवाला नासर उन्हें नहीं चाहिए था। फ्रान्स नासर से नफ़रत करता था क्योंकि उत्तर अफ्रिका स्थित उसके उपनिवेशीदेशों पर नासर का प्रभाव बढ़ रहा था। इस कारण, फ्रान्स-अल्जेरिया विवाद में नासर अल्जेरियन विद्रोहियों को उक़साता है, यह बहाना बनाकर फ्रान्स नासरविरोधी कार्रवाइयों में सहभागी हुआ था।

यहाँ नासर को सोव्हिएत गुट से पुनः पश्‍चिमी गुट में लाया जाये, ऐसी अमरीका की इच्छा ज़रूर थी, लेकिन उसके लिए लष्करी विकल्प का इस्तेमाल करने पर फिलहाल अमरीका को ऐतराज़ था, क्योंकि ऐसा करने से अरब जगत में अमरीका के प्रति होनेवाले सदिच्छा ख़त्म हो जाती। अतः, इस मामले में अमरीका हमारा समर्थन करें इसके लिए ब्रिटन ने अमरीका की बार बार मिन्नतें करने के बावजूद भी अमरीका ने वैसा नहीं किया। दरअसल यह राष्ट्रीयीकरण होने से पहले ही यानी मार्च १९५६ में ही अमरीका ने नासर की सत्ता का त़ख्ता पलटने के लिए ‘प्लॅन ओमेगा’ नामक एक गोपनीय समझौता ब्रिटन के साथ किया था। लेकिन उसमें लष्करी विकल्प अभिप्रेत न होकर, राजनीतिक समीकरणों से और दीर्घ कालावधि में अमरीका यह करानेवाली थी।

ऐसा होते हुए भी अमरीका द्वारा इस मामले में ब्रिटन की सहायता न की जाना, यह ब्रिटन को विश्‍वासघात प्रतीत होने लगा। लेकिन अमरीका के विरोध में जाकर खुले आम सैनिकी कार्रवाई करने की ब्रिटन की हिम्मत नहीं थी।

इसी कारण ब्रिटन ने, कहीं अमरीका खफ़ा न होे जायें इसलिए, फ्रान्स और इस्रायल के साथ गोपनीय लष्करी समझौता कर इस्रायल को आगे किया।

उसके बाद तीन ही महीनों में यानी २९ अक्तूबर १९५६ को, इजिप्त के साथ बदला लेने का मौका ही ढूँढ़ रहे इस्रायल ने लष्करी विकल्प का इस्तेमाल करने की शुरुआत की।

बिटन और फ्रान्स की छुपी सहायता से इस्रायल ने सिनाई पेनिन्सुला जीत लिया। इस सिनाई पेनिन्सुला के साथ ही इस्रायल ने गाझापट्टी पर भी कब्ज़ा कर लिया।

इस युद्ध में नासर ने आम नागरिकों के हाथ में हथियार दिये थे। लेकिन हथियारों की आधुनिकता आदि मुद्दों पर अपनी सेना की दुर्बलता का उसे अनुरोधपूर्वक एहसास हुआ।

इस प्रकार इजिप्त का राष्ट्रवाद, कोल्ड वॉर और अरब-इस्रायल संघर्ष ऐसी तीनों धाराएँ मिलने के बाद इस प्रकरण में आगे चलकर क्या हुआ?