समय की करवट (भाग ४२) – सोव्हिएत युनियन का उदयास्त-२

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

जापान के खिलाफ़ के युद्ध में हुए पराजय के कारण मिट्टी में मिली अपनी आबरू सँवारने के लिए रशिया ने पहले विश्‍वयुद्ध में हिस्सा लिया। लेकिन उसका परिणाम उल्टा ही हुआ और अनाज एवं ईंधन की कमी, महँगाई, बेरोज़गारी, भूखमरी इनमें बेहिसाब वृद्धि हुई। इससे लोग ख़ौल गये और उन्होंने हड़ताल का हथियार अपनाया। उसी के साथ देशव्यापी प्रदर्शन, सभाएँ, जुलूस भी शुरू हुए।

विश्‍वयुद्ध

इस विश्‍वयुद्धकाल में महँगाई प्रचंड प्रमाण में बढ़ गयी थी। एक ही साल में दूध की, अँड़ों की क़ीमत चौगुना हो गयी थी। उसीमें विश्‍वयुद्ध के लिए युद्धभर्ती करने के बहाने डेढ़ करोड़ किसानों को सम्राट की सेना ने उठा लिया था। इन कारणों से भी जनता में असंतोष उबलने लगा। सम्राट निकोलस दूर युद्धक्षेत्र पर गया था और उसके साम्राज्य की बागड़ोर उसकी रानी अलेक्झांड्रा के हाथ में थी। लेकिन इन सारी समस्याओं को शायद मन्त्रतन्त्र से मात दी जा सकती है, इस उम्मीद से उसने ‘रासपुतिन’ नामक एक तांत्रिक को अपने दरबार में स्थान दिया था। आगे चलकर वह सिरज़ोर हुआ और रानी पूरी तरह उसके अधीन हो चुकी थी और बिना रासपुतिन की सलाह से वह कोई काम नहीं करती थी, जो बात रशियन जनता को चुभ ही रही थी। उसी में, वह वंश से जर्मन होने के कारण भी रशियन जनता के दिल में उसके खिलाफ़ ग़ुस्सा उबल रहा था।

उसी में, यह हररोज़ का तनाव सहनशक्ति से बाहर होकर एक दिन पेट्रोग्राड शहर के लोगों का सब्र टूट गया और उन्होंने वहाँ के खाद्यपदार्थो की दूकानें फोड़ना शुरू किया। रशियन सम्राट से एकनिष्ठ होनेवाली सेना ने रानी की आज्ञा से उनपर अंधाधुंद गोलीबारी शुरू की। उससे मामला और बिगड़ गया। नियंत्रण से बाहर जा रहे जनक्षोभ का मुक़ाबला करते करते रशियन सम्राट के मंत्रिमंडल की नाक में दम हुआ था। झार उस समय वहाँ से तक़रीबन ५०० मील दूर युद्ध में मग्न था। उसके मंत्रिमंडल ने आजिज़ी करते हुए, उसे पुनः राजधानी में लौटने के लिए और अपने इस्ती़फे स्वीकृत करने के लिए विनतीभरा न्योता भेजा। लेकिन वह उसतक पहुँचा विचित्र रूप में। उसका दिल रखने के उद्देश्य से, सबकुछ आलबेल होने का सन्देश उसतक पहुँचाया गया। उससे जोश में आकर उसने प्रदर्शनकारियों को नरम करने के आदेश दिये। उससे हालात और भी काबू से बाहर हो गये और दंगे शुरू हुए। सैंकड़ों लोगों पर गोलियाँ बरसायीं गयीं। लेकिन अब खौल चुके लोग पीछे हटने के लिए तैयार नहीं थे। उसीमें सरकारी निष्ठावान सेना जगह जगह पर हथियार डाल रही थी और उनके कब्ज़े में होनेवाला गोलाबारुद आन्दोलकों के हाथ लग रहा था। हालातों ने हिंसक मोड़ लिया हुआ देखकर और वह काबू से बाहर होते देखकर रशियन सेना के कई सैनिक भी इन आंदोलनकारियों के पक्ष में हो गये।

हालात बेकाबू हुए देखकर निकोलस ने ड्युमा बरख़ास्त कर दी। लेकिन उस निर्णय को अवैध घोषित किया गया। क्योंकि उससे पहले ही, उसके अधिकार में होनेवाले विधिमंडल ने – ड्युमा ने सोव्हिएत की सहायता से अस्थायी सरकार की स्थापना की थी और झार निकोलस राज्यत्याग करें, यह निर्णय सोव्हिएत की प्रबलता होनेवाली इस सरकार ने लिया था। उस निर्णय को निकोलस तक पहुँचाया गया।

निरुपायित होकर निकोलस ने यह निर्णय मान्य कर सिंहासन का त्याग किया। लेकिन अपने वारिस के रूप में उसने अपने अल्पवयीन बेटे का नाम घोषित किया। लेकिन हिमोफ़िलिया यह ‘राजेशाही बीमारी’ होनेवाले उस बच्चे से यह झँझट सँभाली नहीं जायेगी, ऐसी सलाह उसके डॉक्टरों ने उसे देने के बाद, एक आख़िरी उपाय के तौर पर, जाते जाते उसने अपने भाई को – ग्रँड ड्यूक मायकेल को रशियन साम्राज्य के नये सम्राट के रूप में घोषित किया। लेकिन ये सारे हालात नज़दीक से देख रहे मायकेल की सिंहासन पर बैठने की हिम्मत ही नहीं हुई और रशियन जनता से क़ौल प्राप्त हुए बिना सत्ताग्रहण करने से उसने इन्कार कर दिया। लेकिन निकोलस को पदच्युत करने के साथ साथ झारशाही का भी अंत करने का फ़ैसला अस्थायी सरकार ने किया था।

झारशाही का अंत होकर अस्थायी सरकार के हाथ में सत्ता जाने के इस घटनाक्रम को रशियन इतिहास में ‘फ़रवरी रिव्हॉल्युशन’ कहा जाता है।

झारशाही तो ख़त्म हुई, लेकिन यह क्रांति यहाँ पर ख़त्म नहीं हुई।