समय की करवट (भाग ४०)- ‘बर्लिन वॉल’ : ईस्टर्न ब्लॉक का ढहना

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इस का अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इस में फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उस के आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।

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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इस में फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

पूर्व जर्मनी को ग़ुलामी के अन्धकार में स्वतंत्रता का नया प्रकाश दिखानेवाला घटनाक्रम संपूर्ण युरोप में, इतना ही नहीं, बल्कि ठेंठ सोव्हिएत युनियन में भी शुरू हुआ था।

रशियन झार के ज़ुल्मी साम्राज्य के खिलाफ़ संघर्ष कर, लाल क्रांति कराके बोल्शेविकों ने सन १९१७ में, कम्युनिस्ट राज्यप्रणालि को अपनाये हुए ‘सोव्हिएत रशिया’ इस देश का निर्माण किया। यह देश यानी लगभग झार के साम्राज्य की सीमाओं से ही बना था। ‘ज़ुल्मी अमीरों द्वारा श्रमिकों पर ढाये गये ज़ुल्मों पर उपाय ‘श्रमिकों की सरकार’ यही है, जो उन्हीं के हित को प्राथमिकता देगी। लोग देशहित को ही प्राथमिकता देंगे और देशहित के ज़रिये ही अपना भी विकास करेंगे। इस कारण, लोगों की निजी पसन्द-नापसन्द, जात-धर्म इनमें से कुछ भी यह साध्य करने के आड़े नहीं आने दिया जायेगा। इस विकासकार्य में सुसूत्रता लाने के लिए अधिकारों का केंद्रीकरण किया जाना चाहिए’ इस ‘थिअरी’ के द्वारा इस देश का निर्माण हुआ था। लेकिन केवल विकासकार्य में सुसूत्रता लाने के लिए किये गये, अधिकारों के केंद्रीकरण का रूपांतरण धीरे धीरे ‘राजा बोलता है, दल पालन करता है’ इस क़िस्म की एकाधिकारशाही में हुआ।

सोव्हिएत रशियापरस्त सरकारें होनेवाले, युरोप के ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ देशों में से पोलंड में वहाँ की कम्युनिस्ट राज्यसत्ता को चुनौती देनेवाला, जनतंत्र की माँग करनेवाला, लेक वॉलेसा के नेतृत्व में चलाया गया ‘सॉलिडॅरिटी’ आन्दोलन सफल हुआ था। मुख्य रूप से, अब सोव्हिएत रशिया उन्हीं की ग़लत नीतियों के कारण निर्माण हुईं समस्याओं के बोझ तले दबा जा रहा था। इससे ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ देशों पर का उसका नियंत्रण भी धीरे धीरे ढ़ीला पड़ने लगा था। इस कारण पोलंडस्थित सरकार ने हालाँकि कार्यकर्ताओं की धरपकड़ करके यह आन्दोलन कुचलने के कितने भी प्रयास किये, मग़र फिर भी अब उन्हें, अपनी ही समस्याओं का हल निकालने में उलझे हुए सोव्हिएत रशिया से पहले जितना समर्थन न मिल रहा होने के कारण, यह आन्दोलन कुचलने में वे असफल रहे और यह आन्दोलन फैलता ही रहा।

इन सोव्हिएतप्रणित ज़ुल्मी, संवेदनहीन सरकारों से सारे युरोप की जनता ही ऊब चुकी थी, लेकिन उनकी पाशवी ताकत के सामने जान के डर से वह चूपचाप सहती रही। जब पोलंड में शुरू हुआ यह आन्दोलन सफल होता दुनिया ने देखा, तब इस जनता को पता चला कि इन ज़ुल्मी सत्ताओं से मुक्ति मिलना नामुमक़िन नहीं है; और फिर पोलंड के पीछे पीछे हंगेरी में भी वहाँ की सोव्हिएतप्रणित ज़ुल्मी कम्युनिस्ट हु़कुमत का त़ख्ता पलटने के लिए जो जनतंत्रवादी आंदोलन चल रहे थे, उनकी तीव्रता अधिक ही बढ़ गयी।

विघटन की प्रक्रिया
झेकोस्लोव्हाकिया का ‘वेल्वेट रिव्हॉल्युशन’ – सशस्त्र सैनिकों का सामना उन्हें फूल देकर अहिंसक मार्ग से करते हुए झेकोस्लोव्हाकिया के जनतंत्रवादी प्रदर्शनकारी

हंगेरी में यह आन्दोलन बहुत पहले से शुरू हो चुका था। क्योंकि दूसरे विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के पश्‍चात् के ‘वॉर्सा पॅक्ट’ के अनुसार जब हंगेरी को सोव्हिएत रशिया के नियंत्रण में रखकर, हंगेरी में सोव्हिएतपरस्त सरकार आयी, तब वहाँ के समाज का सोव्हिएतीकरण करने की हमेशा की ‘पद्धति से’, सबसे पहले वहाँ के प्रशासन में होनेवाले विचारक एवं अधिकारियों को नौकरियों से निकाल दिया गया था। सामाजिक कार्यकर्ता, जनतंत्रवादी, बुद्धिवान् लोगों की गिरफ़्तारी का देशभर में सत्र चलाया गया था। कई लोगों को ‘कॉन्सन्ट्रेशन कॅम्प’ में भेजा गया था। इस कारण वहाँ तबसे असंतोष धधकने की शुरुआत हो चुकी थी। १९५० के दशक से शुरू हुआ यह आन्दोलन आख़िरकार १९९० के दशक के अन्त में सफल हुआ और वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार का त़ख्ता पलट दिया गया। मई १९८९ में ऑस्ट्रिया एवं हंगेरी को अलग करनेवाला तारों का बाड़ तथा इलेक्ट्रिक फ़ेन्सेस तोड़ दी गयीं।

उसके पीछे पीछे झेकोस्लोवाकिया में भी आन्दोलन हुआ। लेकिन यहाँ के आन्दोलन शांतिपूर्ण, अहिंसक मार्ग से हुए, जिस कारण इस क्रांति को जागतिक इतिहास में ‘वेल्वेट रिव्हॉल्युशन’ संबोधित किया जाता है।

 

इस ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ देशों में से केवल रोमानिया में हुई क्रांति हिंसक मार्ग से हुई।

‘मि. गॉर्बाचेव्ह, टीअर डाऊन धिस वॉल’ यह आवाहन करते हुए बर्लिन वॉल के नज़दीक हुए समारोह में तत्कालीन अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष रोनाल्ड रिगन
विघटन की प्रक्रिया

इन सब बातों का परिणाम पूर्व जर्मनी के वातावरण पर हो ही रहा था और वहाँ पर भी जनतंत्रवादी आवाज़ें बढ़ रहीं थीं। सन १९८७ में बर्लिन शहर के ७५० वर्षं पूरे होने के समारोह में अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष रोनाल्ड रिगन ने सोव्हिएत रशिया के तत्कालीन सर्वेसर्वा मिखाईल गॉर्बेचेव्ह को ‘स्वतन्त्रता तथा मुक्ति को कमज़ोर बनानेवाली इस वॉल को ज़मीनदोस्त करने का’ आवाहन किया।

 

यह अब तक सोव्हिएत रशिया के सामर्थ्य तले दबकर उनका अंकित रहा ‘ईस्टर्न ब्लॉक’, सोव्हिएत का नियंत्रण पहले जैसा न रहने के कारण ढह गया था और इस कारण यह वॉल ज़मीनदोस्त होने का मार्ग सुलभ हो चुका था।