श्‍वसनसंस्था २९

पिछले लेख तक हमने इस बात का अध्ययन किया कि वायु का आदान-प्रदान किस प्रकार होता है। अब हम देखेंगे कि रक्त, शरीर के अन्य द्राव और कोशिकाओं में प्राणवायु और कार्बन डायऑक्साइड का प्रवास कैसे होता है।

प्राणवायु डिफ्यूजन की सहायता से अलविओलाय में से रक्त में मिश्रित होती है। रक्त में मिश्रित इस प्राणवायु को कोशिकाओं तक पहुँचाने का काम हिमोग्लोबिन करती है। अपने रक्त के बारे में अध्ययन करते समय हमने इसकी जानकारी प्राप्त की थी। रक्त में यदि हिमोग्लोबिन ना भी हो तो भी प्राणवायु रक्त में मिश्रित होती है। प्राणवायु पानी में घुलनशील होती है। रक्त में भी पानी होता है अत: प्राणवायु रक्त में घुल जाती हैं। हिमोग्लोबिन के कारण रक्त में प्राणवायु की घुलनशीलता ३० से १०० गुना तक बढ़ जाती है।

ऊतकों की केशवाहनियों में प्राणवायु रक्त के पहुँचने के बाद प्राणवायु हिमोग्लोबिन से अलग हो जाती है और कोशिकाओं में प्रवेश करती है। कोशिकाओं में उपस्थित अन्न घटकों के साथ इसकी प्रक्रिया होती है जिससे कार्बनडायऑक्साइड का निर्माण होता है। रक्त में उपस्थित अन्य रासायनिक घटकों की सहायता से यह कार्बनडायऑक्साइड फेफड़ों तक पहुँचती है। अब हम प्रत्येक वायु के प्रवास का सविस्तर अध्ययन करेंगे –

प्राणवायु का प्रवास निम्नलिखित पडावों से होता है –

१) फेफड़ों की रक्तवाहनियाँ –
प्राणवायु सर्वप्रथम फेफड़ों की केशवाहनियों में प्रवेश करती है। अलविओलाय में से इनका डिफ्यूजन केशवाहनियों के प्रेशर ग्रेडिऍट यानी दाब के अंतर के कारण होता है। अलविओलर Po2 104 mm of Hg तथा फेफड़ों की केशवाहनियों में Po2 40 mm of Hg होता है। दोनों में यह जो 64 mm of Hg का फर्क होता है, उसी के कारण प्राणवायु अलविओलाय में से रक्त में घुलती है। अलविओलाय और फेफड़ों की केशवाहनियों में प्राणवायु के पार्शल प्रेशर के समान होने तक प्राणवायु डिफ्यूज होती रहती है। इसमें कुछ समय निकल जाता है। हमारा रक्त रक्तवाहनियों में स्थिर ना होकर बहता रहता है। इसका तात्पर्य यह है कि प्राणवायु के Partial Pressure के समान होने में जो समय जाता है उस समय में केशवाहनियों में रक्त भी आगे निकल जाता है। फेफड़ों की केशवाहिनियों में से रक्त का जो प्रवास होता है, उसका लगभग 1/3 प्रवास पूर्ण होने तक यह रक्त प्राणवायु से लगभग 100% परिपूर्ण हो जाता है। अर्थात शेष 2/3 प्रवास में इस रक्त में प्राणवायु का मिश्रण नहीं होता। नॉर्मल स्थिति में ऐसा होता है इस 2/3 प्रवास का उपयोग व्यायाम के दौरान होता है। देखते हैं कैसे?

व्यायाम करते समय शरीर की प्राणवायु की आवश्यकता लगभग २० गुना बढ़ जाती है। व्यायाम करते समय हृदय से बाहर निकलनेवाले रक्त की मात्रा भी बढ़ जाती है (cardiac output)। बढ़े हुये कार्डीआक आऊटपुट के कारण रक्तप्रवाह का वेग भी बढ़ जाता है। बढ़े हुए वेग के कारण फेफड़ों की रक्तवाहनियों में रक्त के प्रवास का समय लगभग आधा हो जाता है। उसके बावजूद भी शरीर के प्राणवायु की आवश्यकता कैसे पूरी होती है; अब हम यह देखेंगे।

अ) व्यायाम के दौरान प्राणवायु का डिफ्यूजन लगभग तीन गुना बढ़ जाता है।
ब) फेफड़ों की रक्तवाहनियों का रक्त उसके प्रवास के पहले 1/3 चरण में ही प्राणवायु रक्त में मिश्रित होती हैं। यानी यहाँ पर रक्त में प्राणवायु के मिश्रित होने का समय भी तीन गुना बढ़ सकता है। व्यायाम के दौरान ठीक ऐसा ही होता है। फलस्वरूप यद्यपि व्यायाम के दौरान काफी कम मात्रा में रक्त फेफड़ों में रहता है फिर भी उसके पूरे प्रवास में प्राणवायु का शोषण करते रहता हैं।

२) शरीर की मुख्य धमनियाँ (Arteries) :
मुख्य धमनियों के कुल रक्त का लगभग 98% रक्त फेफड़ों की रक्तवाहिनियों के माध्यम से आता है। अत: इस रक्त में प्राणवायु का Partial Pressure 104 mm of Hg होता है। शेष 2% रक्त फेफड़ों की वेन्स से आता है। यह रक्त अशुद्ध होता है। इस रक्त में प्राणवायु की मात्रा कम होने के कारण इस रक्त का Po2 40 mm of Hg होता है। हृदय के बायी ओर इन दोनों रक्तों का मिश्रण होता है और उसका परिणाम रक्त के Po2 पर पड़ता है। रक्त में वायु का दबाव कम हो जाता है। इसी लिए धमनियों के रक्त का Po2 95 mm of Hg के आसपास होता है।

३) शरीर की केशवाहनियों से ऊतक के द्राव में होनेवाला प्राणवायु का डिफ्यूजन :
रक्त में से प्राणवायु ऊतकों के द्राव में मिलती है। दोनों ओर के दबाव में अंतर होने के कारण ऐसा होता है। केशवाहिनियों में वायु का दाब 95 mm of Hg होता है जब कि ऊतकों के द्राव में यह दाब 40 mm of Hg होता है। फलस्वरूप प्राणवायु अत्यंत शीघ्रता से उती द्राव में घुल जाती है तथा केशवाहिनियों का Po2 40 mm of Hg तक नीचे गिर जाता है।

यही रक्त आगे चलकर वेन्स में जाता है। इसीलिये वेन्सब्लड (वेन्स के ब्लड में) Po2 40 mm of Hg ही होता है। उती द्राव में प्राणवायु की मात्रा और उसी के आधार पर वहाँ की Po2 दो घटकों पर निर्भर करती है।

अ) रक्तप्रवाह के बहने की रेट : यदि किसी कारणवश उती में रक्त का प्रवाह बढ़ जाये (रेट बढ़ने पर) तो उती द्राव की Po2 भी बढ़ जाती है।
ब) उती में अन्न घटकों का चयापचय : अन्न घटकों का उपयोग करने के लिये कोशिकाएं प्राणवायु की सहायता लेती हैं। अन्न घटकों का चयापचय (metabolism) जितना ज्यादा होता है उतना ही वहाँ प्राणवायु कम होती है। फलस्वरूप वहाँ की Po2 भी कम हो जाती है।

४) रक्त से पेशियों में होनेवाला प्राणवायु का डिफ्यूजन :
प्रत्येक पेशी उसके नॉर्मल कार्यों के लिये प्राणवायु का उपयोग करती है। केशवाहनियों से पेशी तक प्राणवायु का वहन होने के लिये वहाँ पर Pressure Gradieat का होना आवश्यक होता है। कोशिकाओं में Po2 कम से कम 5 mm of Hg से ज्यादा 40 mm of Hg तक होता है इसीलिए कोशिकाओं में औसतन 23 mm of Hg, Po2 होता है।

कोशिकाओं में प्राणवायु की आवश्यकता होनेवाली रासायनिक प्रक्रिया को पूर्ण होने के लिये सिर्फ 1 से 3 mm of Hg, Po2 की आवश्यकता होती है। इसी लिये 23 mm of Hg Po2 होने पर भी पेशी का कार्य सुचारु रूप चलता रहता है।

आज हमने प्राणवायु के प्रवास के बारे में जानकारी ली। अगले भाग में हम कार्बन डाय ऑक्साइड वायु के बारे में अध्ययन करेंगे।(क्रमश:)