श्‍वसनसंस्था – ३०

पिछले लेख में हमने प्राणवायु के अलविओलाय से लेकर पेशी तक के प्रवास का अध्ययन किया। आज हम कार्बनडायऑक्साइड वायु का प्रवास देखनेवाले हैं।

हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका अपने कार्यों के लिये प्राणवायु का उपयोग करती है। प्राणवायु का उपयोग करने के बाद कार्बनडायऑक्साइड तैयार होती है। फलस्वरूप कोशिका के अंतर्गत द्राव में इस वायु की मात्रा और इसी के अनुसार partial presure (Pco2) बढ़ता है। कोशिका के अंतर्गत बढ़े हुए Pco2 के कारण ऊती की केशवाहनियों में यह वायु डिफ्युज होती है। इन केशवाहनियों से यह वायु फेफड़ों के अलविओलाय में डिफ्युज होती है। उपरोक्त वर्णन से आज समझ ही चुके होंगे कि कार्बनडायऑक्साइड का प्रवास प्राणवायु के प्रवास के बिल्कुल विपरीत दिशा में होता है। प्राणवायु का प्रवास अलविओलाय से पेशी तक होता है जब कि कार्बनडायऑक्साइड वायु का प्रवास पेशी से अलविओलास तक होता है।

प्राणवायु और कार्बनडायऑक्साइड वायु एक ही समय में विपरीत दिशा में डिफ्युज होती है। इन दोनों के डिफ्युजन में एक महत्त्वपूर्ण फर्क है। कार्बनडायऑक्साइड वायु के डिफ्युजन का वेग, प्राणवायु के डिफ्युजन के वेग से २० गुना ज्यादा होता है। फलस्वरुप इसके डिफ्युजन के लिये बड़े pressure gradient की आवश्यकता नहीं होती। इस वायु के दबाव में कम से कम फर्क होने पर भी इस वायु का डिफ्युजन सहजतापूर्वक होता है।

इस वायु के दबाव में फर्क अथवा pressure gradient विभिन्न जगहों पर कितना होता है, अब हम यह देखेंगे।

१) कोशिका के अंदर Pco२, ४६ mm of Hg तो कोशिकाबाह्य द्राव में Pco२ ४५ mm of Hg होता है। अर्थात मात्र १ mm of Hg का अल्प अंतर होने पर भी, इस वायु का डिफ्युजन होता है।

२) टिश्यु अथवा ऊती (ऊतक) में प्रवेश करनेवाले आरटिरिअन रक्त का Pco२ ४० mm of Hg होता है। ऊती से बाहर निकलनेवालले वेन्स रक्त का Pco२ ४५ mm of Hg होता है।

३) फेफड़ों की रक्तवाहनियों (आरटरी) में Pco२ ४५ mm of Hg होता है। अलविओलाय में Pco२ ४० mm of Hg होता है। कार्बनडाय ऑक्साइड का डिफ्युजन होने के लिए यह ५ mm of Hg का (४५-४०) फर्क ही पर्याप्त होता है। फेफड़ों की केशवाहनियों से कार्बनडायऑक्साइड वायु अलविओलाय में प्रवेश करती है। रक्त में इसकी मात्रा कम होती है और थोड़े ही समय में यह केशवाहिनियों की Pco२ भी ४० mm of Hg तक पहुँच जाता है। Pco२ के इस स्तर तक आने तक केशवाहनियों में रक्त का सिर्फ १/३ प्रवास ही पूरा हुआ होता है। प्राणवायु के डिफ्यूजन में भी ऐसा ही होता है, यह हमने पहले ही देखा है। मात्र इन दोनों वायुओं का प्रवास विरुद्ध दिशा में होता है।

ऊतकों में रक्तप्रवाह और पेशियों का मेटॅबोलिझम का कार्बनडायऑक्साइड वायु का रक्त में मात्रा का क्या परिणाम होता है, अब हम यह देखेंगे। प्राणवायु के बारे में जो घटित होता है उसके बिलकुल विपरित घटना इस वायु के बारे में होती है।

१) ऊतको में रक्तप्रवाह कम हो जाने पर Pco२ बढ़ जाता है और रक्तप्रवाह बढ़ने पर Pco२ कम हो जाता है। रक्तप्रवाह के कम हो जाने पर भी कोशिका का मेटॅबोलिझम हमेशा की रेट से ही शुरु रहता है। कार्बनडायऑक्साइड का निर्माण कोशिका में होता रहता है उतनी मात्रा में वो रक्त से बाहर नहीं निकाला जाता है। वह जमा होता रहता है। परन्तु ऊतकों के द्राव में उसकी मात्रा काफी बढ़ जाती है। रक्तप्रवाह के बढ़ने पर पेशी में तैयार होनेवाली यह वायु शीघ्रता से रक्त के माध्यम से बहा ले जायी जाती है।

२) पेशी या मेटॅबोलिझम बढ़ जाने से कार्बन डाय ऑक्साइड वायु की निर्मिति बढ़ जाती है तथा ऊतक द्राव की Pco२ बढ़ जाती है। पेशी का मेटॅबोलिझम कम होने पर Pco२ भी कम हो जाती है।

आज तक हमने प्राणवायु और कार्बनडायऑक्साइड वायु के शरीर में होने वाले प्रवास की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त की। इन वायुओं का रक्त द्वारा वहन किया जाता है, यह देखा। प्रत्यक्ष यह वहन कैसे होता है, इसका अध्ययन हम अगले लेख में करेंगे।(क्रमश:)