नेताजी- १६५

सुभाषबाबू का विदेश सचिव केपलर के साथ हुआ झगड़ा, यह हालाँकि कोई अच्छी घटना नहीं थी, लेकिन उसकी गूँजों ने तो थोड़ाबहुत अच्छा काम कर दिया। सुभाषबाबू बहुत ही नाराज़ हैं, इस बात को जानने के बाद रिबेनट्रॉप ने स्वयं इस मामले पर ध्यान देना शुरू किया। एक के बाद एक इस तरह ‘एस्प्लनेड’, ‘एक्सलसियर’, ‘कैसरहॉफ़’ इन जैसे, केवल विदेशी राष्ट्राध्यक्षों जैसे अतिमहत्त्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्तियों के लिए आरक्षित कर रखे, बर्लिन के सर्वाधिक शानदार होटलों में सुभाषबाबू के ठहरने का इन्तज़ाम करने के बाद अब उनके लिए बर्लिन के सोङ्गियनसट्रासे इस शानदार इला़के में राजमहल जैसे बंगले का इन्तज़ाम किया गया। युद्ध के शुरू होने से पहले उस बंगले में एक अमरिकी लष्करी उच्च-अधिकारी का वास्तव्य था। युद्ध शुरू होने के बाद अमरिका ने जर्मनी के साथ राजनीतिक संबंध तोड़ देने के कारण वह बंगला अब ख़ाली ही पड़ा था। जर्मनी ने उस अ़फसर की ख़ातिरदारी के लिए तैनात किया हुआ स्टा़फ भी अभी तक वहीं पर तैनात था। अब वह स्टा़फ भी सुभाषबाबू को ही दिया गया। दरवाज़े पर ‘ओरलेन्दो मेझोता’ की नेमप्लेट लगायी गयी।

सुभाषबाबू ने आवश्यक भारतीय रीतिरिवाज़ों के अनुसार एमिली के साथ विवाह किया। उसके गवाह थे, डॉ. धवन तथा ट्रॉट।

सोफियनस्ट्रासे के शार्लटर्नबर्ग एरिया में स्थित इस तीस कमरों वाले बंगले में सुभाषबाबू की ‘गृहस्थी’ की शुरुआत हुई। ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ी हुई मातृभूमि को आज़ाद करने के लिए दिनरात तक़ली़फ उठानेवाले और उसके सिवा अन्य कोई खयाल भी दिल में न रखनेवाले अपनी इस लाड़ली सन्तान को, अल्पकाल के लिए ही सही, लेकिन कम से कम इतना तो आराम देना चाहिए, यह ख़याल नियति के मन में अवश्य आया होगा!

इसके अलावा भी अन्य कई अनुकूल बातें घटित हुईं। प्रस्तावित ‘आज़ाद हिन्द केन्द्र’ के लिए विदेश मन्त्रालय द्वारा बर्लिन स्थित टिअरगार्टन एरिया में स्पॅनिश एम्बसी के सामने वाली बिल्डिंग दे दी गयी। साथ ही, रिबेनट्रॉप द्वारा मंज़ूर किये जाने के अनुसार जर्मन विदेश मन्त्रालय की ओर से ‘आज़ाद हिन्द केन्द्र’ के नाम से दस लाख मार्क्स का चेक भी आया। उसके अलावा, सुभाषबाबू के निजी खर्चे के लिए बारह हज़ार मार्क्स का चेक भी उन्हें सौंप दिया गया, जिसपर लिखा था -‘हिज एक्सलन्सी सुभाषचन्द्र बोस’!

साथ ही, युद्ध के चलते जीवनावश्यक वस्तुओं की कमी महसूस होने के कारण सभी जर्मन नागरिकों के लिए अनिवार्य रहनेवाला ‘रेशनिंग’ (प्रतिदिन एक परिवार के इतना ही अनाज, इतना ही दूध आदि) सुभाषबाबू के लिए लागू नहीं था।

अब ऑफिस के लिए जगह मिल गयी, पैसों का इन्तज़ाम भी हो गया; अब क़ाम जोरों-शोरों से शुरू होना चाहिए था। लेकिन उसके लिए राष्ट्रप्रेम से भारित निष्ठावान व्यक्तियों की ज़रूरत थी और सुभाषबाबू के पास थे सिर्फ़ डॉ. धवन तथा मुकुंदलाल व्यासजी। नंबियारजी को प्रत्यक्ष काम सँभालने में अब भी थोड़ा वक़्त बाक़ी था। इसलिए सुभाषबाबू ने बर्लिन पढ़ने आये भारतीय छात्रों का मन टटोलने के लिए उनकी एक सभा लेने का तय किया।

सभा के नियोजित समय से पहले ये भारतीय व्यक्ति सभागृह में इकट्ठा होने लगे। उनमें विदेश में से स्वतन्त्रतासंग्राम की सहायता करनेवाले एन. जी. गणपुलेजी जैसे उद्योजक थे, हबिबुर रहमान जैसे निष्ठावान देशभक्त थे, एन.जी. स्वामी जैसे मेकॅनिकल इंजिनियर थे, अबिद हसनजी जैसे इलेक्ट्रिकल इंजिनियर थे, बालकृष्ण शर्माजी जैसे केमिस्ट्री के उपाधिधारक थे। इनमें से अधिकांश लोग कई सालों से बर्लिन में रहने के कारण एक-दूसरे से भली-भाँति परिचित थे। इसलिए बहुत दिनों बाद भारतीय मित्रमंडली इकट्ठा होने के कारण गपशप शुरू हो गयी। आयोजकों ने उस सबको यह बताया था कि ‘ओर्लेन्दो मेझोता’ नाम के इटालियन व्यक्ति उनसे वार्तालाप करना चाहते हैं। लेकिन बातचीत के दौरान यह बात सा़फ हो गयी कि यह किसी को भी नहीं पता कि ये ‘ओर्लेन्दो मेझोता’ नाम की इटालियन हस्ती है कौन और उनका काम क्या है।

सभा के आयोजक तैयारी में जुट गये थे। इतने में वहाँ पर लगभग ५०-५५ वर्ष की आयु की एक जर्मन महिला का आगमन हुआ। उन्हें देखकर सभा में आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ ‘ताईजी….ताईजी’ इस तरह की उत्स्ङ्गूर्त पुकार सुनायी देने लगी। उन्होंने भी मुस्कुराकर उस उत्स्फ़ुर्त अभिवादन का स्वीकार किया। ये ‘ताईजी’ (भारतीय बहुभाषिकों की ‘थाईजी’) थीं – जर्मन मूल की फ्राऊ ये-वॉन हारुबाऊ। वे ‘रेडक्रॉस’ की बर्लिन शाखा की वरिष्ठ पदाधिकारी थीं, साथ ही वे जर्मन पटकथालेखिका एवं उपन्यासकार भी थीं। जर्मन सरकार भी उनकी का़ङ्गी इ़ज़्ज़त करती थी। ये ताईजी, बर्लिन पढ़ने आयें भारतीय छात्रों की आधारस्तंभ ही थीं। किसी छात्र के भारत से पैसे आने में देर हो गयी, किसी को पैसे की कोई अड़चन है, किसी की नौकरी छूट गयी है, तो ऐसे वक़्त उस भारतीय को बर्लिन में एक ही सहारा सा़फ़ सा़फ़ दिखायी देता था – वह थीं ताईजी। ताईजी से सहायता प्राप्त करने के लिए किसी की जान-पहचान होने की आवश्यकता नहीं रहती थी। वह व्यक्ति ‘भारतीय’ है, बस इतनी ही ‘पहचान’ उनके लिए का़ङ्गी रहती थी। कभी कभी तो पाँच-पाँच भारतीय छात्र तक उनके घर में भोजन करने रहते थे। उनके द्वारा की गयी सहायता को किसी विशिष्ट कालावधि में वापस करने की शर्त भी नहीं रहती थी। वह छात्र उसे जब और जैसे संभव हो, तब उस धन को चुका सकता था। वाक़ई, ईश्वर किस रूप में किसके लिए सही वक़्त पर उपस्थित हो जायेगा, इसे भला कौन जान सकता है!

ताईजी के मन में भारत के प्रति इतना लगाव क्यों था? किसका रिश्ता किससे कब जुड़ जाये, यह कहना मुश्किल है। ताईजी के पति युवावस्था में ही प्रभु को प्यारे हो गये थे। आगे चलकर द्वितीय विश्‍वयुद्ध के शुरू होने से पहले उनका परिचय, भारत से बर्लिन आयें, बेलगाँव के पास के टिळकवाडी इस गाँव के डॉ. तेंडुलकरजी से हुआ। उनके मन एवं विचार आपस में जुड़ गये और आगे चलकर डॉक्टरसाहब के साथ उनकी शादी हुई। उसके बाद ‘भारत’ को ही ताईजी ने अपनी मातृभूमि मान लिया। कुछ वर्ष बाद डॉ. तेंडुलकरजी कुछ समय के लिए भारत आये थे और उसी दौरान द्वितीय विश्‍वयुद्ध शुरू हो गया। वे बस जर्मनी लौट ही रहे थे कि उन्हें अँग्रेज़ सरकार ने, वे जर्मन एजंट हैं, यह बेबुनियाद इलज़ाम उनपर लगाकर कैद कर लिया था। अत एव अब उनका इन्तज़ार करने के अलावा ताईजी के पास और कोई चारा ही नहीं था।

स्वतन्त्रता के ध्येय से प्रेरित डॉ. तेंडुलकरजी सुभाषबाबू के नेतृत्व से प्रभावित थे। ज़ाहिर है कि ताईजी ने भी सुभाषबाबू का नाम सुना था और उनसे मिलने की दिलचस्पी भी उनके मन में थी। अत एव सुभाषबाबू के बर्लिन आने की ख़बर मिलते ही वे स्वयं उनसे मिलने गयीं। ‘यहाँ बर्लिन में आपकी एक माँ ही रहती है ऐसा मान लीजिए। डॉक्टरसाहब आपकी बहुत इ़ज़्ज़त करते हैं और इसीलिए आपको जिस सहायता की ज़रूरत पड़ेगी, वह बेझिझक मुझसे माँगिए। आप जब भारत को आज़ाद करायेंगे, तब मैं सम्मानपूर्वक टिळकवाडी में जाकर रहूँगी’ यह सुभाषबाबू से उन्होंने कहा और वह सुनते ही सुभाषबाबू का दिल भर आया।

इसी वजह से भारतीय छात्रों की इस मीटिंग के आयोजन में उन्होंने सुभाषबाबू की का़फ़ी सहायता की। ऐसीं ताईजी को सभास्थल पर देखकर उपस्थित भारतीयों के दिलों में खुशी की लहर दौड़ गयी और ‘ओर्लेन्दो मेझोता’ कौन हैं, इस जिज्ञासा का भी उफान आ गया।