नेताजी-१६६

सुभाषबाबू द्वारा बुलायी गयी, बर्लिन स्थित भारतीयों की मीटिंग में ताईजी को देखकर उपस्थितों की जिज्ञासा अब चरमसीमा पर पहुँच चुकी थी कि ये ‘ओरलेन्दो मेझोता’ कौन हैं?

इतने में मुकुंदलाल व्यासजी बाहर आये। कुछ लोग उन्हें भी जानते थे। पहले ताईजी और फिर ये व्यास….ज़रूर कोई न कोई बात है, यह सभी सोच रहे थे। व्यासजी के बाद ओरलेन्दो मेझोता आ रहे हैं, ऐसी ख़बर आयी और सब दिल थामकर उस दिशा में देखने लगे।

ओरलेन्दो मेझोता बाहर आ गये। सिर से लेकर पाँव तक सूट-टोपी आदि उच्चभ्रू इटालियन भेस धारण किये और स्टायलिश इटालियन दाढ़ी रखे हुए मेझोता को देखकर सभी प्रभावित हुए, लेकिन बस कुछ ही देर तक….

….चन्द कुछ ही पलों में उन्हें निहारनेवालों में से कइयों के मन में विचारचक्र शुरू हो गया – शायद पहले भी कभी इनसे मुलाक़ात हुई है….कहाँ?

….और फिर थोड़ाबहुत सिर खुजाने के बाद कुछ ही देर में कइयों के दिमाग़ में सबकुछ उजागर हो गया….और सभा में आश्‍चर्यमिश्रित खुशी की लहर दौड़ गयी।

‘….सुभाषबाबू?!!’
सुभाषबाबू ने मुस्कुराकर इस अभिवादन को स्वीकार किया।

उनमें से कुछ लोगों से गत युरोप दौरे में सुभाषबाबू की किसी न किसी वजह से मुलाक़ात हुई थी। सुभाषबाबू से मिलने की वे यादें जिस तरह उनके मन में तर्रोताज़ा थीं, उसी तरह सुभाषबाबू को भी उन सबके नाम याद थे। पहले गाँधीजी के असहकार आन्दोलन में शामिल हुए अबिद हसन को तो भारत से ही जानते थे।

सुभाषबाबू के भारत छोड़ने की ख़बर तो सभी को पहले ही मिल चुकी थी। लेकिन वे यहाँ बर्लिन में इस तरह ‘ओरलेन्दो मेझोता’ के रूप में मिलेंगे, यह तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।

ताज्जुब का शुरुआती दौर गुज़रने के बाद सुभाषबाबू ने मुद्दों पर आते हुए अपने भाषण की शुरुआत की।

सबसे पहले भारत छोड़ने के बाद के अब तक के अपने स़ङ्गर का ब्योरा संक्षेप में देकर भारत छोड़ने के पीछे की अपनी भूमिका भी स्पष्ट की। साथ ही, दूसरे महायुद्ध में अक्षराष्ट्रों द्वारा बन्दी बनाये गये ब्रिटीश ङ्गौजों के भारतीय फौजियों की सहायता से सेना बनाकर, अँग्रेज़ी हुकूमत से आरपार की जंग लड़ने की अपनी योजना भी ज़ाहिर की। इस योजना को सङ्गल बनाने के लिए बर्लिन में ‘आज़ाद हिन्द केन्द्र’ और उसमें ‘आज़ाद हिन्द रेडिओ केन्द्र’ की शुरुआत की जानेवाली है, यह जानकारी भी उन्होंने दी। साथ ही, बर्लिन में आने के बाद अब तक की इस योजना की तैयारी के बारे में भी बताया।

बहुत ही अनुशासनबद्ध एवं सर्वंकष सोचविचार करके बनायी गयी उस योजना के बारे में सभी उपस्थित गण मन्त्रमुग्ध होकर, दिल थामकर सुन रहे थे।

सम्पूर्ण योजना की जानकारी देने के बाद सुभाषबाबू ने प्रमुख मुद्दा प्रस्तुत करते हुए यह पूछा कि इस महत्कार्य के लिए मन में देशप्रेम रखनेवाले, देश के लिए कुछ न कुछ करने की इच्छा रखनेवाले निष्ठावान लोगों की ज़रूरत है और इसीलिए इस कार्य में हाथ बटाने के लिए आपमें से कौन तैयार है? यहाँ आपको आपके नौकरी-व्यवसाय को, पढ़ाई को जारी रखते हुए महज़ कुछ समय देना पड़ेगा, यह भी उन्होंने स्पष्ट किया।

सुभाषबाबू ने जिस तड़प से यह कहा था, उससे चन्द कुछ ही पलों में उन्होंने हमेशा की तरह उपस्थितों के दिल जीत लिये थे। पहले ही, पढ़ाई या नौकरी के कारण विदेश रहनेवाले छात्रों को मातृभूमि का वियोग पीड़ा देता था और ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जक़ड़ी हुई अपनी मातृभूमि के लिए कुछ न कुछ करने का जुनून सबके दिलों पर सवार रहता ही था। लेकिन सही मायने में करना क्या चाहिए, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। साथ ही, फिलहाल युद्धकाल के चलते आर्थिक समस्या से भी सभी परेशान थे। इसी वजह से इच्छा रहने के बावजूद भी, मातृभूमि के लिए वे कुछ कर नहीं पा रहे थे। इन सभी दिक्कतों को ‘प्रॅक्टिकल’ सुभाषबाबू भली-भाँति जानते थे। इस काम में हाथ बटाना चाहनेवालों के लिए यह काम बोजा न बनें, यह सुभाषबाबू की इच्छा थी। जिनके पास आर्थिक सहायता करने की ताकत और इच्छा है, मग़र समय नहीं है, उनसे आर्थिक सहायता; वहीं, जिनके पास आर्थिक सहायता करने की ताकत नहीं है, लेकिन जो अपना समय दे सकते हैं, उनसे समय और परिश्रम – इस तरह उन्होंने सहायकर्ताओं का ‘प्रॅक्टिकली’ विभाजन किया था।

इसी वजह से, सुभाषबाबू का यह ‘कार्य के लिए बस थोड़ासा समय देने का’ प्रस्ताव प्रायः सभी को महज़ ‘प्रॅक्टिकल’ ही नहीं, बल्कि ‘ईश्वर द्वारा दिया गया देशसेवा करने का सुअवसर’ प्रतीत हुआ।

‘हम तैयार हैं’ ऐसा नारा सभी ने लगाया।

सुभाषबाबू ने सन्तोषपूर्वक सभा समाप्त कर दी।

उपस्थितों में से एन. जी. गणपुले, बालकृष्ण शर्मा, हबिबुर रहमान, एन.जी. स्वामी और अबिद हसन ये तो बिलकुल उसी पल से काम करने के लिए तैयार थे। यही था ‘आज़ाद हिन्द केन्द्र’ में क़ाम करनेवाले कार्यकर्ताओं का पहला बॅच।

६ नवम्बर १९४१ को ‘आज़ाद हिन्द केन्द्र’ की पहली मीटिंग नये ऑफिस में बुलायी गयी। जैसे जैसे सदस्य मीटिंग में आने लगे, वैसे वैसे कोई ‘गुड मॉर्निंग’, कोई ‘नमस्ते’, कोई ‘सलाम आलेकुम’ कहकर अभिवादन कर रहा था। मीटिंग में सुभाषबाबू ने इस बात का ज़िक्र करते हुए आपस में मिलते हुए कुछ विशिष्ट शब्दों द्वारा अभिवादन करने का सुझाव रखा। उसपर किसी ने कुछ, तो किसी ने कुछ शब्दों का प्रस्ताव रखा। हालाँकि अपनी अपनी जगह सभी शब्द सुन्दर तो थे, लेकिन उनमें से किसी से भी मन के तार नहीं छेड़े जा रहे थे।

अत एव सुभाषबाबू ने उन सबको सुनकर आख़िर आसान एवं सुविधापूर्ण शब्दों का प्रस्ताव रखा – ‘जय हिन्द’!

….इन शब्दों को सुनते ही उपस्थित सभी रोमांचित हो गये। ये ‘आसान, सहज’ दो शब्द स्वतन्त्रतासंग्राम के आगामी समय में सारे देश पर छा गये और स्वतन्त्रता के बाद भी वे सभी भारतीयों के लिए मूलमन्त्र बन गये। इन शब्दों का सुभाषबाबू के मुँह से प्रथम उच्चारण सुनने का सौभाग्य ‘आज़ाद हिन्द केन्द्र’ की उस कचहरी को प्राप्त हुआ था।