नेताजी-१४८

निर्धारित समय पर ठीक सात बजे सुभाषबाबू भगतराम के साथ इटालियन एम्बसी के दरवाज़े पर पहुँच गये। कारोनी का सेक्रेटरी आन्झालोती वहाँ पर उन्हीं की राह देख रहा था। वह उन्हें कारोनी के पास ले गया। सुभाषबाबू ने पहले भारतीय ढ़ंग से नमस्कार किया और फ़िर पश्चिमी स्टाईल में हार्दिकता से ‘शेकहँड’ किया!

कारोनी उनकी ओर, ख़ासकर सामनेवाले के मन में झाँकनेवालीं उनकी आँखों को देखता ही रह गया। सर्वसमर्थ ब्रिटीश हु़कूमत को और उनकी गुप्तचर यन्त्रणा को जड़ से हिला देनेवाले सुभाषबाबू के बारे में उसने आजतक बहुत कुछ सुना या पढ़ा था। आज तक जिनका केवल नाम सुना था और जिनके शौर्य की कथाएँ एम्बसी के इटालियन कर्मचारियों की चर्चा में रहती थीं, वह ओजस्वी व्यक्तित्व आज मेरे समक्ष उपस्थित है, इसपर कारोनी को यक़ीन ही नहीं हो रहा था। उन इटालियन कर्मचारियों ने सुभाषबाबू को कबका मॅझिनी, व्हॉल्टेअर इन अजरामर देशभक्तों का दर्जा दिया था।

दोनों ने खूब जमकर बातें कीं। उन बातों में से एक पहाड़ जैसा मज़बूत व्यक्तित्व कारोनी की आँखों के सामने साकार हो रहा था – ऐसा व्यक्तित्व, जिसके मन में विदेशियों की ग़ुलामी की ज़ंजिरों में जक़ड़ी हुई अपनी मातृभूमि को उस पाश से छुड़ाने के अलावा अन्य कोई विचार ही नहीं है और बिना उसे मुक्त किये वह चैन की साँस नहीं लेगा।

साथ ही, एक ओर जनतन्त्र का ढिंढ़ोरा पीटनेवाली और दुनिया का पहला जनतान्त्रिक शासन होने की ड़ींगें दुनिया भर में हाँकनेवाली ब्रिटीश हु़कूमत, दूसरी ओर आशियाई देशों पर ‘येन केन प्रकारेण’ अपनी सत्ता को लादकर दमनतन्त्र का सहारा लेते हुए उन्हें अपने कब्ज़े में रखने का जो दोतऱफ़ा रवैया अपना रही थी, उस दोतऱङ्गा रवैये के प्रति ऩफ़रत भी सुभाषबाबू के हर लब्ज़ से व्यक्त हो रही थी। केवल ऩफ़रत ही नहीं, बल्कि देशान्तर्गत और वैश्‍विक राजनीतिक परिस्थिति का और समीकरणों का सर्वांगीण अध्ययन करके ठोंस आधार पर बुनी गयी ‘प्रॅक्टिकल’ योजना उनके शब्दों से ज़ाहिर हो रही थी। तत्कालीन युरोपीय परिस्थिति का उनका अध्ययन देखकर तो कारोनी चौंक ही उठा था। इस आदमी के लिए अपने से जितना बन पड़े, उतना करना चाहिए, यह बात तो उसने मन ही मन निश्चित की थी। ‘पिछली द़फ़ा जब मैं युरोप आया था, तब मेरा सबसे हार्दिक स्वागत किया था इटली के सर्वेसर्वा मुसोलिनी ने ही’ इस बात का ज़िक्र सुभाषबाबू ने याद रखकर वहाँ किया।

बातों बातों में दोनों ही इतने खो गये थे कि समय का भान ही उन्हें नहीं रहा था। बीच में ही सुभाषबाबू ने घड़ी में देखा, तो रात के दस बज चुके थे। विदा लेने के लिए वे उठे, तो कारोनी ने ‘अभी तो बहुत सारी बातें करनी हैं’ यह कहकर उन्हें रात उधर ही ठहरने का आग्रह किया। उसे मंज़ूर करके सुभाषबाबू ने भगतराम को उत्तमचन्द के घर इस बारे में इत्तलाह देने के लिए कहा। दूसरे दिन दोपहर को ‘दार-उल-अमन’ इस जगह पर आने के लिए भगतराम से कारोनी ने कहा। वह उन्हें वहाँ लाकर छोड़नेवाला था। इसी दरमियान कारोनी ने अपनी पत्नी – सिनोरा कारोनी को भी सुभाषबाबू से परिचित कराया और ‘अब जब कि और ज़्यादा सावधानी बरतने की ज़रूरत है, इसीलिए सुभाषबाबू या भगतराम को, बिना किसी आपातकालीन कारण के वहाँ न आने की ज़रूरत नहीं है। समय समय पर ताज़ा गतिविधियों के बारे में मेरी पत्नी सिनोरा उत्तमचन्द की दुकान में आकर सँदेसें देती रहेगी’ ऐसा उसने सुभाषबाबू से कहा।

खाने के बाद भी देर रात तक दोनों की बातचीत जारी ही रही। इस अजीबोंग़रीब साहस को करने के पीछे सुभाषबाबू के दिमाग़ में रहनेवाली योजना को उन्होंने जब कारोनी के सामने प्रस्तुत किया, तो कारोनी दंग ही रह गया। युरोप में ‘फ़्री इंडिया गव्हर्न्मेंट’ (‘आज़ाद हिन्द सरकार’) इस ‘गव्हर्न्मेंट-इन-एक्साईल’ की वे स्थापना करनेवाले थे। एक स्वतन्त्र सार्वभौम राष्ट्र की सरकार को जिस तरह दूसरे राष्ट्र से इ़ज़्ज़त मिलती है, उसी दर्जे का सम्मान सुभाषबाबू को अक्षराष्ट्रों से इस ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ के लिए अपेक्षित था। एक बार जब इस सरकार को अक्षराष्ट्रों द्वारा ‘भारतदेश का प्रतिनिधित्व करनेवाली सरकार’ के रूप में मान्यता मिल जाती है और अखण्ड भारत की स्वतन्त्रता की गॅरंटी मिल जाती है, तो उसके बाद भारत की स्वतन्त्रता की भूमिका को जागतिक व्यासपीठ पर प्रस्तुत करने के लिए एक स्वतन्त्र रेडिओ स्टेशन की स्थापना करने की सुभाषबाबू की योजना थी। इस ‘आज़ाद हिन्द रेडिओ स्टेशन’ के लिए स्वतन्त्र आरक्षित रेडिओलहरों का इस्तेमाल कर अपने कार्यक्रमों को प्रक्षेपित करना वे चाहते थे। भारत की स्वतन्त्रता के लिए आज़ाद हिन्द सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बारे में भारतवासियों को जानकारी मिलकर उनमें जनजागृति हों, इसके लिए सुभाषबाबू ऐसे क़िस्म की रेडिओलहरों को उस रेडिओस्टेशन के लिए आरक्षित करने की माँग अक्षसरकारों से करनेवाले थे, जिससे कि भारत में उस प्रक्षेपण को सुना जा सके। सबसे अहम बात यह थी कि यह सारी सहायता वे कर्ज़ के तौर पर – वापस चुकाने की शर्त पर ही लेनेवाले थे। भारत के आज़ाद होने के बाद उस मदद की पाई पाई उस उस देश को वापस चुकाने की सुभाषबाबू की योजना थी।

साथ ही, सशस्त्र बग़ावत की योजना के बारे में बताते हुए सुभाषबाबू ने कारोनी से निश्चयपूर्वक कहा कि मुझे जर्मन, इटालियन या जापानी ऐसे कुल मिलाकर केवल ५० हज़ार सैनिक़ भी यदि मिल जाते हैं, तब भी मेरे लिए वे पर्याप्त हैं। यह ५० हज़ार सैनिक़ों की माँग करने के पीछे सुभाषबाबू का हिसाब कुछ ऐसा था कि उस समय भारत में कुल मिलाकर ढ़ाई लाख ब्रिटीश फ़ौज थी, लेकिन उसमें केवल ७० हज़ार ही ब्रिटीश सैनिक़ थे, बाक़ी के भारतीय ही थे और हमें लड़ना है केवल उन ७० हज़ार सैनिक़ों के साथ, यह बात सुभाषबाबू के दिमाग़ में सुनिश्चित थी। अतः यह ५० हज़ार की फ़ौज लेकर यदि मैं भारत की सरहद तक पहुँचता हूँ, तब भारतस्थित ब्रिटीश फ़ौज में अँग्रेज़ों की ग़ुलामी कर रहे भारतीय सैनिक़ों के दिल में कश्मकश शुरू हो जायेगी और वे अँग्रेज़ों का साथ छोड़कर हमें आकर मिलेंगे। ‘समूह का मानसशास्त्र’ भली-भाँति ज्ञात रहनेवाले सुभाषबाबू ने कारोनी से यह भी कहा कि फ़िलहाल भारत में बग़ावत के लिए बिल्कुल सुयोग्य वातावरण है, लेकिन अँग्रेज़ सरकार द्वारा इस्तेमाल की जानेवाली पाशवी ताकत के भय के मारे एकाद-दूसरा मनुष्य आगे आने से डर रहे हैं। एक बार जब भारतीय सैनिक़ ही बग़ावत कर देते हैं, तो एक के बाद एक लोग आकर उसमें सम्मीलित हो जायेंगे और फ़िर भारत स्थित अँग्रेज़ी हु़कूमत डाँवाडोल हो जाने में कितना वक़्त लगेगा!

सुभाषबाबू के इस नियोजन का हर लब्ज़ सच होता हुआ आगे दिखायी दिया!