नेताजी-१२७

सुभाषबाबू के विदेशगमन की तैयारी आहिस्ता आहिस्ता, किसी को भनक तक न लगने देते हुए चल रही थी। अब शिशिर अपनी वाँडरर गाड़ी लेकर बराड़ी तक भी जाकर लौट आया था। उसने एक्स्ट्रॉ टायर भी ख़रीदा था। ‘उस’ रात को पुलीस की नज़र में न आयें, इसलिए आजकल वह हररोज़ रात को वाँडरर लेकर निकलता था। पहरेदार ख़ु़फ़िया पुलीस ने एल्गिन रोड़ और वूडबर्न पार्क रोड़ के बीचोंबीच रास्ते के कोने में एक पेड़ के नीचे चारपाही रखी थी। जानबूझकर पहरेदारों के सामने से ही वह एल्गिन रोड़ स्थित घर आता था और देर रात को सबका भोजन होने के बाद फ़ीर से वाँडरर लेकर घर लौटता था।

विदेशगमन

इस योजना के बारे में शिशिर के साथ साथ, एल्गिन रोड़ स्थित घर में रहनेवाले सुभाषबाबू के भतीजें द्विजेंद्रनाथ, अरविंद, भतीजी इला और बराड़ी रहनेवाले भतीजे अशोकनाथ ही जानते थे। बाक़ी के सदस्यों से सुभाषबाबू ने नहीं कहा था।

विश्राम करने किंगपाँग गये शरदबाबू लौटते ही उसी दिन सुभाषबाबू से मिलने गये। सुभाषबाबू ने उन्हें इस योजना के बारे में बताया। शरदबाबू खामोश रह गये। सुभाष कहीं दुःसाहस तो नहीं कर रहा है, ऐसा उनका एक मन उनसे कह रहा था; वहीं, दूसरी ओर सुभाषबाबू के कर्तृत्व पर उनका भरोसा था। साथ ही, अपना यह भाई जब कोई बात करने की ठान लेता है, तो वह उससे मुक़रता नहीं है, यह भी वे जानते थे। अतः उन्होंने उस योजना में अड़ंगा नहीं डाला। स़िर्फ़ कदम कदम पर रहनेवाले ख़तरों के बारे में उन्हें आगाह कर दिया। जब कोई ऐसी सिच्युएशन्स आ जाती हैं, तब किस तरह उनका सामना करना चाहिए, इसके बारे में दोनों भाइयों ने चर्चा की। सुभाषबाबू ने चुना हुआ मार्ग चन्द्रनगर यह उस ज़माने की फ़्रेंच कॉलनी से गुज़रनेवाला था, वहाँ फ़्रेंच पुलीस आने-जाने वालों की कड़ी जाँच करती है, उनसे किस तरह पेश आना चाहिए इन जैसी बातों की ओर उन्होंने सुभाषबाबू का ध्यान खींचा। लेकिन मानो कलेजे का टुकड़ा ही रहनेवाले सुभाष के साथ क्या फ़ीर कभी मुलाक़ात हो पायेगी भी, इस आशंका से उनका दिल बार बार दहल जाता था। लेकिन उन्होंने अपने आंसुओं को रोककर रखा, ताकि सुभाषबाबू का हौसला बना रहे।

यहाँ सुभाषबाबू के दिमाग को ज़रा भी विश्राम नहीं था। ते़जी से निर्णय लिये जा रहे थे। कुछ न कुछ बहाना बनाकर उनके डॉक्टर भाई के अस्लेशियन कुत्ते को एल्गिन रोड़ स्थित घर से वूडबर्न पार्क रोड स्थित घर भेज दिया गया था। युरोप के वास्तव्य के दौरान सुभाषबाबू जो सूट पहना करते थे, उन्हें एक दूर की लाँड्री में से धोकर लाया गया था।

घर से निकलने के बाद सुभाषबाबू को पठान के भेस में विचरण करना था, इसलिए शिशिर उनके लिए पठानी गलाबंद कोट, काबुली जूतें, पठानी स्टाईल के तक़िया-कव्हर्स, आयुर्वेदिक दवाइयों की कुछ बोतलें खरीद ले आया; कुरान की कुछ पुरानी कापियाँ भी उसने कहीं से प्राप्त कर लीं। एक दिन जब शिशिर हररोज़ की तरह सुभाषबाबू से मिलने घर आया था, तब उन्होंने एक कागज़ लेकर उसपर पेन्सिल से कुछ लिख दिया और उस मॅटर के व्हिज़िटिंग कार्ड्स बनवा लेने के लिए उससे कहा। ‘महंमद झियाउद्दिन’ इस नाम से बनवाये जानेवाले उस व्हिज़िटिंग कार्ड पर वह ‘द एम्पायर ऑफ़ इंडिया लाईफ़ अ‍ॅश्युरन्स कंपनी लिमिटेड’ का इन्शुरन्स एजंट होने की जानकारी लिखनी थी और उसका पता ‘सिव्हिल लाईन्स जबलपूर’ यह लिखा था। सुभाषबाबू ने शिशिर को वह मॅटर उसकी खुद की लिखावट में दूसरे कागज़ पर लिखने के लिए कहा और बाद में अपनी लिखावटवाले उस पहले कागज़ के छोटे छोटे टुकड़े बनाकर उसे फ़ेंक दिया, ताकि उनकी लिखावटवाला कोई सबूत पुलीस के हाथ न लगें। ये कार्ड छपवाने के लिए अपने किसी नित्य पहचानवाले प्रिंटर के पास न जायें, बल्कि किसी दूर के प्रिंटर को यह काम दे दें, यह भी उन्होंने शिशिर से ज़ोर देकर कहा। शिशिर ने राधाबझार स्ट्रीट पर स्थित एक प्रिंटर को चुना। उसके पास जाते समय भी अपना रोज़ का बंगाली भेस पहनने के बजाय वह सुटबूट वाली विलायती पोषाक पहनकर गया, उस प्रिंटर के साथ अँग्रेज़ी भाषा में ही बातचीत की। छपे हुए कार्ड्स उससे ले आते समय भी शिशिर ने सबकुछ उसी तरह किया। कार्ड छपवाकर लाने के बाद शिशिर ने अपने रूम में छिपाकर रखे हुए सुटकेस पर बड़े उत्साह के साथ ‘एम. झेड.’ ऐसे इनिशियल्स अंकित किये।

इन सब कार्यों तो करते हुए बहुत बार शिशिर की मुलाक़ात उसके किसी रिश्तेदार से या पहचानवाले ‘जिज्ञासु’ व्यक्ति के साथ हो जाती। लेकिन उन्हें क्या जवाब देकर टालना है, इसमें अब वह माहिर बन गया था।

कभी कभी जल्दबाज़ी में कुछ काम उल्टे भी हो जाते, फ़ीर उन्हें दोबारा करने में और भी वक़्त ज़ाया हो जाता था। सुभाषबाबू ने अपनी इस मुहिम के लिए बड़ी स्टुड़बेकर गाड़ी के बदले छोटी वाँडरर गाड़ी का चयन करने के बाद, शिशिर जो सुटकेस उनके लिए लाया था, वह उसमें फ़ीट नहीं होगा यह उसके ध्यान में आया। तब उसने घर में ही रहनेवाला, पिताजी का एक उससे छोटा सूटकेस निकाला। वह गाड़ी में ङ्गिट तो हो रहा था, लेकिन उसपर ‘एस.सी.बी.’ यानि उसके पिताजी के इनिशियल्स लिखे थे। उन्हें मिटाना पड़ा। फ़ीर उसपर ही दोबारा ‘एम. झेड.’ लिखना पड़ा और इस नये ख़रीदे हुए सूटकेस पर लिखे हुए ‘एम. झेड.’ ये इनिशियल्स को मिटाकर उनकी जगह ‘एस.सी.बी.’ यह लिखना पड़ा।

सुभाषबाबू पर जो मुक़दमा दायर था, उसके न्यायमूर्ति ने सुभाषबाबू को कोर्ट में उपस्थित रहने के लिए २७ जनवरी १९४१ तक की अन्तिम मोहलत दी थी। यानि कुछ भी करके उससे पहले सुभाषबाबू को केवल घर से ही नहीं, बल्कि देश से भी बाहर निकलना अनिवार्य था। स्वाभाविक है, उसके लिए कम से कम दस दिन तो हाथ में रखना ज़रूरी था। अतः सुभाषबाबू और शरदबाबू ने विचारविमर्श कर १७ जनवरी की तारीख़ तय कर ली। यदि हालात अनुकूल हैं, तो १६ तारीख़ की मध्यरात्रि के बाद मौक़ा देखकर सुभाषबाबू घर से नौ दो ग्यारह हो जायें, यह निश्चित किया गया। यदि पुलीस को आख़िर तक सुभाषबाबू के ग़ायब हो जाने की भनक नहीं लगती है, तो सोने पे सुहागा; मग़र कम से कम घर से निकलने के बाद पहले पाँच-छः दिनों तक तो पुलीस को किसी भी हालत में शक़ होना नहीं चाहिए था।

उसके लिए क्या किया जाये, इसके बारे में सुभाषबाबू सोचने लगे।